भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

वैराग्य प्रकरण । ५५

से धूम निकलता है। वैसे ही शरीररूपी वृक्ष में में जरारूपी अग्नि लगकर तृष्णारूपी धुआँ निकलता है। जैसे डिब्बे में बड़े रत्न रहते हैं वैसे ही जरारूपी डिब्बे में दुःखरूपी अनेक रत्न रहते हैं। जरारूपी वसन्त ऋतु है; उससे शरीररूपी वृक्ष दुःखरूपी रस से होता। जैसे हाथी जंजीर से बँधा हुआ दीन हो जाता है वैसे ही जरारूपी जंजीर से बँधा पुरुष दीन हो जाता है। उसके सब अङ्ग शिथिल हो जाते हैं बल क्षीण हो जाता है, इन्द्रियाँ भी निर्बल हो जाती हैं और शरीर जर्जरी भाव को प्राप्त होता है, परन्तु तृष्णा नहीं घटती वह तो नित्य बढ़ती चली जाती है। जैसे रात्रि आती है तब सूर्यवंशी कमल सब मूँद जाते हैं और पिशाचिनी आ विचरने लगती है और प्रसन्न होती है वैसे ही जरारूपी रात्रि के आने से सब शक्ति रूप कमल मूँद जाते हैं तृष्णारूपी पिशाचिनी प्रसन्न होती है। हे मुनीश्वर ! जैसे गङ्गातट के वृक्ष गङ्गाजल के वेग में जर्जरीभूत हो जाते हैं वैसे ही जो यह आयुरूपी प्रवाह चलता है उसके वेग से शरीर जर्जरीभूत हो जाता है जैसे मांस के टुकड़े को देख आकाश में उड़ती चील नीचे आकर ले जाती है वैसे ही जराअवस्था में शरीररूपी मांस को काल ले जाता है हे मुनीश्वर ! यह तो काल का ग्रास बना हुआ है। जैसे वृक्ष को हाथी खा जाता है वैसे जरावाले शरीर को काल देख के खाता है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जरावस्थानिरूपणं नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़ा है इसमें अज्ञानी गिरा है, पर संसाररूपी गढ़ा तो अल्प है और अज्ञानी बड़ा हो गया है। संकल्प विकल्प की अधिकता से बढ़ा है । जो ज्ञानवान् पुरुष है वह संसार को मिथ्या जानता है और संसाररूपी जाल में नहीं फँसता और जो अज्ञानी पुरुष है वह संसार को सत्य जानकर उसकी आस्थारूपी जाल में फँसता है और भोगों की वाञ्छा करता है। वह ऐसा है जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब देखकर बालक पकड़ने की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी संसार को सत्य जानकर जगत के पदार्थ की वाञ्छा करता