भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 473

४७२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

भ्रममात्र है । जब आत्मस्वरूप में जागकर देखोगे, तब द्वैतभ्रम निवृत्त हो जावेगा और केवल अद्वैत आत्मा ही प्रतीत होगा, दृश्य का अभाव हो जावेगा । ये पृथ्वी आदिक जो तत्त्व भासित होते हैं, सो अविद्यमान हैं और इनकी प्रतिभात होना मिथ्या उदय हुआ है । जैसे स्वप्न में न होने पर भी पृथ्वी आदिक तत्त्व प्रतीत होते हैं, परन्तु हैं नहीं, वैसे ही आत्मा में यह जगत् भासित होता है । हे राम ! पृथ्वी, दीवार, कोट, पर्वत आदि प्रपञ्च आकाशरूप हैं । तब ग्रहण या त्याग किस का हो ? आकाशरूपी दीवार पर संकल्प ने चित्त रचे हैं, और रङ्ग चेतना का चढ़ा है । इससे विश्व संकल्पमात्र है । जैसा-जैसा निश्चय होता है, वैसी ही वैसी सृष्टि प्रतीत होती है । यदि कुछ बना होता तो और का और न प्रतीत होता । इससे कुछ बना नहीं, जैसा संकल्प होता है, वैसा ही रूप आगे हो भासित होता है ।

हे राम ! सिद्धों के पास एक चूर्ण होता है । उससे वे जो चाहते हैं, सो करते हैं । पर्वत को आकाश और आकाश को पर्वत बना देते हैं । वह चूर्ण मैं तुमसे कहता हूँ । जब चित्तरूपी सिद्ध संकल्परूपी चूर्ण से स्फुरता है, तब आत्मरूपी आकाश में पर्वत हो भासित होते हैं । और जब चित्तरूपी सिद्ध का संकल्प उलटता है, तब पर्वत भी आकाशरूप भासित होता है । जैसे स्वप्न में संकल्प उठता है, तब अनुभव में पर्वत आदिक पदार्थ भासित होते हैं, और जब संकल्प से जागता है, तब स्वप्न के पर्वत आकाशरूप हो जाते हैं । तो आकाश ही पर्वतरूप हुआ और पर्वत ही आकाशरूप होता है । वैसे ही हे राम ! यह सृष्टि कुछ बनी नहीं, संकल्पमात्र है । जैसा संकल्प होता है, वैसा ही भासित होता है । जब विश्व के अत्यन्त अभाव का संकल्प किया, तब वैसा ही प्रतीत होता है । जैसे विश्व का अभ्यास किया है और विश्व भासित हुआ है, वैसे ही आत्मा का अभ्यास कीजिये तो क्यों न भासित हो ? वह तो अपना ही स्वरूप है । जब आत्मा का अभ्यास कीजियेगा, तब आत्मा ही भासित होगा, विश्व का अभाव हो जावेगा । अपने-अपने संकल्प से आकाश में अनेक सृष्टि भासित होती हैं । जैसा