योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 470, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४६६
रहती। ज्यों-ज्यों ज्ञानकला जागती है, त्यों-त्यों द्वैत का नाश होता जाता है और द्वैत के निवृत्त होने से वासना भी निवृत्त हो जाती है। हे राम! उसको ज्यों-ज्यों स्वरूपानन्द प्राप्त होता है, त्यों-त्यों संसार नीरस होता जाता है और जब संसार नीरस हो गया, तब वह वासना किसकी करे?
हे राम! इसको अमृत में विष की भावना हुई थी, इससे अमृत विष लगता था, पर जब विष की भावना का त्याग हुआ, तब अमृत तो आगे ही था, वही हो जाता है, वैसे ही जो कुछ तुमको भासित होता है, सो सब ब्रह्मरूपी अमृत ही है। जब उस ब्रह्मरूपी अमृत में अज्ञान से जगतरूपी विष की भावना होती है, तब जीव दुःख पाता है, और जब संसार की भावना त्यागी, तब आनन्दरूप ही है। उसको करना, न करना, दोनों तुल्य है। यद्यपि ज्ञानवान् में इच्छा देख पड़ती है तो भी उसके निश्चय में नहीं। उसकी इच्छा भी अनिच्छा ही है, क्योंकि उसके हृदय में संसार की भावना नहीं। तब इच्छा किसकी रहे? हे राम! यह संसार है नहीं, हमको तो आकाशरूप शून्य भासित होता है। जैसे और के मनोराज्य में आने-जाने का खेद नहीं होता, वैसे ही यह जगत् हमको और की चिन्तना सदृश है। जैसे किसी पुरुष ने मनोराज्य से मार्ग में कोई स्थान रचकर उसमें किवाड़ लगाये हों और नाना प्रकार का प्रपञ्च रचा हो तो दूसरे पुरुष को उसमें जाने के लिये कोई नहीं रोकता और न कोई किवाड़ हैं, न कोई पदार्थ है; उसको शून्यूमार्ग का निश्चय होता है, वैसे ही हमको तो सब प्रपञ्च शून्य ही प्रतीत होता है। अज्ञानी के हृदय में हमारी चेष्टा है, पर हमको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं दीखता। हे राम! जिसको जगत् ही न दिखे, उसको इच्छा किसकी हो? जिसके हृदय में संसार की सत्यता है, उसको इच्छा भी फुरती है और उसके हृदय में रागद्वेष भी उठता है। जिसके हृदय में रागद्वेष उठता हो तो जानिये कि उसके हृदय में संसारसत्ता स्थित है। और जिसको नाना पदार्थसहित संसार सत्य प्रतीत होता हो वह मूर्ख है। वह अज्ञाननिद्रा में सोया हुआ है। जैसे निद्रादोष से कोई स्वप्न में अपना मरण देखता है,