योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४५५
दुःख पाता है, वैसे ही ये सब विषय हैं। सबका अधिष्ठान आत्मतत्त्व है। वह शुद्धरूप, परमशान्त और परमानन्दस्वरूप है, जिसको पाकर फिर जीव दुःखी नहीं होता। हे राम! बन्धन का कारण भोग की वासना है। भोगों से शान्ति नहीं मिलती। जब सन्तों की संगति होती है, तब कल्याण होता है और अनात्म में अहंभाव छूट जाता है। और किसी प्रकार शान्ति नहीं मिलती। हे राम! बालक की नाईं हमारे वचन नहीं हैं, हमारा कहना यथार्थ है, क्योंकि हमको स्वरूप का स्पष्ट भान है। जब अहन्ता मिट जावे तब सुखी हो। इससे अहंता का नाश करो। जब अहंता का नाश हो, तब जानिये कि चैत्य की भावना मिट गई है। हे राम! जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है, तब अहंतारूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है। ज्ञान तब होता है, जब सन्तों का संग और विचार, विषयों से वैराग्य और स्वरूप का अभ्यास करे—इससे स्वरूप की प्राप्ति होती है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणयुत्युक्त्युपदेशो नाम शताधिकद्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ १५२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिन पुरुषों ने ज्ञान से अपना अज्ञान नष्ट नहीं किया, उन्होंने करने योग्य कुछ नहीं किया। अज्ञान से पहले अहंभावना होती है, तब आगे जगत् भासित होता है। तब जीव लोक-परलोक की भावना करता है और इसी वासना से जन्म-मरण पाता है। हे राम जब तक हृदय में संसार का शब्द-अर्थ दृढ़ है, तब तक शब्द-अर्थ के अभाव का चिन्तन करे और जहाँ जगत् भासित होता है, वहाँ ब्रह्म की भावना करे। जब ब्रह्मभावना करेगा, संसार के शब्द-अर्थ से रहित होगा और उसे आत्मपद भासित होगा। हे राम! इस संसार में दो पदार्थ हैं—एक यह लोक और दूसरा परलोक। अज्ञानी इस लोक का उद्यम करते हैं, परलोक का नहीं करते, इससे दुःख पाते हैं और उनकी तृष्णा नहीं मिटती। विचारवान् पुरुष परलोक का उद्यम करते हैं, इससे यहाँ भी शोभा पाते हैं और परलोक में भी सुख पाते हैं। उनके दोनों लोकों के कष्ट मिट जाते हैं। जो इसी लोक का