भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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निर्वाण प्रकरण४६३


इसकी रक्षा का एक सामान्य और एक विशेष उपाय है। तप से इन्द्रियों को वश करना, दुखी पर दया करना और शास्त्र का पाठ और जप करना इत्यादिक शुभ क्रियारूपी यन्त्र की पुतली इसके पास विद्यमान रखिये तो सब विघ्न दूर हो जाते हैं। दूसरा श्रेष्ठ उपाय यह है कि सन्तों की संगति करके सत्-शास्त्रों को सुने। प्रणव जो ॐकार है उसका ध्यान और जप करे और उसका अर्थ विचारे। यही त्रिशूल-रूप ओलों के नाश का परम उपाय है। जब इतने शत्रुओं से रक्षा करे, तब उस बीज की रक्षा हो। सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के विचाररूपी वर्षाकाल के जल से सींचिये, तब अंकुर निकलता है और वह खूब लहलहाता है। जैसे द्वितीया के चन्द्रमा को सब कोई प्रणाम करता है, वैसे ही सन्तोष, दया और यशरूपी अंकुर निकलता है। उसके दो पत्ते निकलते हैं—एक वैराग्य, दूसरा विचार और वे दिन प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं। शास्त्रों से जो सुना है कि आत्मा सत्य है और जगत् मिथ्या है, उसका बारम्बार अभ्यास करना चाहिए। इस जल के सींचने से वे अंकुर दिन प्रतिदिन बढ़ते जावेंगे और उनके तने बड़े होंगे। हे राम ! जब डालें बड़ी होती हैं, तब रागद्वेषरूपी वानर उन पर चढ़कर उन्हें तोड़ डालते हैं, इससे इस वृक्ष को दृढ़ वैराग्य, सन्तोष और अभ्यासरूपी रस से पुष्ट करना उचित है। जैसे सुमेरु पर्वत है, वैसे ही सन्तोष से उसे पुष्ट करना चाहिए। जब यह होगा, तब उसमें सुन्दर पत्ते, डालें, फल और मञ्जरी लगेंगी; मार्ग में बहुत दूर तक इसकी छाया होगी और शान्ति, शीतलता, शुद्धता, कोमलता, दया, यश और कीर्ति इत्यादिक गुण प्रकट होंगे। उसके नीचे मनरूपी मृग विश्राम पाकर शीतल होता है, आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक ताप मिट जाते हैं और मन परम शान्ति पाता है। हे राम ! यह मैंने तुमसे समाधानरूपी वृक्ष कहा है। जहाँ यह वृक्ष उत्पन्न होता है, उस स्थान की शोभा कहीं नहीं जा सकती। जो इस वृक्ष की शरण जाता है, उसके ताप मिट जाते हैं और वह शान्ति पाता है। यह वृक्ष ब्रह्मरूपी


विचार एवंम् सर्वम् ।