भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४७३

किसी का संकल्प होता है, वैसी ही सृष्टि उसको देख पड़ती है । जैसे चिन्तामणि और कल्पवृक्ष में दृढ़ संकल्प होता है तो उनसे यथेच्छित पदार्थ निकल आते हैं, पर वे कुछ बने नहीं, और चिन्तामणि भी परिणाम को प्राप्त नहीं हुई, ज्यों की त्यों पड़ी है, केवल संकल्प की दृढ़ता से वे पदार्थ भासित होते हैं, वैसे ही यह प्रपञ्च भी आकाश-रूप है । जैसे आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है ।

हे राम ! सिद्ध के जो वचन स्फुरते हैं, वही संकल्प की तीव्रता होती है । जो चित्त शुद्ध होता है तो दूसरी सृष्टि को भी जानता है । जो पुरुष वचन सिद्ध होने के निमित्त वासना को सूक्ष्म करता है, अर्थात् रोकता है तो उससे वचन सिद्ध पाता है, और जैसा संकल्प करता है, वैसा ही सिद्ध होता है । हे राम ! जितना यह दृश्य की ओर से उपरत होकर अन्तर्मुख होता है, उतने ही वचन सिद्ध होते जाते हैं—चाहे वर दे, चाहे शाप दे, वह पूरा होता है । हे राम ! एक प्रमाण ज्ञान है कि यह पदार्थ इस प्रकार है । उसका जो नामरूप है, वह सब आकाश-रूप भ्रममात्र है—आत्मा में और कुछ नहीं । आत्मरूपी समुद्र में जगत्-रूपी तरङ्ग उठते हैं । वे आत्मरूप ही हैं । जिनको ऐसा ज्ञान हुआ है, उनको इच्छा और अनिच्छा का ज्ञान नहीं रहता और सब आकाश-रूप भासित होता है । हे राम ! आत्मरूपी फूल में यह जगत् सुगन्ध रूप है । जैसे पवन और स्पन्दन में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है । पत्थर पर लकीर खींचिये तो वह पत्थर से भिन्न नहीं होती, वैसे ही ब्रह्म से जगत् भिन्न नहीं है । हे राम ! देश, काल, पृथ्वी, आदिक तत्त्व और मैं, मेरा सब आत्मरूप और अविनाशी है । जिनको ऐसा निश्चय हुआ है, उनको रागद्वेष नहीं रहता । उन्हें सब आत्मरूप ही प्रतीत होता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदुपदेशो नाम शताधिकसप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध आत्मतत्त्व में जो संवेदन हुआ है, उससे आगे जगत् भासित हुआ है । जैसे किसी के नेत्र में एक अञ्जन