भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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४७८ ☸ योगवासिष्ठ ☸

विरोधी हेतु है, जो उसे घेर लेता है । महाप्रलय में सब प्रकाश तमरूप हो जाते हैं। पर आत्मप्रकाश नित्य सिद्ध है; वह तम को भी प्रकाशित करता है और सदा ज्ञानरूप एकरस है। उसको त्यागकर और किसी ओर न लगना । हे राम ! सब दृश्य मिथ्या है; जैसे रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा कल्पित हो । जब तुम जागकर देखोगे, तब सबका अभाव हो जावेगा, जैसे बन्ध्या के पुत्र के रूप का अभाव है, वैसे ही सब विश्व मिथ्या भासित होगा, क्योंकि वह है ही नहीं, भ्रममात्र स्वप्न की नाईं अविचारसिद्ध है । विचार करने से वह आत्मा ही है; भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव से भिन्न नहीं होती, वैसे ही यह आत्मस्वरूप विश्व भी ज्ञानमात्र है । सब अहं, मम, देह, इन्द्रियादिक भी ज्ञानमात्र हैं—दृश्य कुछ दूसरी वस्तु नहीं, जब ऐसे निश्चय करोगे; तब विगतशोक और मोह से भी रहित होंगे और परमार्थसत्ता ज्यों की त्यों भासित होगी । जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते तैसे ही आत्मा में दृश्य उठता है । वह उसका रूप है, और जो भिन्न भासित हो, वह मिथ्या है । सब सृष्टि इस मनुष्य के हृदय में स्थित है, पर अज्ञान से बाहर भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने भीतर होती है और अपना स्वरूप होती है, पर निद्रादोष से बाहर जान पड़ती है और जब जागता है, तब अपना स्वरूप भासित होता है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी विचार करने से अपने अनुभव में भासित होती है । इससे स्थिर होकर देखो कि यह आत्मा सर्वदा जागती ज्योति है । उसको त्यागकर और किसी के लिए यत्न करना व्यर्थ है। हे राम ! अपने अनुभव में स्थित होने में क्या कष्ट है ? जो इसे कठिन जानते हैं, वे मूढ़ हैं और उनको धिक्कार है; क्योंकि वे गऊ के पग को समुद्र सदृश अपार और दुस्तर जानते हैं। उनसे बड़ा और कौन मूर्ख है ? अनुभव में स्थित होना गऊ के पग के गढ़े को नाँघने की तरह ही सुगम है । जो कोई और पदार्थों को पाने की इच्छा करेगा तो उनमें व्यवधान है, पर आत्मा में कुछ व्यवधान नहीं; क्योंकि वह अपना ही रूप है ।