भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 1734 में से

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✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ४७१

किया है, उनको इच्छा-अनिच्छा दोनों तुल्य हैं। तो भी मेरा निश्चय यह है कि इच्छा के त्याग में सुख है। जिसकी इच्छा दिन-दिन घटती जाय, और आत्मा की ओर आवे उसको ज्ञानवान् मोक्षभागी कहते हैं; क्योंकि संसार भ्रम से सिद्ध है और अपनी ही कल्पना जगतरूप होकर दिखती है; विचार करने से कुछ नहीं निकलता। संसार के उदय होने से आत्मा को कुछ आनन्द नहीं, और नाश होने से खेद नहीं होता; क्योंकि वह भिन्न नहीं है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और मिटते हैं तो जल को हर्ष या शोक कुछ नहीं होता, क्योंकि वे जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप है। तब इच्छा क्या और अनिच्छा क्या ? हे राम ! आदि परमात्मा से जो चित्तशक्ति उठी है, उसमें जब अहं हुआ, तब स्वरूप का प्रमाद हुआ और यही चित्तशक्ति मनरूप हुई। फिर आगे देह और इन्द्रियाँ हुईं और अज्ञान से मिथ्याभ्रम उदय हुआ। इसी प्रकार जीव अपने साथ मिथ्या शरीर देखता है। जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ़रूप हो जाता है, वैसे ही चित्संवित् प्रमाद की दृढ़ता से जीव मन, इन्द्रियाँ देहरूप होता है। जैसे कोई स्वप्न में अपना मरना देखता है, वैसे ही जीव शरीर को अपने साथ देखता है। जब चित्तशक्ति नष्ट होती है, तब शरीर कहाँ-और मन कहाँ। यह कुछ नहीं भासित होता ? जैसे स्वप्न में भ्रम से शरीरादिक दिखते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी जानो कि मिथ्या भ्रम से उदय है। जब अपने स्वरूप की ओर जीव आवे, तब सभी भ्रम मिट जाते हैं।

हे राम ! जैसे भ्रम से आकाश में नीलापन दिखता है, वैसे ही विश्व भी न होने पर भी भ्रम से भासित होता है। आत्मा में यह कुछ आरम्भ और परिणाम करके नहीं बना, उसी का स्वरूप है। जैसे आकाश और शून्यता तथा पवन और स्पन्दन में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव-रूप है—कुछ भिन्न नहीं, वैसे ही जगत् और आत्मा अनुभव से कुछ भिन्न नहीं है। हे राम ! चैतन्य आकाश परम शान्तरूप है। उसमें देह और इन्द्रियाँ भ्रम से प्रतीत होती हैं। क्रिया, काल, पदार्थ सब

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