योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
आकाश के आश्रय से बढ़ता है और वैराग्यरूपी रस और सन्तोषरूपी फल से पुष्ट होता है। जो पुरुष इसका आश्रय लेगा, वह शान्ति पावेगा।
हे राम ! जबतक मनरूपी मृग इस समाधानरूपी वृक्ष का आश्रय नहीं लेता, तब तक भटकता फिरता है, शान्ति नहीं पाता। जैसे मृग वन में भटकता है, वैसे ही मनमृग भटकता है। द्वैत, अज्ञान और प्रमादरूपी वधिक उसे मारने लगते हैं, इससे दुःख पाता है। जब भय से इन्द्रियरूपी गाँववासियों के निकट जाता है, तब वे आप ही इसको देखकर पकड़ लेते हैं अर्थात् विषयों की ओर खींचते हैं और उससे यह बड़ा कष्ट पाता है। इनके भय से जब फिर वन में जाता है तो वहाँ विषयों के न मिलने की तपन से दुःखी होता है। जब उसको भी त्यागकर रसरूपी स्थानों को शान्ति के निमित्त दौड़ता है, तब काम-रूपी कुत्ता काटने को दौड़ता है और उसके भय से जब फिर वैराग्य-रूपी वन की ओर दौड़ता है तब क्रोधरूपी अग्नि जलाती है; वासना-रूपी मच्छर दुःख देते हैं। लोभ और मोहरूपी अँधेरी इसे अन्धा बना देती है। निदान पुत्र और धनरूपी हरे-हरे तृणों को देखकर यह उनको ग्रहण करता है, तब गढ़े में गिर पड़ता है। वह गढ़ा तृण से ढका हुआ है। वह तृण पुत्र और धन है। उनको सुन्दर देख यह ममतारूपी गढ़े में गिर पड़ता है। इस प्रकार दुःख पाता है। हे राम ! जब यह मनुष्य झूठ बोलता है, तब मृत्तिका में लौटने की सी चेष्टा करता है और जब मनरूपी भेड़िया आता है, तब वह उसको भक्षण कर जाता है। जब समाधानरूपी वृक्ष से जीव विमुख होता है, तब इतने कष्ट पाता है। और जब मनरूपी भेडिये से छूटता है, तब आशा रूपी जञ्जीर में बँध जाता है। निदान जब तक इस वृक्ष के निकट नहीं आता है; तब-तक बड़े कष्टदायक स्थानों को जाता है। तमाल वृक्षादिक के तले भी जाता है और कण्टक के वृक्षों के तले भी जाता है, परन्तु शान्ति किसी स्थान में नहीं पाता—बड़े-बड़े कष्टों को ही पाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे हरिणोपाख्याने वृत्तान्तयोगोपदेशो नाम शताधिकचतुःषष्टितमसर्गः ॥ १६४ ॥