भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 501

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५०१

हो; क्योंकि सबका आत्मा निर्विभाग, अनन्त, परम शान्तिरूप और सबको कर्म के फल का देनेवाला है ।

हे राम ! जब ऐसे पद को जीव प्राप्त होता है, तब उसको वासना के उत्थानकाल में भी आत्मा ही भासित होता है, द्वैत नहीं दिखता । तब समाधि से उत्थान कैसे हो ? ऐसा कोई समर्थ नहीं कि उसको समाधि से उतारे । जब ऐसा पद प्राप्त होता है, तब संसार नीरस लगता है । हे राम ! जबतक मनुष्य मूर्तिवत् नहीं होता; तबतक विषय का त्याग करे, और जब ऐसी दशा हो, तब कुछ कर्तव्य नहीं रहता, त्याग करे अथवा न करे । यह मुझे निश्चय है कि जब ज्ञान उपजेगा, तब मनुष्य विषयों से विरक्त हो जावेगा । ब्रह्म से काष्ठपर्यन्त जितने पदार्थ हैं वे सब उसको नीरस हो जाते हैं । ऐसा जो पुरुष है, उसको सदा समाधि है । हे राम ! जिसको समाधि का सुख मिल जाता है, वह स्वाभाविक समाधि की ओर आता है । जैसे वर्षाकाल की नदी स्वाभाविक समुद्र को जाती है, वैसे ही वह पुरुष समाधि की ओर लगा रहता है । जो पुरुष विषयों से विरक्त और आत्माराम होता है, उसकी वज्रसार की सी दृढ़ स्थित होती है । जैसे पंख से रहित पर्वत स्थिर होते हैं वैसे ही जिस पुरुष ने संसार को नीरस जानकर त्याग दिया है और आत्मा में क्रीड़ा करके तृप्त हुआ है, उसकी मति चलायमान नहीं होती । हे राम ! जिस पुरुष की चेष्टा भी होती है, पर जो संकल्प-विकल्प से रहित है, वह सदा मुक्तरूप है । उसको कोई कर्म बन्धन नहीं करता; क्योंकि कर्म और साधन का अभाव हो जाता है । जिस पुरुष को जगत् नीरस हो गया है, उसको विषयों की तृष्णा कैसे हो ? और जब तृष्णा न रही, तब दुःख कैसे हो ? दुःख तब तक होता है, जबतक विषयों की तृष्णा होती है, और विषयों की तृष्णा तब होती है, जब अपने स्वभाव को मनुष्य छोड़ देता है । हे राम ! जब अपने स्वभाव में स्थित हो, तब परस्वभाव जो इन्द्रियों के विषय हैं, वे रससंयुक्त कैसे लगें और दुःख और तृष्णा कैसे हो ?

हे राम ! जब मनुष्य अपने स्वभाव को जानता है, तब निर्वाणपद

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