भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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श्रीगणेशाय नमः ।

श्रीयोगवाशिष्ठ

निर्वाण प्रकरण उत्तरार्द्ध

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष ने समाधानरूपी वृक्ष के फल को जानकर खा लिया और उसको पचाया है, उसे परम स्थिति प्राप्त होती है। जैसे पंख टूटने से पर्वत यथास्थान स्थित है, वैसे ही तृष्णारूपी पंख टूटने से जीव स्थिर होता है। हे राम ! जब उसको फल प्राप्त होता है, तब उसका चित्त भी आत्मरूप हो जाता है। जैसे दीपक का निर्वाण होता है, तब जाना नहीं जाता कि वह कहाँ गया, वैसे ही आत्मपद के प्राप्त होने पर चित्त भिन्न होकर दिखाई नहीं देता। हे राम ! जब तक वह अकृत्रिम आनन्द नहीं प्राप्त हुआ और उस पद में विश्राम नहीं पाया, तब तक शान्ति नहीं प्राप्त होती। वह पद निर्गुण, शुद्ध, स्वच्छ और परम शान्त है। जब उस पद में स्थिति होती है, तब परम समाधि हो जाती है। ऐसा त्रिलोकी में कोई नहीं, जो उसको समाधि से उतारे। जैसे चित्त की मूर्ति होती है, वैसे ही उसकी अवस्था होती है। उसकी सब चेष्टा इच्छा से रहित होती है। जैसे पंख से रहित पर्वत स्थिर होता है, वैसे ही मन संकल्प विकल्प से रहित हो जाता है और शान्तिपद को प्राप्त होता है। हे राम ! जिसके मन में संसार का अभाव हुआ है, वह शान्तिपद को प्राप्त होता है। जब तक वासना से युक्त है, तब तक मन है। जिस क्रम और युक्ति से वासना का क्षय हो वही कर्तव्य है। हे राम ! जब वासना का क्षय होता है, तब बोधरूप शेष रहता है, इसलिए जिस क्रम से वह प्राप्त हो, वही करना चाहिए, क्योंकि उस पद के प्राप्त हुए बिना शान्ति कभी न होगी। जब चित्त उस पद की ओर आवे, तब शान्त होकर दुःख से रहित और अविनाश