योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४७३
किसी का संकल्प होता है, वैसी ही सृष्टि उसको देख पड़ती है । जैसे चिन्तामणि और कल्पवृक्ष में दृढ़ संकल्प होता है तो उनसे यथेच्छित पदार्थ निकल आते हैं, पर वे कुछ बने नहीं, और चिन्तामणि भी परिणाम को प्राप्त नहीं हुई, ज्यों की त्यों पड़ी है, केवल संकल्प की दृढ़ता से वे पदार्थ भासित होते हैं, वैसे ही यह प्रपञ्च भी आकाश-रूप है । जैसे आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है ।
हे राम ! सिद्ध के जो वचन स्फुरते हैं, वही संकल्प की तीव्रता होती है । जो चित्त शुद्ध होता है तो दूसरी सृष्टि को भी जानता है । जो पुरुष वचन सिद्ध होने के निमित्त वासना को सूक्ष्म करता है, अर्थात् रोकता है तो उससे वचन सिद्ध पाता है, और जैसा संकल्प करता है, वैसा ही सिद्ध होता है । हे राम ! जितना यह दृश्य की ओर से उपरत होकर अन्तर्मुख होता है, उतने ही वचन सिद्ध होते जाते हैं—चाहे वर दे, चाहे शाप दे, वह पूरा होता है । हे राम ! एक प्रमाण ज्ञान है कि यह पदार्थ इस प्रकार है । उसका जो नामरूप है, वह सब आकाश-रूप भ्रममात्र है—आत्मा में और कुछ नहीं । आत्मरूपी समुद्र में जगत्-रूपी तरङ्ग उठते हैं । वे आत्मरूप ही हैं । जिनको ऐसा ज्ञान हुआ है, उनको इच्छा और अनिच्छा का ज्ञान नहीं रहता और सब आकाश-रूप भासित होता है । हे राम ! आत्मरूपी फूल में यह जगत् सुगन्ध रूप है । जैसे पवन और स्पन्दन में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है । पत्थर पर लकीर खींचिये तो वह पत्थर से भिन्न नहीं होती, वैसे ही ब्रह्म से जगत् भिन्न नहीं है । हे राम ! देश, काल, पृथ्वी, आदिक तत्त्व और मैं, मेरा सब आत्मरूप और अविनाशी है । जिनको ऐसा निश्चय हुआ है, उनको रागद्वेष नहीं रहता । उन्हें सब आत्मरूप ही प्रतीत होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदुपदेशो नाम शताधिकसप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध आत्मतत्त्व में जो संवेदन हुआ है, उससे आगे जगत् भासित हुआ है । जैसे किसी के नेत्र में एक अञ्जन
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✵ योगवाशिष्ट ✵
डालकर आकाश में पर्वत उड़ते दिखाते हैं, वैसे ही अस्तित्वहीन जगत संकल्प के स्फुरण से भासित होता है। हे राम! ब्रह्मसर्ग और चित्तसर्ग में कुछ भेद नहीं। परमार्थ दृष्टि से दोनों एक ही हैं। दृष्टि, सृष्टि पर्याय हैं, और नानात्व भी इसकी भावना से भासित होते हैं। आत्मा में दूसरा कुछ नहीं बना। चित्त और चैत्य आत्मा से भिन्न नहीं। चित्त ही चैत्य होकर भासित होता है। ज्ञान से इनकी एकता होती है—इसी से दृश्य भी द्रष्टारूप है, जैसे स्वप्न में शुद्ध संवित् ही दृश्यरूप होकर स्थित होती है, और जागने से एक हो जाती है। एकता भी तब होती है, जब वही रूप हो। इससे तुम अब भी वही जानो। दृश्य, दर्शन और द्रष्टा की त्रिपुटी भी सब वही रूप है। हे राम! जो सजाति है उसकी एकता होती है, विजाति की एकता नहीं होती। जैसे जल में जल की एकता होती है, वैसे ही बोध से सब की एकता होती है। दृश्य भी वही रूप है, जिससे एकता हो जाती है। जो दृश्य आत्मा से भिन्न होता तो एकता न होती। हे राम! आकाश आदिक तत्त्व भी आत्मरूप हैं। जिससे ये सब हैं, जो यह सब है और जो सर्वव्यापी सर्वगत सबको धारण कर रहा है, सब वही है। ऐसे सर्वात्मा को मेरा नमस्कार है। जो भासित होता है, सब वही है। जैसे जल में गलाने की शक्ति है और काष्ठ में नहीं वैसे ही ब्रह्म में भावना स्वभाव है, और में नहीं। ब्रह्मभावना से सब ब्रह्म ही भासित होता है।
हे राम! जड़ पदार्थ भी भ्रम ही हैं; क्योंकि जो दिखता है, वह ब्रह्म ही है; जड़ हो तो दिखे नहीं। जड़ चेतना शुद्ध संवित् में है, उसमें चेतन से भिन्न कुछ नहीं है। जैसे शुद्ध संवित् में स्वप्न आता है और उसमें जड़ और चेतन भी दिखते हैं, परन्तु जो जड़ दिखते हैं, वे भी उस संवित् में चेतन हैं; क्योंकि चेतन हैं, तब दिखते हैं। जिनको शुद्ध संवित् में अहं प्रत्यय नहीं, वह अज्ञानी है जान नहीं सकता। परन्तु सब ब्रह्म है। जैसे समुद्र में जो जल होता है, वह ऊँचे आवे तो भी जल है और नीचे को जावे तो भी जल है, वैसे ही जो कुछ दीखता या भासित होता है, सो सब ब्रह्मस्वरूप है, भिन्न नहीं। वह ब्रह्म इन्द्रियों का भी
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आत्मा है। पृथ्वी आदिक तत्त्व जो प्रकट हुए हैं, उनमें प्रथम आकाश है, फिर वायु, फिर अग्नि, फिर जल और फिर पृथ्वी प्रकट हुई है। ये सब अनिच्छित चमत्कार प्रकट हुए हैं—इससे सब आत्मरूप हैं। जैसे वट-बीज में वृक्ष होता है वैसे ही आत्मरूपी बीज में जगत् होता है और नाना प्रकार भासित होते हैं। हे राम ! जैसे एक बीज ही नाना प्रकार के रूप रखता है, परन्तु बीज से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही आत्मसत्ता नाना प्रकार से भासित होती है, परन्तु बीज की तरह परिणामी नहीं है। विश्व आत्मा का चमत्कार है, इससे उसी का रूप है। जैसे सुवर्ण में अनेक आभूषण होते हैं, सो वे सुवर्ण भिन्न नहीं होते वैसे ही विश्व आत्मस्वरूप है, द्वैत नहीं। जो आत्मा से इतर हो तो भासित न हो; इससे जो भासित होता है, वह चैतन्यरूप है। दृश्य और द्रष्टा एक ही रूप है; द्रष्टा ही दृश्य की तरह होकर भासित होता है।
हे राम ! जैसे कोई पुरुष तुम्हारे निकट सोया हो और उसको स्वप्न आवे कि मेघ गर्जते हैं और नाना प्रकार की चेष्टा होती है तो वह सब उसी को दिखता है, तुमको नहीं दिखता, वैसे ही यह दृश्य तुम्हारी भावना में स्थित है और हमको आकाशरूप है। हे राम ! चैतन्य आकाश शान्त-रूप है; उसमें सृष्टि नहीं बनी और जब कुछ उपजा नहीं तो नष्ट भी नहीं होता। वह केवल शान्तरूप है, पर भ्रम से जगत् दिखता है। कोई जैसे बालक मनोराज्य से आकाश में पुतलियाँ रचे तो आकाश में कुछ नहीं बना, परन्तु उसके संकल्प में है, वैसे ही यह विश्व मनरूपी बालक ने रचा है। उसके रचे हुए में ज्ञानवान् को शून्यता भासित होती है। हे राम ! संकल्पमात्र से ही सृष्टि हुई है। जब इसका संकल्प नष्ट होता है, तब शान्तपद शेष रहता है। निरहंकार सत्तामात्र असत् की तरह स्थित है। फिर उस चिन्मात्र अद्वैत में अहन्ता करके जगत् भासित होता है। जब अहं भाव उठता है, तब जगत् भासित होता है, और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब अहन्तारूप भ्रम मिट जाता है, जब अहन्ता-रूप भ्रम मिट जाता है, तब जगत् और इच्छा का भी अभाव हो जाता है। इससे ज्ञानी को इच्छा और वासना कोई नहीं रहती। जब परिच्छिन्न
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रूप अहन्ता नष्ट होता है, तब जीव उस पद को प्राप्त होता है, जिसमें अणिमा आदिक सिद्धियाँ भी सूखे तृण की तरह तुच्छ लगती हैं। वह ऐसा आनन्दरूप है जिसमें ब्रह्मादिक का सुख भी तृण समान लगता है। हे राम ! जिसको ऐसा ब्रह्मानन्द पद प्राप्त हुआ है, उसको फिर किसी की इच्छा नहीं रहती। मारनेवाले विष आदिक पदार्थ उसको मृतक नहीं करते और जिलानेवाले पदार्थ अमृत आदिक नहीं जिलाते, केवल निर्वाणपद में उसकी स्थिति है।
हे राम ! जिस पुरुष को संपूर्ण संसार से वैराग्य हुआ है, उसको संसार के पदार्थ सुखदायक नहीं लगते, मिथ्या जान पड़ते हैं। वह संसारसमुद्र के पार हो गया है। जिनकी संसार की वासना और अहंता नष्ट हुई है, उनकी मूर्ति देखने भर को भासित होती है। वे वासनाहीन ज्ञानवान् शान्तरूप हैं। हे राम ! इच्छा ही बन्धन है। जब इच्छा का अभाव हो, तब आनन्द हो। इच्छा भी तब उठती है, जब जीव संसार का सत्य जानता है और संसार की सत्यता अहंता से प्रतीत होती है। जब अहंतारूपी बीज नष्ट हो, तब निर्वाणपद की प्राप्ति हो। हे राम ! संसार कुछ बना नहीं, भ्रम से सिद्ध हुआ है। सब ही ब्रह्म है; उस परमात्मा में जो परिच्छिन्न अहंता उत्पन्न हुई, वही उपाधि है। हे राम ! बुद्धि आदि जितने दृश्य हैं, ये जिसको अपने में स्वाद नहीं देते और जो आकाश की तरह निसंग रहता है, उसको सन्त मुक्तरूप कहते हैं। हे राम ! यह अहंता अविचार से उपजती है और विचार करने में असत्य हो जाती है। वास्तव में अहंता दुःख देती है; इससे तुम निरहंकार होकर चेष्टा करो। जैसे यन्त्र की पुतली अहं अभिमान से रहित चेष्टा करती है, वैसे ही तुम निरहंकार होकर चेष्टा करो और अपने स्वरूप में स्थित होओ, तब व्यवहार और अव्यवहार तुमको तुल्य हो जावेगा। जैसे पवन को स्पन्दन-निःस्पन्द, दोनों तुल्य होते हैं, वैसे ही तुमको तुल्य हो जावेगा और अहंकार से रहित तुम्हारी चेष्टा होगी। अहंता ही दुःख है; जब अहंता का नाश होगा, तब तुम शान्त, निर्मल और अनामय पद को प्राप्त होगे, जो सब पदार्थों का अधिष्ठान है और सबका अपना
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रूप है । उसमें न कोई सुख है, न दुःख है न कोई इन्द्रियों का विषय है, वह परमशान्तरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमनिर्वाणयोगोपदेशो नाम शताधिकाष्टपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो ज्ञानवान् पुरुष है, वह निरावरण अर्थात् दोनों आवरणों से रहित है । एक असत्त्वापादक आवरण है और दूसरा अभानापादक आवरण । जब आत्मब्रह्म की सत्यता हृदय में न भासित हो वह असत्त्वापादक है, और जब आत्मा की सत्यता हृदय में भासित हो; परन्तु दृढ़ प्रत्यक्ष न भासित हो, वह अभानापादकआवरण है । असत्त्वापादक आवरण अज्ञानी को होता है और अभानापादक आवरणजिज्ञासु को । पर ज्ञानवान् को ये दोनों आवरण नहीं रहते । इस से वह निरावरण, शान्तरूप आकाशवत् निर्मल और निरालम्ब होता है । किसी गुणत्व के आश्रित नहीं होता । उसका एक-द्वैत भ्रम नष्ट हो जाता है क्योंकि उसने आत्मरूपी तीर्थ में स्नान किया है, जो अपवित्र को भी पवित्र कर देता है । जिस पुरुष ने शरीर में आत्मा का दर्शन किया है, उसका शरीर भी पवित्र हो जाता है । ऐसे पुरुष को शरीर की सत्यता नहीं रहती और संसार भी नहीं रहता । आत्मा का साक्षात्कार होने से सब इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं, और सब ब्रह्म ही देख पड़ता है, द्वैत कुछ नहीं रहता । सब आत्मस्वरूप है, पर उसमें संकल्प से नाना प्रकार की सृष्टि भासित होती है ।
हे राम ! तुम संकल्प की ओर मत जाओ; क्योंकि चित्त की वृत्ति क्षण-क्षण में बदलती है और अनन्त योजनपर्यन्त चली जाती है । जो उसका अनुभव करनेवाली सत्ता मध्य में है और जिसके आश्रय मे वह जाती है, वह चिन्मात्र तुम्हारा स्वरूप है । जब तुम उसमें स्थित होकर देखोगे तब अहं या इच्छा फुरने में भी ब्रह्मसत्ता भासित होगी । हे राम ! यह संवित् सदा प्रकाशरूप, चित्त के क्षोभ से रहित और द्वैत-रूप विकार से रहित शुद्ध है । जितने प्रकाश हैं, उनके विरोधी भी हैं । जैसे दीपक का विरोधी पवन है, जो निर्वाण करता है । सूर्य का
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विरोधी हेतु है, जो उसे घेर लेता है । महाप्रलय में सब प्रकाश तमरूप हो जाते हैं। पर आत्मप्रकाश नित्य सिद्ध है; वह तम को भी प्रकाशित करता है और सदा ज्ञानरूप एकरस है। उसको त्यागकर और किसी ओर न लगना । हे राम ! सब दृश्य मिथ्या है; जैसे रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा कल्पित हो । जब तुम जागकर देखोगे, तब सबका अभाव हो जावेगा, जैसे बन्ध्या के पुत्र के रूप का अभाव है, वैसे ही सब विश्व मिथ्या भासित होगा, क्योंकि वह है ही नहीं, भ्रममात्र स्वप्न की नाईं अविचारसिद्ध है । विचार करने से वह आत्मा ही है; भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव से भिन्न नहीं होती, वैसे ही यह आत्मस्वरूप विश्व भी ज्ञानमात्र है । सब अहं, मम, देह, इन्द्रियादिक भी ज्ञानमात्र हैं—दृश्य कुछ दूसरी वस्तु नहीं, जब ऐसे निश्चय करोगे; तब विगतशोक और मोह से भी रहित होंगे और परमार्थसत्ता ज्यों की त्यों भासित होगी । जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते तैसे ही आत्मा में दृश्य उठता है । वह उसका रूप है, और जो भिन्न भासित हो, वह मिथ्या है । सब सृष्टि इस मनुष्य के हृदय में स्थित है, पर अज्ञान से बाहर भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने भीतर होती है और अपना स्वरूप होती है, पर निद्रादोष से बाहर जान पड़ती है और जब जागता है, तब अपना स्वरूप भासित होता है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी विचार करने से अपने अनुभव में भासित होती है । इससे स्थिर होकर देखो कि यह आत्मा सर्वदा जागती ज्योति है । उसको त्यागकर और किसी के लिए यत्न करना व्यर्थ है। हे राम ! अपने अनुभव में स्थित होने में क्या कष्ट है ? जो इसे कठिन जानते हैं, वे मूढ़ हैं और उनको धिक्कार है; क्योंकि वे गऊ के पग को समुद्र सदृश अपार और दुस्तर जानते हैं। उनसे बड़ा और कौन मूर्ख है ? अनुभव में स्थित होना गऊ के पग के गढ़े को नाँघने की तरह ही सुगम है । जो कोई और पदार्थों को पाने की इच्छा करेगा तो उनमें व्यवधान है, पर आत्मा में कुछ व्यवधान नहीं; क्योंकि वह अपना ही रूप है ।
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हे राम ! जिन पुरुषों ने आत्मा में स्थिति पाई है, उनको मोक्ष की इच्छा भी नहीं होती तो स्वर्गादिक की इच्छा कैसे हो ? मोक्ष और स्वर्ग आत्मा में, रस्सी के सर्प सदृश, मिथ्या भासित होते हैं—उनको केवल अद्वैत आत्मा का निश्चय होता है । हे राम ! स्वप्न में सुषुप्ति नहीं और सुषुप्ति में स्वप्न नहीं—इनका अनुभव करनेवाला शुद्ध सत्ता है, और ये दोनों मिथ्या हैं । ज्ञानियों को निर्वाण और जीना, दोनों तुल्य हैं । ऐसा जानकर वे किसी की इच्छा नहीं करते—यह प्रपञ्च उनको खरगोश की सींग और वन्ध्या के पुत्र सा मिथ्या प्रतीत होता है । हे राम ! हमको तो संसार सदा आकाशरूप लगता है । यदि तुम कहो कि उपदेश क्यों करते हो ? तो हमको कुछ आभास नहीं, तुम्हारी ही इच्छा तुमको वशिष्ठरूप होकर उपदेश करती है । हमको विश्व सदा शून्यरूप भासमान है । अज्ञानी हमको चेष्टा करते भी जानते हैं, पर हमारे निश्चय में चेष्टा भी नहीं, और हमारी चेष्टा कुछ अर्थाकार भी नहीं । अज्ञानी की चेष्टा अर्थाकार होती है; हमारी चेष्टा सत्य नहीं । इससे अर्थाकार भी नहीं होती । जैसे ढोल के शब्द का अर्थ नहीं होता कि क्या कहता है और वाणी से जो शब्द बोला जाता है, उसका अर्थ होता है, वैसे ही हमारी चेष्टा अर्थाकार नहीं, अर्थात् जन्म नहीं देती, और अज्ञानी की चेष्टा जन्म देती है । हमको संसार ऐसे प्रतीत होता है, जैसे अवयवी सब अवयवों को अपना स्वरूप ही देखता है, अर्थात् हाथ, पैर, शीश आदि सबको अपने ही अङ्ग देखता है । हे राम ! जगत् में एक ऐसे जीव दिखते हैं जिनको हम स्वप्न के जीव समझ पड़ते हैं और हमको वे शून्य आकाश-सदृश प्रतीत होते हैं । उनकी दृष्टि में हम नाना प्रकार की चेष्टा करते दीखते हैं । हमको तो जगत् ऐसा भासित होता है, जैसे समुद्र में तरङ्ग । मैं भी ब्रह्म हूँ, तुम भी ब्रह्म हो, जगत् भी ब्रह्म है और रूप, अवलोक, मनस्कार सब ब्रह्मरूप है । इससे तुम भी सर्वत्र ब्रह्म की भावना करो । अपने स्वभाव में स्थित होना परम कल्याण है और पर स्वभाव में स्थित होना दुःख है ।
४८० ❈ योगवाशिष्ठ ❈
हे राम ! अपना स्वभाव साधने का नाम मोक्ष और न साधने का नाम बन्धन है। हे राम ! धन, मित्र, कर्म आदि कोई पदार्थ उपकार नहीं करता, केवल अपना पुरुषार्थ ही उपकार करता है अर्थात् काम आता है। अत एव अपने चैतन्य स्वभाव में स्थित होना और पर स्वभाव का त्याग करना ठीक है। जब अपने स्वभाव में स्थित होगे तब सब अपना ही स्वरूप प्रतीत होगा। जो स्वरूप से भिन्न होकर देखो तो न मैं हूँ, न तुम हो और न जगत् है; सब भ्रममात्र है और मृगतृष्णा के जलसदृश भासता है। ऐसे जानो कि मैं भी ब्रह्म हूँ, तुम भी ब्रह्म हो और जगत् भी ब्रह्म है। या ऐसे जानो कि न तुम हो, न मैं हूँ और न जगत् है। तो पीछे जो शेष रहेगा, वही तुम्हारा स्वरूप है। हे राम ! जिन पुरुषों को ऐसा निश्चय हुआ है कि मैं, तुम और जगत्, सब ब्रह्म है, अथवा मैं, तुम और जगत्, सब मिथ्या है, उनको फिर कोई इच्छा नहीं रहती। और जिनको इच्छा उठती है, उनको जानिये कि ब्रह्म आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब भोगों की वासना निवृत्त हो और संसार नीरस हो जाय, तब जानिये कि यह संसार से पार हुआ अथवा होगा। हे राम ! यह निश्चय करके जानो कि जिसकी भोगों की वासना क्षीण हो जाती है, उसका स्वभावरूपी सूर्य उदय होता है और भोगों की तृष्णारूपी रात्रि नष्ट हो जाती है। यद्यपि उसमें प्रत्यक्ष भोगों की तृष्णा देख पड़ती है, तो भी भीतर वासना जाती रहती है और ब्रह्मसत्ता ही सबमें भासित होती है। संसार की ओर से वह सुषुप्त और मृतक के समान हो जाता है, अपने स्वरूप में सदा जाग्रत् रहता है और अपने स्वभावरूपी अमृत में मग्न हो जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाण प्रकरणे वशिष्ठगीतोपदेशो नाम शताधिकैकोनषष्टितमस्सर्गः ॥ १५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार, ये पर-स्वभाव हैं; इनको ब्रह्मरूप जानो। परस्वभाव क्या है और ब्रह्मरूप क्या है, यह भी सुनो। हे राम ! तुम्हारा स्वरूप शुद्ध आकाश है और उसमें जो रूप, अवलोक और मनस्कार दिखते हैं, वे माया से उपजे
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४८१
है। माया स्वभाव से परस्वभाव है, परन्तु इनका अधिष्ठान आत्मसत्ता है, इससे आत्मस्वरूप है। आत्मा को जानने से इसका अभाव हो जाता है। हे राम! जब ज्ञान उपजता है, तब संसार स्वप्न समान हो जाता है, और उसकी सत्ता कुछ नहीं भासित होती। जब दृढ़ता होती है, तब सुषुप्त हो जाता है, इनका भाव भी नहीं रहता, तुरीयावस्था में स्थित होता है। जब जीव तुरीयातीत होता है, तब अभाव का भी अभाव हो जाता है, और परमकल्याणरूप सत्ता समानपद को प्राप्त होती है, जो आदि-अन्त से रहित परमपद है। ऐसा मैं ब्रह्मस्वरूप, परमशान्तरूप और निर्दोष हूँ। सब जगत् भी ब्रह्मरूप है। मुझको सदा यही निश्चय है, और ऐसा भाव हृदय में नहीं उठता कि मैं वशिष्ठ हूँ। मेरा परिच्छिन्न अहंकार नष्ट हो गया है, इससे मैं निरहंकारपद में स्थित हूँ। जब तुम ऐसे होकर स्थित होगे, तब परम निर्मल स्वरूप हो जाओगे। जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही तुम भी शोभित होगे। हे राम! पुरुष को कैसे बन्धन होता है, जिससे वह आत्मपद को नहीं प्राप्त होता, यह भी सुनो। प्रथम धन और गृह का बन्धन है। दूसरा भोग की तृष्णा और तीसरा बान्धवों का बन्धन है। जिसको इन तीनों की वासना होती है, उसको धिक्कार है। यह वासना बड़ा अनर्थ करनेवाली है। यह भोग महारोग है। बान्धव दृढ़बन्धनरूप हैं और अर्थ की प्राप्ति अनर्थ का कारण है। इससे इस वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित होओ। यह संसार भ्रममात्र है। इसकी वासना करना व्यर्थ है। इसको सत्य न जानना। यह जो तुमको संग और मिलाप प्रतीत होता है, सो ऐसा है, जैसे बैठे हुए स्मरण आवे कि मैं अमुक से मिला था तो उसकी वह प्रतिमा प्रत्यक्ष हृदय में भासित होती है। जैसे संकल्प से मन में नगर रच लिया तो उसमें मनुष्यादिक के चित्र भासित होने लगते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी जानो। हे राम! तुम, मैं और यह जगत् भ्रममात्र और संकल्पनगर के समान है। जैसे भविष्यत् नगर की रचना है, वैसे ही यह जगत् है। कर्त्ता, क्रिया और कर्म जो भासित होते हैं, वे भी भ्रममात्र हैं। केवल
४८२ ❊ योगवाशिष्ट ❊
आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। आत्मरूपी आकाश में यह जगत् पुतलियों के समान है और संकल्प से ही प्रत्यक्ष हुआ है। वास्तव में केवल शान्तरूप आत्मतत्त्व है। हे राम! जो पुरुष स्वभाव-निष्ठ हैं, उनको आत्मतत्त्व ही भासित होता है और जिनको आत्म-तत्त्व का प्रमाद है, उनको नाना प्रकार का जगत् भासित होता है, पर आत्मा में यह जगत् कुछ आरम्भ परिणाम से नहीं बना, जैसे सूर्य की किरणों में अज्ञान से जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् की प्रतीति होती है। जब आत्मा का सम्यक्ज्ञान हो, तब जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है—जैसे सूर्य की किरणों के हटने से जल का भ्रम निवृत्त हो जाता है।
इति श्री० नि० वशिष्ठगीतासंसारो० नाम शताधिकषष्ठितमसर्गः ॥ १६० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! रूप, अवलोक, मनस्कार, सब ब्रह्मरूप हैं। जिसको ज्ञान प्राप्त होता है, उसको सब ब्रह्मस्वरूप दिखता है—यही ज्ञान का लक्षण है। ज्यों-ज्यों ज्ञानकला उदय होती है, त्यों-त्यों भोगों की वासना क्षीण होती जाती है, और जब पूर्णबोध की प्राप्ति होती है, तब किसी की इच्छा नहीं रहती। जैसे ज्यों-ज्यों सूर्य प्रकाशता है, त्यों-त्यों अन्धकार नष्ट होता जाता है, और जब पूर्ण प्रकाश होता है; तब रात्रि का अभाव हो जाता है, वैसे ही जिसको ज्ञान उत्पन्न हुआ है, उसको भोगों की वासना नहीं रहती। संसार उसको जले वस्त्र की तरह भासित होता है, पर अज्ञानी को सत्य लगता है। जैसे स्वप्न में सुषुप्ति नहीं होती, सुषुप्ति में स्वप्न नहीं होता, स्वप्न का पुरुष सुषुप्ति वाले को नहीं जानता और सुषुप्तिवाला स्वप्नवाले को नहीं जानता, वैसे ही जिसको तुरीयपद की प्राप्ति हो जाती है, उसको संसार का अभाव हो जाता है और वह अपने स्वभाव में स्थित होता है। जो संसार को सत् जानते हैं, वे स्वप्न नर हैं—सुषुप्ति को नहीं जानते। हे राम! तुम्हारा स्वरूप जो तुरीयपद है, उसको अज्ञानी नहीं जान सकते। जो जानें तो उनका परिच्छिन्न अहंकार नष्ट हो जावे। जब अहंकार नष्ट हुआ, तब सब आत्मा ही हुआ।
✳ निर्वाण प्रकरण ✳ ४८३
हे राम ! जीव को अहंता ने तुच्छ किया है; इससे तुम अहंता का त्याग करके अपने स्वभाव में स्थित हो जाओ। संसाररूपी एक पुतली है जो भ्रम से उठी है। उसका शीश ऊपर ब्रह्मलोक है। टखने और पाँव पाताललोक हैं दशोदिशा वक्षःस्थल हैं। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। तारागण रोम हैं। आकाश वस्त्र है। सुख-दुःख स्वभाव हैं। पवन प्राणवायु है। बगीचे भूषण हैं। द्वीप और समुद्र कङ्गण हैं और लोका-लोक पर्वत मेखला है। हे राम ! ऐसी यह पुतली नृत्य करती है। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और नष्ट होते हैं, परन्तु जल ज्यों का त्यों है। वैसे ही जल की तरह सब ब्रह्मरूप है। विकार भ्रम मे देख पड़ते हैं। हे राम ! कर्त्ता, क्रिया और कर्म भी आत्मस्वरूप हैं। जब तुम आत्मा की भावना करोगे, तब तुम्हारा हृदय आकाश की तरह शून्य हो जावेगा। जैसे पत्थर की शिला जड़ होती हे, वैसे ही तुम्हारा हृदय जगत् से जड़ और शून्य हो जायगा। हे राम ! आत्मपद शान्तरूप और आकाश सदृश निर्मल है। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। यह न उदय होता है, न अस्त होता है, केवल शान्तरूप हे। उदय-अस्त भी तब होता है, जब कुछ दूसरी वस्तु होती है। पर जगत् कुछ भिन्न नहीं, आत्मास्वरूप ही है। द्वैत या एक की कल्पना से रहित आत्मा अपने आपमें स्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदुपयोगोपदेशो नाम शताधिकैकषष्टितमसर्गः ॥ १६१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह विश्व आत्मा का चमत्कार है। जैसे मृत्तिका की पुतली मृत्तिका और कागज की पुतली कागज होती है वैसे ही विश्व आत्मरूप है। जैसे मृत्तिका का दीपक देखने भर का होता है और प्रकाश का काम नहीं देता, वैसे ही यह जगत् देखने भर को है, विचार करने से आत्मा के सिवा भिन्न सत्ता कुछ नहीं है इससे जगत् की सत्यता आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। जगत् की आस्था आत्मा के आश्रित होती है। जैसे जल में तरङ्ग आकाश में शून्यता और पवन में स्पंदन है, वैसे ही आत्मा में जगत् अभिन्नरूप है। जैसे
४८४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
वायु चलती है तब भी पवन है, क्योंकि उसको वायु का निश्चय है, वैसे ही जगत् का वही स्वरूप है—इससे चैतन्य है। ज्ञानवान् जानता है कि जगत् मेरा ही स्वरूप है। हे राम! यह आश्चर्य देखो कि जगत् कुछ दूसरी वस्तु नहीं, पर भ्रम के कारण भिन्न भासित होता है। जैसे कथा में कथा के पात्र विद्यमान लगते हैं और काम करते हैं, वैसे ही इस जगत् को भी मनोपात्र जानो।
हे राम! जो विद्यमान है, वह अविद्यमान हो जाता है और जो अविद्यमान है वह विद्यमान हो जाता है। जैसे स्वप्न में जगत् अनुभव-स्वरूप है—भिन्न नहीं, वैसे ही जाग्रत् जगत् को विचार से देखोगे, तो ब्रह्मस्वरूप ही भासित होगा। जैसे जो पुरुष सोया होता है, स्वप्नजगत् उसी का रूप है, परन्तु जब तक निद्रादोष है, तब तक भिन्न भासित होता है, पर जब जागा, तब अपना ही रूप प्रतीत होता है, वैसे ही जब मनुष्य अपने स्वरूप में स्थित होकर देखता है, तब सब अपना रूप ही भासित होता है। हे राम! रूप, अवलोक और मनस्कार भी ब्रह्मस्वरूप है, पर आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं, वह तो निरंकार है, और मन के चिन्तन से रहित है। संकल्प से आप ही रूप, अवलोक और मनस्कार करके स्थित हुआ है, भिन्न नहीं है। सब वही है और शास्त्रकारों ने शिव, ब्रह्म, आत्मा शून्य आदि उसके नाम संकल्परूप में कहे हैं। आत्मा केवल चिन्मात्र है; वह वाणी का विषय नहीं। वह शान्तरूप-चैत्य अर्थात् दृश्य से रहित और सब शब्द-अर्थों का अधिष्ठान है, और जगत् उसका चमत्कार है। हे राम! आत्मा में एक या द्वैत की कल्पना कोई नहीं; क्योंकि वह आत्मत्वमात्र है और जगत् भी आत्मरूप है। जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं, वैसे आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। हे राम! यदि ऐसा भी किसी देश अथवा काल में हो कि सुवर्ण और भूषण में कुछ भेद हो अर्थात् सुवर्ण भिन्न हो और भूषण भिन्न हो, तथापि आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। आत्मा ही ऐसे प्रकाशमान है और अपने स्वभाव में स्थित है; दूसरी वस्तु कुछ नहीं है। जैसे मृत्तिका की सेना नाना प्रकार की संज्ञा धारण करती है, परन्तु
⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ४८५
मृतिका से भिन्न कुछ दूसरी वस्तु नहीं है; वैसे ही स्फुरण से नाना प्रकार की संज्ञाएँ देख पड़ती हैं, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं—उसी का रूप है। हे राम! ये सब पदार्थ अनुभव से भासित होते हैं। पदार्थ की सत्ता अनुभव से भिन्न नहीं। जब तुम अनुभव में स्थित होकर देखोगे, तब अनुभवरूप अपना रूप ही देख पड़ेगा। अपना स्वभाव ज्ञानमात्र है। उसी के जानने का नाम ज्ञान है।
हे राम! ज्ञान के बिना जो तप, यज्ञ, दान आदिक क्रिया हैं, वे सब व्यर्थ हैं। सब क्रियाओं की सिद्धि ज्ञान से होती है। हे राम! जो कुछ क्रिया ज्ञान के निमित्त कीजिये, वही पुरुषप्रयत्न श्रेष्ठ है। इससे अन्यथा सब व्यर्थ है। धन के उपजाने और रखने में भी कष्ट है, परन्तु जो ज्ञान के साधन के लिए इसको राखिये और दीजिये तो यह अमृत हो जाता है। हे राम! यह जगत् भ्रममात्र है। जैसे मलिन नेत्रवाले को रूप उलटा दिखता है और स्वप्न की सृष्टि में अज्ञ तज्ञ भी भासित होते हैं, परन्तु असत्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् विद्यमान लगता है, पर अविद्यमान है। आत्मा ही सदा विद्यमान है। हे राम! विद्यमान देव विष्णु को त्यागकर जो और देव का पूजन करते हैं, उनकी पूजा सफल नहीं होती और विष्णु उन पर कुपित भी होते हैं। इसी तरह अनुभवरूप विद्यमान आत्मा को त्यागकर जो और की उपासना पूजन करते हैं, वे जन्ममरण के बन्धन से मुक्त नहीं होते—मूढ़ता में रहते हैं। आत्मदेव की पूजा सुनो। जो कुछ अनिच्छित आवे, वह उसको अर्पण कीजिये। इसके जाननेवाले में अहंप्रत्यय करना ही बड़ी पूजा है। हे राम! इस आत्मदेव से भिन्न जो सूर्य, चन्द्रमा आदिक की भेदपूजा है। वह तुच्छ है। जब तुम आत्मपूजा में स्थित होगे, तब और पूजा तुमको सूखे तृण की तरह तुच्छ प्रतीत होगी। दान भी आत्मदेव को ही करना है, सो बोध से करने योग्य है। वैराग्य, धैर्य और सन्तोष बोध का कारण है। यथा लाभ में सन्तुष्ट रहकर ब्रह्मविद्या का विचार करो और सन्तों का संग करो। इन साधनों से जब बोधरूपी सूर्य का उदय होगा, तब द्वैतरूपी अन्धकार का नष्ट हो
४८६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
जायगा और ज्ञानरूप ही भासित होगा। फिर जो ज्ञान उपजा है, वह भी शान्त हो जायगा; इससे उसी देव की पूजा करो, जिससे आत्म-पद को पाओ। आत्मदेव की पूजा के निमित्त फूल भी चाहिए, इसलिए आत्मविचार करके चित्त की वृत्ति अन्तर्मुख करो और यथालाम में संतुष्ट रहकर सन्तों की संगति करो, इन फूलों से आत्मा की पूजा करनी चाहिए। यह पूजा भी तब होती है, जब अन्तःकरण शुद्ध होता है। उससे ज्ञान उत्पन्न होता है। जब ज्ञान उपजता है, तब आत्मदेव का साक्षात्कार होता है। ज्ञान का लक्षण सुनो। गुरु और शास्त्र से जो वस्तु सुनी है, उसमें जब बुद्धि स्थित होती है और संसार की वासना क्षीण हो जाती है तब जीव ज्ञानी कहलाता है। जब इस ज्ञान की पूर्णता होती है, तब जगत् उसको ब्रह्मस्वरूप ही देख पड़ता है। तब उसको शस्त्र काट नहीं सकते और सिंह, सर्प, अग्नि और विष का भी भय नहीं होता।
हे राम ! यह सब विश्व आत्मरूप है। जैसी भावना कोई करता है, वैसा ही आगे देख पड़ता है। जब शास्त्र में शास्त्र के अर्थ की भावना होती है, तब वही भासित होते हैं। इसी प्रकार सर्प और अग्नि सब अपने-अपने अर्थाकार भासित होते हैं। जब सर्वत्र आत्म-भावना होती है, तब सर्वत्र आत्मा ही भासित होती है; क्योंकि दूसरी वस्तु कुछ बनी नहीं, तो दिखाई कैसे दे। जो पुरुष कृतकृत्य नहीं हुआ और अपने को कृतार्थ मानता है, पर दुःख की निवृत्ति का उपाय नहीं करता, उसे दुःख के आने से दुःख ही होगा, और दुःख उसको चला ले जावेगा। जब सुख आवेगा; तब सुख भी चला जावेगा। हे राम ! जो पुरुष सब में ब्रह्म कहता है, पर निश्चय से रहित है और शास्त्र भी बहुत देखता है, वह महामूर्ख है। जैसे जन्म का अन्धा सूर्य को नहीं जानता, वैसे ही वह आत्मअनुभव से रहित है। जब आत्मपद का साक्षात्कार होगा तब ऐसा आनन्द प्राप्त होगा, जिसके पाने से और पदार्थ नीरस लगें, ब्रह्मा से काष्ठपर्यन्त सब पदार्थ नीरस हो जायेंगे। इससे आत्मपरायण होकर सदा आत्मपद की भावना करो। हे
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ [४८७]
हे राम ! जैसे शुद्धमणि के निकट जैसी वस्तु रखिये, वैसे ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही जीव जैसी भावना करता है, वैसा ही रूप भासित होता है। इससे जगत् को ब्रह्मस्वरूप जानो, और जो दूसरा भासित हो, उसे भ्रममात्र जानो। जैसे पत्थर की शिला पर पुतलियाँ लिखते हैं तो वे शिलारूप ही होती हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मस्वरूप है। जब तुमको आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब सब पदार्थ नीरस होंगे। हे राम ! यह जगत् मिथ्या है। जो पुरुष इस जगत् को सत् जानता है और कहता है कि हम मुक्त होंगे, वह ऐसा है, जैसे अन्धे कूप में जन्म का अन्धा गिरे और कहे कि अन्धकार में मैं सुखी हूँ। वह मूर्ख है; क्योंकि आत्मज्ञान बिना मुक्त नहीं होता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पुनर्निर्वाणोपदेशो नाम शताधिकद्विषष्टितमसर्गः ॥ १६२ ॥
बशिष्ठजी बोले, हे राम ! अहंता आदि जो जगत् भासित होता है, वह मिथ्या भ्रम से उदय हुआ है। इसको त्यागकर अपने अनुभव-स्वरूप में स्थित होओ। इस मिथ्या जगत् में आस्था करना मूर्खता है। जो ज्ञानवान् है, उसको जगत् का अभाव है। अब ज्ञानी और अज्ञानी का लक्षण सुनो। हे राम ! जैसे किसी पुरुष को ताप बढ़ता है तो उसका हृदय जलता है और तृषा बहुत होती है, पर जिसका ताप नष्ट हो गया है, इसका हृदय शीतल होता है और जल की तृषा भी नहीं होती, वैसे ही जिस पुरुष को अज्ञानरूपी ताप चढ़ा हुआ है, उसका हृदय जलता है और भोगरूपी जल की तृष्णा बहुत होती है; पर जिसके हृदय का अज्ञानरूपी ताप मिट गया है, उसका हृदय शीतल होता है और भोग-रूपी जल की तृष्णा मिट जाती है। अब ताप निवृत्त करने का उपाय सुनो। शास्त्रों के अर्थवाद से तो बुद्धि में भ्रम हो जाता है। मैं तुमसे सुगम उपाय कहता हूँ। निरहंकार होना ही वह सुगम उपाय है। 'न मैं हूँ' और 'न यह जगत् है,' जब तुम ऐसा निश्चय कर लोगे, तब सब जगत् तुमको ब्रह्मस्वरूप देख पड़ेगा और किसी पदार्थ की कामना न रहेगी। जब सब पदार्थों को मिथ्या जानकर अपना भी अभाव
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करोगे, तब प्रत्येक चैतन्य परमानन्दस्वरूप सबका अधिष्ठान शेष रहेगा। हे राम! यह अहंतारूपी यक्ष जो उठा है सो मिथ्या है। उसी मिथ्या यक्ष ने नाना प्रकार के जगत् की कल्पना की है। अहंकार मिथ्या है और जगत् भी मिथ्या है। जब तुम अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब जगत् का भ्रम मिट जावेगा। जैसे स्वप्न के जगत् में सुन्दर पदार्थ भासित होते हैं और मनुष्य उनकी इच्छा करता है, जब तक जागता नहीं तब तक जानता है कि ये पदार्थ कभी नष्ट न होंगे और कहता है कि अमुक रूप देखिये और अमुक भोजन कीजिये, पर जब जाग उठा तब जानता है कि यह सब मेरा संकल्प ही था, और फिर वे सुन्दर पदार्थ स्मरण होते हैं अथवा भासित होते हैं तो भी उनको मिथ्या जानता है। वैसे ही जब आत्मा के विषय में यह जागता है तब सब ब्रह्म ही भासित होता है।
हे राम! इस जगत् का बीज अहं है। जैसे दुःख का बीज पाप होता है, वैसे ही जगत् का बीज अहं है। इससे तुम निरहंकार पद में स्थित होओ। यह सब तुम्हारा ही स्वरूप है, पर भ्रम से जगत् भासित होता है। हे राम! जगत् का अत्यन्ताभाव है। जैसे रस्सी में सर्प का अत्यन्ताभाव है, परन्तु भ्रमदृष्टि से सर्प दीखता है और जब विचाररूपी दीपक से देखिये तो सर्प का अभाव हो जाता है; वैसे ही आत्मा में यह जगत् भ्रम से प्रतीत होता है। जब विचार करके जगत् का अभाव निश्चय करोगे, तब आत्मपद ज्यों का त्यों भासित होगा। जैसे जब वसन्त ऋतु आती है, तब सब फूल, फल और डालें देख पड़ती हैं और एक ही रस इतनी संज्ञाओं को धारण करता है वैसे ही तुम जब आत्मपद में स्थित होगे, तब तुमको सब आत्मरूप ही प्रतीत होगा और सब आत्मा ही भासित होगा। हे राम! आदि भी आत्मा ही है और अन्त में भी आत्मा ही होगा। पर मध्य में जो जगत् के पदार्थ दीखते हैं, उनकी ओर मत जाओ, जो इनको जाननेवाला है और जिससे सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं, उसमें स्थित होओ। ये सब मनुष्य मृग की तरह हैं। जैसे मरुस्थल में जल जानकर मृग उधर दौड़ते
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है, वैसे ही जगतरूपी मरुस्थल की भूमिका शून्य है और तीनों लोक मृगतृष्णा के जल हैं। उनमें मनुष्यरूपी मृग दौड़ते हैं और दौड़ते-दौड़ते हार जाते हैं। कभी शान्ति नहीं पाते, क्योंकि जगत् के सब पदार्थ असत्य हैं। हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार सब मृगतृष्णा के जल हैं; इनको जो सत्य जानता है, वह मूर्ख है। यह जगत् गन्धर्वनगर की तरह मिथ्या है। तुम जागकर देखो, इसको सत्य जानकर क्यों तृष्णा करते हो ? इसको सत्य जानकर तृष्णा करना ही बन्धन है।
हे राम ! तुम आत्मा हो। इसकी इच्छा से बन्धन में क्यों पड़ते हो ? जैसे सिंह पिंजड़े में आकर दीन होता है, पर बल करके जब पिंजड़े को तोड़ डालता है, तब बड़े वन में जाकर निवास करता और निर्भय होता है, वैसे ही तुम भी वासनारूपी पिंजड़े को तोड़कर आत्म पद में स्थित होओ, जो सबका अधिष्ठान और सबसे उत्कृष्ट है। जब तुम उस पद को प्राप्त होगे, तब इस संसार की वासना नष्ट होकर आनन्द होगा और तुम निर्वाण पद को प्राप्त होकर शान्त होगे। परम उपशम ज्ञेय पद को पाओगे और द्वैतभाव मिटकर केवल परमार्थसत्ता भासित होगी—इसी का नाम निर्वाण है। जैसे कोई मार्ग चलकर तपता आवे तो वह शीतल स्थान में आकर शान्ति पाता है, वैसे ही ये चारों भूमिका शान्ति का स्थान हैं। निर्वाण, निरहंकारता, वासना का त्याग और परम उपशम ये चार भूमिका हैं। इनसे ज्ञेय में स्थित होओ। जब तुम भी इन भूमिकाओं में स्थित होगे, तब द्रष्टा, दर्शन और दृश्य की त्रिपुटी का अभाव हो जायगा और केवल द्रष्टा ही रहेगा। हे राम ! द्रष्टा भी उपदेश जनाने के निमित्त कहा है। जब दृश्य का अभाव हुआ, तब द्रष्टा किसका हो ? केवल अपने रूप में स्थित होओ, जो शुद्ध है। यह जगत् की सत्यता जन्मों को देनेवाली है। जो जगत् के पदार्थ सुखदायी लगते हैं, वे दुःख के देनेवाले हैं। इनको विष जानकर त्याग करो। जैसे आकाश में तरुवर दीखते हैं, वैसे ही यह जगत् न 'होने पर भी भासित होता है—आत्मा में दृश्य नहीं है। एक ही पदार्थ में दो दृष्टियाँ हैं। ज्ञानी उसको आत्मा और अज्ञानी जगत् जानते हैं।
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<p align="center">❇ योगवाशिष्ठ ❇</p>दो० सब भूतन की रात्रि में, सन्तन का दिन होय । जो लोकन दिन मानियाँ, सन्त रन्त रहे तहँ सोय ॥
ज्ञानी परमार्थतत्त्व में जागते हैं और संसार की ओर से सो रहे हैं और अज्ञानी परमार्थतत्त्व में सोये हुए हैं और संसार की ओर सावधान हैं ।
हे राम ! यह जगत् मन से उदय हुआ है । ज्ञानी का मन सत्यद् को प्राप्त हुआ है इससे उसे जगत् की भावना नहीं होती । जैसे बालक को संसार के पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में जगत् कुछ वस्तु नहीं । हे राम ! जब ज्ञान उपजता है, तब जगत् कुछ भिन्न वस्तु नहीं प्रतीत होता । जैसे जल की बूँदें जल में डालिये तो भिन्न नहीं लगतीं, वैसे ही ज्ञानी को जगत् भिन्न नहीं दिखता । जैसे बीज में वृक्ष होता है, वैसे ही मन में जगत् स्थित होता है, और जैसे वृक्ष बीजरूप है, वैसे ही जगत् मनरूप है । जब जगत् नष्ट होगा, तब मन भी नष्ट हो जावेगा, और मन नष्ट होगा, तब दृश्य भी नष्ट होगा । एक का अभाव होने से दोनों का अभाव हो जाता है—मन नष्ट हो तो वासना भी नष्ट हो और वासना नष्ट हो तो मन भी नष्ट होता है । हे राम ! जगत् के भीतर-बाहर जो रमता है, वही मन है । इससे जब मन को स्थिर करके देखोगे, तब जगत् की सत्यता न प्रतीत होगी । अज्ञानी के हृदय में जगत् दृढ़ स्थित है, इससे वह दुःख पाता है, जैसे बालक को अपनी परछाहीं में भूत दिखता है, जिससे वह दुःख पाता है । जो निकट है, वह उसको नहीं भासित होता, इससे वह दुःख नहीं पाता । हे राम ! यह जगत् यदि सत्य होता तो ज्ञानवान् को भी प्रतीत होता । पर ज्ञानी को नहीं प्रतीत होता, इससे जगत् कुछ वस्तु नहीं है । जैसे एक ही स्थान में दो पुरुष बैठे हों और एक को निद्रा आवे तो उसको स्वप्न का जगत् देख पड़ता है और नाना प्रकार की चेष्टा होती है, पर दूसरा जो जागता है, उसको उसका जगत् नहीं देख पड़ता, वैसे ही जो पुरुष परमार्थसत्ता में जागा है, उसको जगत् शून्य दिखता है । हे राम ! यह जगत् मिथ्या है । उसकी तृष्णा तुम क्यों
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४६१
करते हो ? अपने स्वभाव में स्थित होओ । यह जगत् परस्वभाव है, यह जानकर चाहे जैसी चेष्टा करो, तुमको बन्धन न होगा और पूर्वपद की प्राप्ति होगी । जैसे अग्नि से जले सूखे तृण को पवन उड़ा ले जाता है और नहीं जाना जाता कि कहाँ गया, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि से जलाया और निरहंकारतारूप पवन से उड़ाया हुआ संसाररूपी तृण न जाना जायगा कि कहाँ गया। जैसा चाहे लाख योजन तक चला जाय तो भी यही देख पड़ता है कि आकाश ही सर्व सृष्टि को धारण किये है, वैसे ही सब दृश्य जगत् को आत्मा धारण करता है। संसार का शब्द-अर्थ आत्मा में नहीं । इसको छोड़कर देखो कि सब शब्द-अर्थ का अधिष्ठान आत्मा ही है ।
हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार मिथ्या उदय हुए हैं । इनका त्याग करो। जैसे मरुस्थल में जलाभास मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या भ्रममात्र है । इसके सम्बन्ध से जीव दुखी होता है । जैसे रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् है । तुम आत्मब्रह्म हो, दुःख से रहित अपने स्वभाव में स्थित हो और आत्मदृष्टि से देखो कि सब आत्मा है; अथवा जगत् को मिथ्या जानो तो भी शेष आत्मपद ही रहेगा । जैसे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव होने पर शान्तपद शेष रहता है, वैसे ही जगत् का अभाव निश्चित होने पर आत्मपद शेष प्रतीत होगा। इस जगत् का अत्यन्ताभाव है, और जो दीखता है, वह भ्रममात्र है । जो एक काल में होता है, वह दूसरे काल में नष्ट हो जाता है । स्वप्न में जाग्रत् का अभाव हो जाता है और जाग्रत् में स्वप्न का अभाव हो जाता है। पर सुषुप्ति में दोनों का अभाव हो जाता है । इससे वे भ्रममात्र हैं । विश्व आत्मा का चमत्कार है । जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् है । अहंता से यह उदय होता है और अहं का अभाव होने पर इसका भी अभाव हो जाता है । जिनको अहंता के अभाव का निश्चय हुआ है, वे ही सन्त और उत्तम पुरुष हैं । उन महानुभाव पुरुषों का अभिमान और भोगों की आशा नष्ट
४४२ ❀ योगवासिष्ठ ❀
हो जाती है। वे भ्रान्ति रहित और नित्य ही समाधिस्थ होते हैं। इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकताप्रतिपादननाम शताधिकत्रिषष्टितमसर्गः ॥ १६३ ॥
राम बोले, हे भगवन् ! यह मनरूपी मृग संसाररूपी बन में भटकत है । वह समाधानरूप कौन वृक्ष है, जिसके नीचे आकर शान्त हो उसके फूल, फल और लता कैसे हैं और वह वृक्ष कहाँ होता है । यह कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार समाधानरूप वृक्ष उत्पन्न होता है, सो सुनो । सब साधन इसके पत्ते, पुष्प और लता आदि हैं । हे राम ! यह वृक्ष सब जीवों को कल्याण के निमित्त साधन चाहिये । अब तुम इसका क्रम सुनो । आत्मिक बल से तो यह उगता है और सन्तजनों के हृदय में यह उपजता है । चित्तरूपी पृथ्वी में लगता है और वैराग्य इसका बीज है वैराग्य दो प्रकार से प्राप्त होता है—एक तो दुःख और कष्ट प्राप्त होने से वैराग्य उपज आता है । दूसरा शुद्ध निष्काम हृदय होने पर भी वैराग्य उपजता है । उस वैराग्यरूपी बीज को जब चित्तरूपी भूमि में डालते हैं और निर्वासनारूपी हल फेरते हैं । निर्मल, शीतल और हृदयगम्य सन्तों की संगति और सत् शास्त्ररूपी जल जब मनरूपी क्यारी में पड़ता है, तब उस वृक्ष के बढ़ने की आशा होती है । बहुत जल से भी उसकी रक्षा करते हैं । आत्म विचाररूपी सूर्य की किरणों से पुष्ट करते हैं और उसके चहुँफेर धैर्यरूप बाड़ी करते हैं । तप, दान, तीर्थ, स्नानरूपी चौतरे पर उस बीज को रखकर रखवाली करते हैं कि सूख या जल न जाय । आशारूपी पक्षी से रक्षा करते हैं कि वैराग्यरूपी बीज को वह निकाल न ले जावे अभिलाषारूपी बूढ़े बैल से रक्षा करते हैं कि खेत में प्रवेश करके वह उसको रौंद न डाले । उसके निमित्त सन्तोष और सन्तोष की स्त्री मुदिता दोनों को पहरे पर बिठा रखते हैं । इस बीज का नाशक कुहिरा, जो मेघ से उपजता है, उससे भी इसकी रक्षा करते हैं, संपदा, धन और सुन्दर स्त्रियों का प्राप्त होना ही वैराग्यरूपी बीज का नाशक ओला है ।