भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 493

४४२ ❀ योगवासिष्ठ ❀

हो जाती है। वे भ्रान्ति रहित और नित्य ही समाधिस्थ होते हैं। इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकताप्रतिपादननाम शताधिकत्रिषष्टितमसर्गः ॥ १६३ ॥

राम बोले, हे भगवन् ! यह मनरूपी मृग संसाररूपी बन में भटकत है । वह समाधानरूप कौन वृक्ष है, जिसके नीचे आकर शान्त हो उसके फूल, फल और लता कैसे हैं और वह वृक्ष कहाँ होता है । यह कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार समाधानरूप वृक्ष उत्पन्न होता है, सो सुनो । सब साधन इसके पत्ते, पुष्प और लता आदि हैं । हे राम ! यह वृक्ष सब जीवों को कल्याण के निमित्त साधन चाहिये । अब तुम इसका क्रम सुनो । आत्मिक बल से तो यह उगता है और सन्तजनों के हृदय में यह उपजता है । चित्तरूपी पृथ्वी में लगता है और वैराग्य इसका बीज है वैराग्य दो प्रकार से प्राप्त होता है—एक तो दुःख और कष्ट प्राप्त होने से वैराग्य उपज आता है । दूसरा शुद्ध निष्काम हृदय होने पर भी वैराग्य उपजता है । उस वैराग्यरूपी बीज को जब चित्तरूपी भूमि में डालते हैं और निर्वासनारूपी हल फेरते हैं । निर्मल, शीतल और हृदयगम्य सन्तों की संगति और सत् शास्त्ररूपी जल जब मनरूपी क्यारी में पड़ता है, तब उस वृक्ष के बढ़ने की आशा होती है । बहुत जल से भी उसकी रक्षा करते हैं । आत्म विचाररूपी सूर्य की किरणों से पुष्ट करते हैं और उसके चहुँफेर धैर्यरूप बाड़ी करते हैं । तप, दान, तीर्थ, स्नानरूपी चौतरे पर उस बीज को रखकर रखवाली करते हैं कि सूख या जल न जाय । आशारूपी पक्षी से रक्षा करते हैं कि वैराग्यरूपी बीज को वह निकाल न ले जावे अभिलाषारूपी बूढ़े बैल से रक्षा करते हैं कि खेत में प्रवेश करके वह उसको रौंद न डाले । उसके निमित्त सन्तोष और सन्तोष की स्त्री मुदिता दोनों को पहरे पर बिठा रखते हैं । इस बीज का नाशक कुहिरा, जो मेघ से उपजता है, उससे भी इसकी रक्षा करते हैं, संपदा, धन और सुन्दर स्त्रियों का प्राप्त होना ही वैराग्यरूपी बीज का नाशक ओला है ।

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