भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 522

५२२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

मेघ शब्द कहाँ रहे ? और वास्तव में न कुछ उपजा है; न लीन होता है—एक ही चिदाकाश है। जो तुम कहो कि देह उपजती है; तो तुम देह और तत्त्व को स्वप्नवत् जानो। जो तुम कहो कि जगत् प्रलय में लीन होता है, इसमें कुछ है, तो नाश उरमी का होता है, जो असत्य है। जो तुम कहो कि जगत् असत्य है तो फिर क्यों भासता है, तो उपजी वस्तु भी सत् नहीं होती। जो तुम कहो कि महाप्रलय में चिदाकाश ही रहता है और वही जगद्रूप होकर दीखता है तो जगत् कुछ भिन्न वस्तु नहीं हुआ—बोधमात्र ही इस प्रकार होकर भासित होता है। जैसे बीज और वृक्ष में कुछ भेद नहीं, वैसे ही जिसमें जगत् भासित होता है, उसी का वह रूप है; कुछ उपजा नहीं। जब उपजा नहीं तो विकार और भेद कैसे हो? इसमें बोधमात्र ही अपने आपमें स्थित है। आत्मसत्ता कारण-कार्य से रहित परम शान्तरूप अपने आपमें स्थित है। वही जगद्रूप होकर दिखती है। देश, काल, पदार्थ भी सब महाप्रलयरूप हैं। जब महाप्रलय होता है, तब ब्रह्मा पर्यन्त सब पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी का नाम भी नहीं रहता। अर्थ भी नहीं रहता। तब केवल बोधमात्र और बोध से भी रहित शेष रहता है, जो परम शान्तरूप है। उसमें वाणी और मन की गति नहीं—वह केवल अवेत्यचिन्मात्र सत्ता ही है। उसी को तत्त्ववेत्ता अनुभव कहते हैं, और कोई उसे नहीं जान सकता।

हे राम ! जो पुरुष अविद्यारूपी निद्रा से जागा है वह निराभास होता है; अर्थात् चित्त से चैत्य का सम्बन्ध टूट जाता है। उसको परम प्रकाशरूप आत्मपद प्राप्त होता है। उसकी स्वभाव में स्थिति होती है और परमस्वभाव प्रकृति का अभाव हो जाता है। हे राम ! परस्वभाव में भिन्न-भिन्न जो कुछ जगत् भासित होता था, सो सब एकरूप हो जाता है। जैसे स्वप्न में सब पदार्थ भिन्न-भिन्न दीखते हैं और जागे में सब एकरूप हो जाते हैं, अपना रूप ही भासित होता है, वैसे ही जब आत्मा का अनुभव होता है, तब जगत् अपना रूप ही प्रतीत होता है। हे राम ! एकरूप सब भासित होता है, जब और कुछ नहीं बना।