योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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वैसे ही जिसको यह जगत् सत्य लगता है, वह निद्रा में सोया हुआ है।
हे राम! मैंने बहुत प्रकार के स्थान देखे हैं, जिनमें रोग और औषध भी नाना प्रकार के हैं, परन्तु इच्छारूपी छुरी के घाव की औषध नहीं देख पड़ी। वह जप, तप, पाठ, यज्ञ, दान और तीर्थ से निवृत्त नहीं होती। और जितने संसार के पदार्थ हैं, उनसे भी इच्छारूपी रोग नष्ट नहीं होता। जब आत्मरूपी औषध की जावे तभी नाश होता है, अन्यथा किसी प्रकार यह रोग नहीं जाता। हे राम! जिस पुरुष को ज्ञान प्राप्त होता है, इसकी इच्छा स्वाभाविक ही निवृत्ति हो जाती है। पर आत्मज्ञान के बिना अनेक यत्नों से भी न जावेगी, जैसे स्वप्न की वासना जागे बिना नहीं जाती और अनेक उपाय करिये तो भी दूर नहीं होती। हे राम! ज्यों-ज्यों वासना क्षीण होती है, त्यों-त्यों सुख की प्राप्ति होती है और ज्यों-ज्यों वासना की अधिकता होती है, त्यों-त्यों दुःख अधिक होते हैं। यह आश्चर्य है कि मिथ्या संसार सत्य भासित होता है। जैसे बालक को वृक्ष में बेताल दिखता है और उससे वह भय पाता है, पर वह है नहीं, वैसे ही मूर्खता से आत्मा में संसार की कल्पना है। उससे जीव दुखी होता है। हे राम! जो कुछ स्थावर-जङ्गम जगत् दिखता है सो सब ब्रह्मरूप है, ब्रह्म से भिन्न नहीं, पर भ्रम से भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। जैसे आकाश में शून्यता, जल में द्रवता और सत्य में सत्यता ही है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। वह न सत्य है और न असत्य, आत्मा अनिर्वाच्य है।
हे राम! दूसरा कुछ बना नहीं तो क्या कहिये? केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। वह सबका अपना वास्तव रूप है। जब उसका साक्षात्कार होता है, तब अहंश्रूप भ्रम मिट जाता है। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे ही आत्मा का साक्षात्कार होने पर अनात्म अभिमानरूपी अन्धकार का अभाव हो जाता है, और परम निर्वाण होता है। उसको एक और दो भी नहीं कह सकते। वह केवल शान्तरूप परम शिव है। जैसे आकाश में नीलिमा दिखती है, वैसे ही आत्मा में जगत् प्रतीत होता है। हे राम! जिन्होंने ऐसे निश्चय