भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 523
  • निर्वाण प्रकरण * ५२३

जैसे सुवर्ण के भूषण अग्नि में डालिये तो अनेक भूषणों का एक पिंड हो जाता है और एक ही आकार दिखता है, वैसे ही जब बोध का अनुभव होता है, तब सब एकरूप हो जाता है। हे राम! भूषणों के होते भी सुवर्ण ही था, इसी से सब एकरूप हो गया, वैसे ही जब बोध का अनुभव होता है, तब सब एकरूप ही भासित होता है। इससे जगत् के होते भी जगत् आत्मरूप है। जगत् है नहीं और हुए की तरह भिन्न-भिन्न जान पड़ता—जैसे मोमजल में तरङ्ग नहीं है और भासित होते हैं, तो भी जलरूप हैं—असम्यकदृष्टि में भिन्न-भिन्न लगते हैं।

हे राम! ज्ञानी को जीवन्मुक्ति और विदेह मुक्ति दोनों तुल्य हैं। जैसे भूषण के होते भी स्वर्ण है और भूषण के अभाव में भी स्वर्ण है, वैसे ही ज्ञानवान् को देह के होते भी ब्रह्म है और देह के अभाव में भी ब्रह्म है। जो अज्ञानी है, उसको नाना प्रकार का जगत् फुरता है। अज्ञानी वही है जिसको मन का सम्बन्ध है। हे राम! यह जगत् भिन्न-भिन्न फुरता है। जैसे काष्ठ के स्तम्भ में चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है, वे और को नहीं दिखतीं, उसी के मन में होती हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न पदार्थरूपी पुतलियाँ अज्ञानी के मन में फुरती हैं और ज्ञानवान् को नहीं भासित होतीं। जब काष्ठरूप आधार होता है, तब चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है, पर आश्चर्य देखो कि मनरूपी ऐसा चितेरा है कि आकाश में पदार्थरूपी पुतलियों की कल्पना करता है और वे बिना खोदी ही भासित होती हैं। हे राम! और दूसरा कुछ नहीं बना। जैसे किसी पुरुष ने कागज पर पुतली लिखी हो तो वह कागजरूप है और कुछ नहीं बनी, वैसे ही यह जगत् भी उसी ब्रह्म का स्वरूप है। हे राम! जब तुमको आत्मपद का अनुभव होगा, तब जितने जगत् के शब्द-अर्थ हैं, वे सब उसी में भासित होंगे। जैसे जिसने स्वर्ण को जाना, उसको भूषण के शब्द-अर्थ स्वर्ण ही भासित होते हैं, वैसे ही जब आत्मपद को जानोगे, तब तुमको जगत् के शब्द-अर्थ आत्मा ही में देख पड़ेंगे। हे राम! ये जीव महासूक्ष्मरूप हैं और इनमें अपनी-अपनी सृष्टि है। जब तक स्फुरण

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