योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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रूपी मन का मृग है। उस पशु का संग कभी न करना। मूर्ख का संग बुद्धि का विपर्यय कर डालता है। इससे विपर्ययबुद्धि को त्याग कर आत्मपद में स्थित होओ। विश्व भी सब तुम्हारा अनुभव है। इसका सुख-दुःख विद्यमान भी दीखता है; परन्तु आत्मा में भ्रममात्र भासित है-कुछ है नहीं। विश्व भी आनन्दरूप शिव ही है। तुम विचार करके देखो, दूसरा तो कुछ नहीं है। जैसे मृत्तिका में नाना प्रकार की सेना, हाथी, घोड़ा, आदि होते हैं, परन्तु मृत्तिका से भिन्न कुछ नहीं है, वैसे ही सब विश्व आत्मरूप है, भिन्न नहीं। उसमें कारण-कार्यभाव देखना भी मूर्खता है; क्योंकि जब दूसरी वस्तु ही नहीं, तब कारण-कार्य किसका हो और इच्छा किसकी करते हो? जिस संसार की इच्छा करते हो, वह है ही नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है और सीपी में रूपा प्रतीत होता है, सो वह कुछ दूसरी वस्तु नहीं है, अधिष्ठान किरण और सीपी है, वैसे ही अधिष्ठान-रूप परमार्थसत्ता ही है। न सुख है, न दुःख, यह जगत् केवल शिवरूप है। उस शिव चिन्मात्र से मृत्तिका की सेना के समान अन्य कुछ नहीं, तब इच्छा कैसे उदय हो ?
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो सब ब्रह्म ही है तो इच्छा-अनिच्छा भी उससे भिन्न न होगी ? इच्छा उदय हो चाहे न हो, फिर आप कैसे कहते हैं कि इच्छा का त्याग करो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष की ज्ञप्ति जागी है अर्थात् जो ज्ञानरूप आत्मा में जागा है, उसको सब ब्रह्म ही है, और इच्छा-अनिच्छा, दोनों तुल्य है। इच्छा भी ब्रह्म है और अनिच्छा भी ब्रह्म है। हे राम ! ज्यों-ज्यों ज्ञानसंवित् होती है, त्यों-त्यों वासना का क्षय होता है। जैसे सूर्य के उदय होने पर रात्रि नष्ट हो जाती है, वैसे ही ज्ञान के उपजने से वासना नहीं रहती। हे राम ! ज्ञानवान् को ग्रहण या त्याग का कुछ कर्तव्य नहीं होता और उसे इच्छा-अनिच्छा तुल्य है। यद्यपि ऐसा ही है। तथापि स्वाभाविक रूप से ही उसे वासना नहीं रहती। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार नहीं रहता, वैसे ही आत्मा का साक्षात्कार होने पर द्वैतवासना नहीं