भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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✻ निर्वाण प्रकरण ✻

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आत्मा है। पृथ्वी आदिक तत्त्व जो प्रकट हुए हैं, उनमें प्रथम आकाश है, फिर वायु, फिर अग्नि, फिर जल और फिर पृथ्वी प्रकट हुई है। ये सब अनिच्छित चमत्कार प्रकट हुए हैं—इससे सब आत्मरूप हैं। जैसे वट-बीज में वृक्ष होता है वैसे ही आत्मरूपी बीज में जगत् होता है और नाना प्रकार भासित होते हैं। हे राम ! जैसे एक बीज ही नाना प्रकार के रूप रखता है, परन्तु बीज से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही आत्मसत्ता नाना प्रकार से भासित होती है, परन्तु बीज की तरह परिणामी नहीं है। विश्व आत्मा का चमत्कार है, इससे उसी का रूप है। जैसे सुवर्ण में अनेक आभूषण होते हैं, सो वे सुवर्ण भिन्न नहीं होते वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है, द्वैत नहीं। जो आत्मा से इतर हो तो भासित न हो; इससे जो भासित होता है, वह चैतन्यरूप है। दृश्य और द्रष्टा एक ही रूप है; द्रष्टा ही दृश्य की तरह होकर भासित होता है।

हे राम ! जैसे कोई पुरुष तुम्हारे निकट सोया हो और उसको स्वप्न आवे कि मेघ गर्जते हैं और नाना प्रकार की चेष्टा होती है तो वह सब उसी को दिखता है, तुमको नहीं दिखता, वैसे ही यह दृश्य तुम्हारी भावना में स्थित है और हमको आकाशरूप है। हे राम ! चैतन्य आकाश शान्त-रूप है; उसमें सृष्टि नहीं बनी और जब कुछ उपजा नहीं तो नष्ट भी नहीं होता। वह केवल शान्तरूप है, पर भ्रम से जगत् दिखता है। कोई जैसे बालक मनोराज्य से आकाश में पुतलियाँ रचे तो आकाश में कुछ नहीं बना, परन्तु उसके संकल्प में है, वैसे ही यह विश्व मनरूपी बालक ने रचा है। उसके रचे हुए में ज्ञानवान् को शून्यता भासित होती है। हे राम ! संकल्पमात्र से ही सृष्टि हुई है। जब इसका संकल्प नष्ट होता है, तब शान्तपद शेष रहता है। निरहंकार सत्तामात्र असत् की तरह स्थित है। फिर उस चिन्मात्र अद्वैत में अहन्ता करके जगत् भासित होता है। जब अहं भाव उठता है, तब जगत् भासित होता है, और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब अहन्तारूप भ्रम मिट जाता है, जब अहन्ता-रूप भ्रम मिट जाता है, तब जगत् और इच्छा का भी अभाव हो जाता है। इससे ज्ञानी को इच्छा और वासना कोई नहीं रहती। जब परिच्छिन्न