योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 526, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ || ॐ योगवाशिष्ठ ॐ ||
कारण कौन हो ? राम ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे वट के बीज में वृक्ष का भाव या अस्तित्व होता है, पर काल पाकर बीज से वृक्ष निकल आता है, वैसे ही इस जगत् का कारण परमाणु क्यों न हो ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सूक्ष्म से स्थूल संकल्पमात्र होता है । मैं भी कहता हूँ कि सूक्ष्म में स्थूल होता है परन्तु संकल्पमात्र होता है—कुछ सत्य नहीं होता । जो कहिये कि सत्य होता है तो नहीं हो सकता । जैसे राई के कणके से सुमेरु पर्वत का होना सम्भव नहीं, वैसे ही सूक्ष्म परमाणु से जगत् का उत्पन्न होना असम्भव है ।
हे राम ! सूक्ष्म परमाणु का कार्य भी जगत् तब कहा जाय, जब सूक्ष्म अणु भी आत्मा में पाया जाय । आत्मा तो अद्वैत है और उसमें द्वैत-अद्वैत या एक और दो कहने का अभाव है । आत्मा में जानना भी नहीं—केवल आत्मतत्त्वमात्र है । वह आधार-आधेय से रहित है । बीज भी तब परिणाम को प्राप्त होता है, जब उसको जल देते हैं और रक्षा करने का स्थान होता है । पर आत्मा आधार-आधेय से रहित केवल अपने भाव में स्थित और अद्वैत सत्तामात्र है । जैसे बन्ध्या के पुत्र का कारण कोई नहीं, वैसे ही जगत् का कारण कोई नहीं है । जब बन्ध्या का पुत्र ही नहीं तो उसका कारण कौन हो ? वैसे ही जगत् जब है ही नहीं तो ब्रह्म इसका कारण कैसे हो ? जिसको तुम दृश्य कहते हो वह द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है । हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होकर स्थित है, वैसे ही ब्रह्म ही जगत् आकार होकर दृष्टि में आता है । दृश्य भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जैसे समुद्र ही तरङ्ग और आवर्त्तरूप होकर भासता है, वैसे ही अनन्तशक्ति होकर परमात्मसत्ता ही स्थित है । हे राम ! मैं और तुम आदि जगत् के पदार्थ सब स्फुरण मात्र हैं । जैसे संकल्पनगर होता है, जो मन से रचा है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में कुछ बना नहीं, केवल ब्रह्म अपने आपमें स्थित है, हमको तो सदा वही भासता है । हे राम ! आत्मा में यह जगत् न उदय होता है और न अस्त, सदा ज्यों का त्यों निर्मल शान्तपद है ।
सं० नि० तत्त्वज्ञानातिपादनं नामाशीतितमः सर्गः ॥९४॥