योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६ | योगवाशिष्ठ । |
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है कि यह मुझे प्राप्त हो और यह न हो । यह सब सुख नाशात्मक है अभिप्राय यह कि आते हैं और जाते हैं स्थिर नहीं रहते; इनको काल ग्रास करता है । जैसे पक्के अनार को चूहा खा जाता है वैसे ही सब पदार्थों को काल खाता है । हे मुनीश्वर ! यह सब पदार्थ कालग्रसित हैं । जैसे नेवला सर्प को भक्षण कर जाता है वैसे ही बड़े बड़े बली सुमेरु ऐसे गम्भीर पुरुषों को काल ने ग्रसित किया है । जगतरूपी एक गूलर का फल है; उसमें मज्जा ब्रह्मादिक हैं और उसका वन ब्रह्म-रूप है । उस ब्रह्मरूप वन में जितने वन हैं सो सब इसका आहार है । यह काल सबको भक्षण कर जाता है । हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है; जो कुछ देखने में आता है सो सब इसने ग्रास कर लिया है । हमारे जो बड़े ब्रह्मादिक हैं उनका भी काल ग्रास कर जाता है तो और का क्या कहना है जैसे सिंह मृग का ग्रास कर लेता है । काल किसी से जाना नहीं जाता । क्षण; घरी, प्रहर, दिन, मास और वर्षादिक से जानिये सोई काल है और काल की मूर्ति प्रकट नहीं है । यह किसी को स्थिर नहीं होने देता । एक बेलि, काल ने पसारी है उसकी त्वचा रात्रि है और फूल दिन है और जीवरूपी भौंरे उस पर आ बैठते हैं । हे मुनी-श्वर ! जगतरूपी गूलर का फल है उसमें जीवरूपी बहुत मच्छर रहते हैं । जैसे तोता अनार का भक्षण करता है वैसे ही काल उस फल का भक्षण करता है । जगतरूपी वृक्ष है; जीवरूपी उसके पत्र हैं और कालरूपी हस्ती उसका भक्षण कर जाता है । शुभ अशुभरुपी भैसे को कालरूपी सिंह छेद छेद के खाता है । हे मुनीश्वर ! यह काल महाक्रूर है; किसी पर दया नहीं करता; सबको खा जाता है । जैसे मृग सब कमलों को खा जाता है उसमे कोई नहीं बचता वैसे ही काल भी सबको खाता है परन्तु एक कमल बचा है उस कमल के शान्ति और मैत्री अंकुर हैं और चेतनामात्र प्रकाश है, इस कारण वह बचा है । कालरूपी मृग इस तक नहीं पहुँच सकता बल्कि इसमें प्राप्त हुआ काल भी लीन हो जाता है । जो कुछ प्रपंच है सो सब काल के मुख में है । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, कुबेर आदि सब मूर्ति काल की धरी हुई हैं । यह उनको भी अन्तर्द्धान कर देता है । हे मुनी-