योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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हे राम ! देह, इन्द्रियादिक मृगतृष्णा के जल सदृश हैं; इनमें अहन्ता करना मूर्खता है । ज्ञानवान् अहन्ता को त्यागकर आत्मपद में स्थित होता है, और संसार के इष्ट-अनिष्ट में हर्ष या शोक उसे नहीं होते । जैसे आकाश में बादल होने पर भी वह ज्यों का त्यों है; वैसे ही ज्ञानी ज्यों का त्यों है । उसमें अहंकार नहीं होता, इससे वह सुखरूप है । हे राम ! रूप, दृश्य, इन्द्रियाँ और मन उसके जाते रहते हैं । जैसे वन्ध्या के पुत्र का नृत्य नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी के रूप, अवलोक, मनस्कार नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि उसको सब ब्रह्म भासित होता है और उसकी द्वैत भावना नष्ट हो जाती है । संसार का बीज अहन्ता अज्ञानियों में दृढ़ होती है । हे राम ! अहन्ता से जीव की बुद्धि बुरी अर्थात् स्थूल हो जाती है । इससे वह दुःख पाता है । इस दुःख के नाश का उपाय यह है कि सन्तजनों के वचनों की भावना और विचार करके हृदय में धारणा करे—इससे अहन्तारूपी दुःख नष्ट हो जाता है । सन्तों के वचनों का निषेध करना मुक्तिफल का नाश करनेवाला और अहन्तारूपी पिशाच को उपजानेवाला है, इसलिए सन्तों की शरण में जाओ और अहन्ता को दूर करो । इसमें कुछ कष्ट नहीं; यह अपने अधीन है । अपने अभाव के चिन्तन में क्या कष्ट या खेद है ।
हे राम ! आत्मपद सन्तों की संगति द्वारा बहुत सुलभता से प्राप्त होता है ज्ञानवानों की पृथक्-पृथक् सेवा करो और उनके वाक्यों को विचारकर बुद्धि को तीक्ष्ण करो । जब बुद्धि तीक्ष्ण होगी तब अहन्ता-रूपी विष की बेलि का नाश करेगी । यह विचार करना चाहिए कि 'मैं कौन हूँ' और 'यह जगत् क्या है' । इस प्रकार सन्तों और शास्त्रों के वचनों का निर्णय करने से सत्य-सत्य होता है और जो असत्य है, वह असत्य हो जाता है । सत्य जानकर आत्मा की भावना करे और असत्य जगत् को मृग-तृष्णा के जल सा जानकर भावना को त्यागे तो जिनको सुख जानकर पाने की भावना या चाह करता था, वे दुःखदायी जान पड़ते हैं । जैसे अधिष्ठान के अज्ञान से मरुस्थल में जल जानकर मृग दौड़ता है, तो