योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४६७
उपाय करता है। हे राम! इच्छारूपी क्षेत्र में रागद्वेषरूपी विष की बेलि है। जो पुरुष उसे दूर करने का उपाय नहीं करता, वह मनुष्य नहीं, पशु है। यह इच्छारूपी विष का वृक्ष बढ़कर नाश का कारण होता है। इससे तुम इसका नाश करो।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छानिषेधयोगोपदेशो नाम शताधिकषट्पञ्चाशत्तमसर्गः ॥ १५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! इच्छारूपी विष के नाश का उपाय तुमसे पहले भी कहा है, और अब फिर स्पष्ट करके कहता हूँ। यह संसार इच्छा के त्याग करने के योग्य है। यदि इसे आत्मसत्ता से भिन्न कीजिये तो यह मिथ्या है, उसमें क्या इच्छा करना है? और जो आत्मा की ओर देखिए तो सब आत्मा ही है। तब क्यों इच्छा करना? इच्छा दूसरे में होती है, पर वास्तव में दूसरा तो कुछ है ही नहीं, तो इच्छा किसकी कीजिए? हे राम! द्रष्टा और दृश्य भी मिथ्या है। द्रष्टा इन्द्रियाँ और दृश्य विषय, ग्राहक इन्द्रियाँ और ग्राह्य विषय अविचार सिद्ध हैं, भ्रम से भासित होते हैं। आत्मा में कोई नहीं। जैसे स्वप्न में भ्रम से रूप दिखते हैं, वैसे ही ये ग्राह्य-ग्राहक भ्रम से भासित होते हैं। सुख-दुःख भी इन्हीं से होते हैं, आत्मा में यह कुछ नहीं है। हे राम! द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तीनों ब्रह्म में कल्पित हैं। वास्तव में सब ब्रह्म ही है। चिरकाल से हम खोज रहे हैं, परन्तु द्वैत हमको नजर नहीं आता; एक ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों भासित होती है, जो निराभास फुरने से रहित और ज्ञानरूप है। वह आकाश से भी सूक्ष्म है, और सब जगत् भी वही है—वही मैं हूँ। हे राम! जैसे जल में तरङ्ग, आकाश में शून्यता, पवन में स्पन्दन और अग्नि में उष्णता सब वही अनन्यरूप है, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है। आत्मा ही विश्व आकार होकर भासित होता है, और कुछ नहीं हुआ। हे राम! जो वही है, तब इच्छा किसकी करते हो। जब मैं तुमसे यह मोक्ष का उपाय कहता हूँ, तब तुम अपने को क्यों बन्धन में डालते हो? बड़ा बन्धन इच्छा ही है। जिस पुरुष की इच्छा बढ़ती जाती है, वह जगत्-