भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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निर्वाण प्रकरण

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निराकार है। इससे आत्मा में जगत् कुछ नहीं है, भ्रान्तिमात्र और अविद्या से भासित है। जो वस्तु हो नहीं और प्रत्यक्ष दिखे उसे अविद्याकृत जानिये। हे राम! ब्रह्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। जल में जो तरङ्ग और आवर्त उठते हैं, वे जलरूप हैं, जल से भिन्न कुछ नहीं जब तुम अपने आपमें स्थित होगे, तब जगत् का शब्द-अर्थ भिन्न न भासित होगा; क्योंकि कुछ दूसरी वस्तु नहीं है। हे राम! ब्रह्म अमूर्त है; उसमें यह मूर्ति कैसे उत्पन्न हो? यह भ्रान्तिमात्र है। जो वस्तु कारण से उपजी हो, वह सत् होती है और जो कारण बिना देख पड़े उसे भ्रममात्र जानिये। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है तो उसका कोई कारण नहीं इससे मिथ्याभ्रम से भासित होता है, वैसे ही यह जगत् मिथ्या है, विचार किये से नहीं रहता। हे राम! आकाश काल आदि जो पदार्थ हैं वे सब शून्य हैं। आत्मा में न उदय हुए हैं और न अस्त होते हैं—ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है।

इति श्री० नि० निर्वाणवर्णनं नामशताधिकत्रिषष्टितमसर्गः ॥ १६३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे आकाश अपनी शून्यत्ता में स्थित है, वैसे ही ब्रह्मरूपी आकाश अपने आपमें स्थित है। फिर वह कैसे किसी का कारण हो? कारण और कार्य तब होता है, जब द्वैत और आरम्भ, परिणाम होता है; पर आत्मा तो अद्वैत, अच्युत और निर्गुण है। उसमें आरम्भ कैसे हो? हे राम! जो कुछ जगत् तुमको भासित होता है, वह सब काठ की तरह मौन है, अर्थात् वहाँ मन का फुरना शून्य है। हे राम! जो कुछ द्वैत भासित होता है, वह भ्रममात्र है, जो कुछ हुआ होता तो ज्ञानी को भी प्रत्यक्ष होता पर ज्ञानकाल में नहीं भासित होता, इससे भ्रममात्र है। हे राम! पृथ्वी, जल आदि जो पदार्थ हैं, उनका फुरना स्वप्न की तरह है। जैसे स्वप्न में जो चेष्टा होती है, वह पास बैठे को नहीं दिखती, क्योंकि है ही नहीं, वैसे ही सृष्टि अकारण संकल्पमात्र है। हे राम! जैसे मिथ्या, खरगोश के सींगों का कारण कोई नहीं वैसे ही जगत् का कारण कोई नहीं। जो कुछ हो तो उसका कारण भी हो; पर जब कुछ है ही नहीं तो किसका