भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 475, कुल 1734 में से

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✵ योगवाशिष्ट ✵

डालकर आकाश में पर्वत उड़ते दिखाते हैं, वैसे ही अस्तित्वहीन जगत संकल्प के स्फुरण से भासित होता है। हे राम! ब्रह्मसर्ग और चित्तसर्ग में कुछ भेद नहीं। परमार्थ दृष्टि से दोनों एक ही हैं। दृष्टि, सृष्टि पर्याय हैं, और नानात्व भी इसकी भावना से भासित होते हैं। आत्मा में दूसरा कुछ नहीं बना। चित्त और चैत्य आत्मा से भिन्न नहीं। चित्त ही चैत्य होकर भासित होता है। ज्ञान से इनकी एकता होती है—इसी से दृश्य भी द्रष्टारूप है, जैसे स्वप्न में शुद्ध संवित् ही दृश्यरूप होकर स्थित होती है, और जागने से एक हो जाती है। एकता भी तब होती है, जब वही रूप हो। इससे तुम अब भी वही जानो। दृश्य, दर्शन और द्रष्टा की त्रिपुटी भी सब वही रूप है। हे राम! जो सजाति है उसकी एकता होती है, विजाति की एकता नहीं होती। जैसे जल में जल की एकता होती है, वैसे ही बोध से सब की एकता होती है। दृश्य भी वही रूप है, जिससे एकता हो जाती है। जो दृश्य आत्मा से भिन्न होता तो एकता न होती। हे राम! आकाश आदिक तत्त्व भी आत्मरूप हैं। जिससे ये सब हैं, जो यह सब है और जो सर्वव्यापी सर्वगत सबको धारण कर रहा है, सब वही है। ऐसे सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है। जो भासित होता है, सब वही है। जैसे जल में गलाने की शक्ति है और काष्ठ में नहीं वैसे ही ब्रह्म में भावना स्वभाव है, और में नहीं। ब्रह्मभावना से सब ब्रह्म ही भासित होता है।

हे राम! जड़ पदार्थ भी भ्रम ही हैं; क्योंकि जो दिखता है, वह ब्रह्म ही है; जड़ हो तो दिखे नहीं। जड़ चेतना शुद्ध संवित् में है, उसमें चेतन से भिन्न कुछ नहीं है। जैसे शुद्ध संवित् में स्वप्न आता है और उसमें जड़ और चेतन भी दिखते हैं, परन्तु जो जड़ दिखते हैं, वे भी उस संवित् में चेतन हैं; क्योंकि चेतन हैं, तब दिखते हैं। जिनको शुद्ध संवित् में अहं प्रत्यय नहीं, वह अज्ञानी है जान नहीं सकता। परन्तु सब ब्रह्म है। जैसे समुद्र में जो जल होता है, वह ऊँचे आवे तो भी जल है और नीचे को जावे तो भी जल है, वैसे ही जो कुछ दीखता या भासित होता है, सो सब ब्रह्मस्वरूप है, भिन्न नहीं। वह ब्रह्म इन्द्रियों का भी

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