योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 1734 में से
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उद्यम करते हैं, उनको दोनों ही दुःखदायक होते हैं अर्थात् यहाँ तृष्णा नहीं मिटती और आगे जाकर नरक भोगते हैं । जिन पुरुषों ने आत्मा की भलाई का यत्न किया है, उनको वही सिद्ध होता है और वे सुखी होते हैं । जिसने यत्न नहीं किया, वह दुःखी होता है । इसलिए अहंकार से रहित होने से ही आत्मपद की प्राप्ति होती है । जब तक परिच्छिन्न अहंकार होता है, तब तक दुःखी होता है, तब इसका नाम जीव होता है । जो कुछ फुरता है, उससे विश्व की उत्पत्ति होती है । जैसे नेत्रों के खोलने से रूप दिखता है और नेत्रों के मूँदने से रूप का अभाव हो जाता है, वैसे ही जब अहंता जागती है, तब दृश्य दिखता है और जब अहंता का अभाव होता है, तब दृश्य का भी अभाव हो जाता है । अहंता अज्ञान से सिद्ध होती और ज्ञान के उपजने से निवृत्त हो जाती है ।
हे राम ! यदि पुरुष अपना प्रयत्न और साथ ही सत्संग करे तो इस संसारसमुद्र से तर जावेगा । और किसी प्रकार नहीं तर सकता । हे राम ! युक्ति से जैसे विष भी अमृत हो जाता है, वैसे पुरुषार्थ से सिद्धि प्राप्त होती है । हे राम ! इस जीव को दो रोग हैं—एक यह लोक और दूसरा परलोक । उनमें दुःख पाना है । जिन पुरुषों ने सन्तों के संग रूपी औषध से इन रोगों की चिकित्सा की है, वे मुक्तरूप हैं और जिन्होंने वह औषध नहीं की, वे पुरुष पंडित हों तो भी दुःख पाते हैं । वह औषध क्या है ? शम, दम और सत्सङ्ग । इन साधनों के यत्न से जिसने आत्मपद पाया है, वह कल्याणमूर्ति है । हे राम ! चिकित्सा भी यही है । जिसने औषध की, वह कृतार्थ हुआ और जिन्होंने न की, वे भोग में लिपटे रहे । वे मूर्ख वहाँ पड़ेंगे, जहाँ फिर कोई औषध न पावेंगे । इससे हे राम ! इन भोगों का त्याग करो और आत्मविचार में सावधान हो रहो—यही औषध है । हे राम ! जिस पुरुष ने मन नहीं जीता, वह मूढ़ है—वह भोगरूपी कीचड़ में डूबा है और आपदा का पात्र है । जैसे समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं, वैसे ही उसको आपदा प्राप्त होती है । जिसकी तृष्णा भोग से निवृत्त हुई है और वैराग्य उपजा है, वह मुक्त होता है ।