योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण प्रकरण ४५७
जैसे जीवन का आदि बालक अवस्था है, वैसे ही निर्वाणपद का आदि वैराग्य है । हे राम ! जैसे दूसरा चन्द्रमा, संकल्पनगर और मृगतृष्णा का जल भ्रम से भासित होता है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से प्रकट है । संसार का बीज अहंता है । जब अहंता उदय होती है, तब रूप और अवलोक भासित होता है । इससे यही चिन्तन करो कि मैं नहीं हूँ । जब यही भावना करोगे, तब शेष जो रहेगा वही तुम्हारा शान्तरूप है । उसमें आकाश भी शून्य है । अहं के उत्थान से रहित जड़-अजड़ सब केवल आत्मत्वमात्र है ।
जड़ता का उसमें अभाव है, इससे अजड़ और केवल ज्ञानमात्र है । उसमें विश्व ऐसे है जैसे जल में तरङ्ग, पवन में स्पन्दन और आकाश में शून्यता । आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जो आत्मा से कुछ भिन्न होता तो प्रलय में उसका नाश हो जाता । पर आत्मा तो प्रलयकाल में भी रहता है । जैसे सूर्य की किरणों में सदा जल का आभास रहता है, वैसे ही आत्मा में विश्व का चमत्कार रहता है । जैसे स्वप्नसृष्टि अनुभवस्वरूप होती है, वैसे ही यह जाग्रतसृष्टि भी अनुभव है । आत्मा भीतर बाहर से रहित, अद्वैत, अजर, अमर चैत्य से रहित, चैतन्य और सब शब्द-अर्थ का अधिष्ठान है । अहं के स्फुरण से दूसरा भासित होता है । फुरना, न फुरना वही है । जैसे चलना और ठहरना, दोनों पवन के रूप हैं । जब पवन चलता है तब प्रतीत होता है और जब ठहरता है, तब नहीं मालूम पड़ता, वैसे ही जब चित्तशक्ति फुरती है, तब विश्वरूप होकर भासित होती है और जब नहीं स्फुरित होती, तब केवल मात्र पद रहता है । वह पद निराभास, अविनाशी, निर्विकल्प और सबका अपना रूप है । सत्य, असत्य, जड़, चेतन आदिक सब शब्द-अर्थ उसी अधिष्ठानसत्ता में फुरते हैं । इससे उसी अपने स्वरूप में स्थित होओ, जो परमार्थसत्ता आत्मतत्त्व, अपने स्वभाव में स्थित और अहं-त्वं से रहित केवल आकाश-रूप, सबका अधिष्ठान है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शान्तिस्थितियोगोपदेशोनाम शताधिकत्रिपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ १५३ ॥