भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 520

५२० ✵ योगवाशिष्ठ ✵

जानोगे, तब उसकी चाह भी न करोगे। हे राम! जीवन्मुक्त की सब चेष्टाएँ देखी जाती हैं, परन्तु वह जगत् को सत्य नहीं मानता; क्योंकि उसको आत्मानुभव हुआ है। जैसे सूर्य की किरणों में जल देख पड़ता है, पर जिसने सूर्य की किरणों को जान लिया है, उसको जल नहीं प्रतीत होता, किरणें ही दीखती हैं; पर जिसने किरणें नहीं जानीं, उसको जल का भ्रम होता है। दृष्टि दोनों की तुल्य है, परन्तु ज्ञानवान् के निश्चय में जगत् जल के समान नहीं और अज्ञानी को जगत् जल सा दृढ़ जान पड़ता है। हे राम! मनरूपी दीपक प्रज्वलित है; उसमें ज्ञानरूपी जल डालिये तो बुझ जायेगा। जब मन का निर्वाण होगा, तब उस पद को प्राप्त होंगे, जहाँ जगत् और अहंकार का अभाव है। वह न शून्य है, न अशून्य; न केवल है न अकेवल। उसका उदय, अस्त भी नहीं है। हे राम! जो पुरुष ऐसे पद को प्राप्त हुआ है, वह कृतकृत्य होकर रागद्वेष से रहित परम शान्तपद को प्राप्त होता है। उसका अहंकार मिट जाता है। वह केवल निर्वाच्य पद को प्राप्त होता है, जहाँ कोई उत्थान नहीं। हे राम! आत्मा से जगत् के पदार्थ कोई नहीं हैं, मन के संकल्प से भासित होते हैं। जैसे खम्भे में चितेरा कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ इस खम्भे में हैं, सो वे उसके निश्चय में हैं, खम्भे में पुतलियों का अभाव है; वैसे ही मन के निश्चय में जगत् है; आत्मा में कुछ नहीं बना। जिस पुरुष का मन सूक्ष्म हो गया है; उसको जगत् स्वप्न जान पड़ता है। जब उसने इसे स्वप्न जाना, तब वह इच्छा और त्याग किसका करे?

हे राम! जगत् की तब तक प्रतीति है, जब तक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब आत्मानुभव होगा, तब जगत् रस से युक्त कभी न भासित होगा। जैसे धूप छाया इकट्ठी नहीं होतीं, वैसे ही ज्ञान और जगत् इकट्ठे नहीं होते। आत्मज्ञान होने पर जगत् का अभाव हो जाता है। जैसे पूर्वकाल वर्तमानकाल में नहीं होता, वैसे ही आत्मा में जगत् नहीं होता। हे राम! यह जगत् भ्रम से भासित होता है और विचार करने से इसका अभाव हो जाता है। द्रष्टा-दर्शन-दृश्य की जो