योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें⚙️ निर्वाण प्रकरण ५२१
त्रिपुटी भासित होती है, वह भी मिथ्या है। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में ये तीनों भासित होते हैं और जागे मे इनका अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से ये भासित होते हैं और ज्ञान से इस त्रिपुटी का अभाव हो जाता है। हे राम! जैसे मनोराज्य से मन में जगत् स्थित होता है, वैसे ही ये पर्वत, नदियाँ, देश, काल, जगत् भी जानो। इससे इस जगत्-भ्रम को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ। यह जगत् भ्रम से उदय हुआ है, विचार से नष्ट हो जावेगा और तुमको परम शान्ति प्राप्त होगी। हे राम! जिसका मन उपशम को प्राप्त हुआ है, वह पुरुष मौनी है। वह निरोध पद को प्राप्त हुआ है और संसार-समुद्र मे तरकर कर्मों के अन्त को पहुँच गया है। उसको पहाड़, नदियाँ आदि से युक्त सम्पूर्ण जगत् लीन हो जाता है। अज्ञान के नष्ट होने मे विद्यमान जगत् भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि ज्ञानी शान्ति मे तृप्त है। वह ज्ञानवान् निरावरण होकर स्थित होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सर्वशान्त्युपदेशो नाम शताधिकैकसप्ततितमसर्गः ॥ १७१ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिस क्रम से बोधस्वरूप आत्मा जगत्-रूप होकर दिखता है, वह क्रमभेद की निवृत्त के लिए फिर मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जितना जगत् देख पड़ता है, उसका चित्त में निश्चय होता है। यह जगत् ज्ञानवान् को और अज्ञानी को भी चित्त से भासित होता है, परन्तु इतना भेद है कि अज्ञानी जगत् को सत् मानता है और ज्ञानवान् शास्त्रयुक्ति से देखकर पूर्वापर अर्थ के विचार से भ्रान्तिमात्र जानता है। यह जगत् जिस अविद्या से है, वह अविद्या भी कुछ वस्तु नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जल भासित होता है सो कुछ है नहीं, वैसे ही अविद्या कुछ वस्तु नहीं है। जितना स्थावर जङ्गम जगत् है, सो कल्प के अन्त में नष्ट हो जाता है। जैसे समुद्र मे एक बूँद निकालिये तो वह नष्ट हो जाती है, क्योंकि विभागरूप है, वैसे ही माया, अविद्या, सत्, असत् आदिक सब सम्बन्धों का अभाव हो जाता है; क्योंकि सब शब्द जगत् में हैं। जब जगत् लीन हुआ,