योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४७७
रूप है । उसमें न कोई सुख है, न दुःख है न कोई इन्द्रियों का विषय है, वह परमशान्तरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमनिर्वाणयोगोपदेशो नाम शताधिकाष्टपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो ज्ञानवान् पुरुष है, वह निरावरण अर्थात् दोनों आवरणों से रहित है । एक असत्त्वापादक आवरण है और दूसरा अभानापादक आवरण । जब आत्मब्रह्म की सत्यता हृदय में न भासित हो वह असत्त्वापादक है, और जब आत्मा की सत्यता हृदय में भासित हो; परन्तु दृढ़ प्रत्यक्ष न भासित हो, वह अभानापादकआवरण है । असत्त्वापादक आवरण अज्ञानी को होता है और अभानापादक आवरणजिज्ञासु को । पर ज्ञानवान् को ये दोनों आवरण नहीं रहते । इस से वह निरावरण, शान्तरूप आकाशवत् निर्मल और निरालम्ब होता है । किसी गुणत्व के आश्रित नहीं होता । उसका एक-द्वैत भ्रम नष्ट हो जाता है क्योंकि उसने आत्मरूपी तीर्थ में स्नान किया है, जो अपवित्र को भी पवित्र कर देता है । जिस पुरुष ने शरीर में आत्मा का दर्शन किया है, उसका शरीर भी पवित्र हो जाता है । ऐसे पुरुष को शरीर की सत्यता नहीं रहती और संसार भी नहीं रहता । आत्मा का साक्षात्कार होने से सब इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं, और सब ब्रह्म ही देख पड़ता है, द्वैत कुछ नहीं रहता । सब आत्मस्वरूप है, पर उसमें संकल्प से नाना प्रकार की सृष्टि भासित होती है ।
हे राम ! तुम संकल्प की ओर मत जाओ; क्योंकि चित्त की वृत्ति क्षण-क्षण में बदलती है और अनन्त योजनपर्यन्त चली जाती है । जो उसका अनुभव करनेवाली सत्ता मध्य में है और जिसके आश्रय मे वह जाती है, वह चिन्मात्र तुम्हारा स्वरूप है । जब तुम उसमें स्थित होकर देखोगे तब अहं या इच्छा फुरने में भी ब्रह्मसत्ता भासित होगी । हे राम ! यह संवित् सदा प्रकाशरूप, चित्त के क्षोभ से रहित और द्वैत-रूप विकार से रहित शुद्ध है । जितने प्रकाश हैं, उनके विरोधी भी हैं । जैसे दीपक का विरोधी पवन है, जो निर्वाण करता है । सूर्य का