भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

४७६ ☸ योगवाशिष्ट ☸

रूप अहन्ता नष्ट होता है, तब जीव उस पद को प्राप्त होता है, जिसमें अणिमा आदिक सिद्धियाँ भी सूखे तृण की तरह तुच्छ लगती हैं। वह ऐसा आनन्दरूप है जिसमें ब्रह्मादिक का सुख भी तृण समान लगता है। हे राम ! जिसको ऐसा ब्रह्मानन्द पद प्राप्त हुआ है, उसको फिर किसी की इच्छा नहीं रहती। मारनेवाले विष आदिक पदार्थ उसको मृतक नहीं करते और जिलानेवाले पदार्थ अमृत आदिक नहीं जिलाते, केवल निर्वाणपद में उसकी स्थिति है।

हे राम ! जिस पुरुष को संपूर्ण संसार से वैराग्य हुआ है, उसको संसार के पदार्थ सुखदायक नहीं लगते, मिथ्या जान पड़ते हैं। वह संसारसमुद्र के पार हो गया है। जिनकी संसार की वासना और अहंता नष्ट हुई है, उनकी मूर्ति देखने भर को भासित होती है। वे वासनाहीन ज्ञानवान् शान्तरूप हैं। हे राम ! इच्छा ही बन्धन है। जब इच्छा का अभाव हो, तब आनन्द हो। इच्छा भी तब उठती है, जब जीव संसार का सत्य जानता है और संसार की सत्यता अहंता से प्रतीत होती है। जब अहंतारूपी बीज नष्ट हो, तब निर्वाणपद की प्राप्ति हो। हे राम ! संसार कुछ बना नहीं, भ्रम से सिद्ध हुआ है। सब ही ब्रह्म है; उस परमात्मा में जो परिच्छिन्न अहंता उत्पन्न हुई, वही उपाधि है। हे राम ! बुद्धि आदि जितने दृश्य हैं, ये जिसको अपने में स्वाद नहीं देते और जो आकाश की तरह निसंग रहता है, उसको सन्त मुक्तरूप कहते हैं। हे राम ! यह अहंता अविचार से उपजती है और विचार करने में असत्य हो जाती है। वास्तव में अहंता दुःख देती है; इससे तुम निरहंकार होकर चेष्टा करो। जैसे यन्त्र की पुतली अहं अभिमान से रहित चेष्टा करती है, वैसे ही तुम निरहंकार होकर चेष्टा करो और अपने स्वरूप में स्थित होओ, तब व्यवहार और अव्यवहार तुमको तुल्य हो जावेगा। जैसे पवन को स्पन्दन-निःस्पन्द, दोनों तुल्य होते हैं, वैसे ही तुमको तुल्य हो जावेगा और अहंकार से रहित तुम्हारी चेष्टा होगी। अहंता ही दुःख है; जब अहंता का नाश होगा, तब तुम शान्त, निर्मल और अनामय पद को प्राप्त होगे, जो सब पदार्थों का अधिष्ठान है और सबका अपना