योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 596, कुल 1734 में से
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न हो, उस इच्छा में जीव कहलाता है । चित्शक्ति की जो ऐसी संज्ञा होती है, वह स्पन्दन से होती है । पर शिवतत्त्व अस्फुरण है और अचेत शक्ति में फुरने की नाईं स्थित है ।
जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं होता और हुए की नाईं भासता है, वैसे ही यह जगत् है नहीं और हुए की नाईं दिखता है, इससे उसको यह संज्ञा देते हैं । परमात्मा की क्रियाशक्ति काली प्रथम तो कारणरूप-प्रकृति है और उसी मे सब हैं—उसी मे प्रकृतिरूप है । वह विकृति अर्थात् किसी का कार्य नहीं है । महत्तत्त्व, पञ्चभूत, और अहंकार ये सात प्रकृति—विकृत हैं—अर्थात् कार्य भी हैं और कारण भी हैं । कार्य आदि देवी के हैं और कारण षोडश के हैं—पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ, पञ्चकर्म इन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और एक मन । इनके सप्तदश कार्य हैं । षोडश विकृति हैं अर्थात् कार्यरूप हैं, कारण किसी के नहीं । सत्रहवाँ पुरुष जो परमात्मा का अंश है वह अद्वैत, अचिन्त्य और चिन्मात्र है । न किसी का कारण है और न कार्य अपने आपमें स्थित है । इससे कारणकार्य में जितनी द्वैतकल्पना है, वह सब चित्तशक्ति में स्थित है । जब यह निस्पन्द होती है, तब तत्त्वरूप शिवपद में निर्वाण हो जाती है और कारण-कार्यरूपी सब भ्रम मिट जाता है, केवल आकाशवत् शेष रहता है । वह शुद्ध, अद्वैत, अचेत चिन्मात्र सदा अपने आप-भाव में स्थित है और उसकी स्पन्दनरूप क्रियाशक्ति की ये सब संज्ञा हैं । प्रथम तो सबका कारणरूप प्रकृति है, जो शोष है, अर्थात् जैसे बड़वाग्नि समुद्र को सुखाती है, वैसे ही वह जगत् को सुखाती है । वह सिद्ध है, अर्थात् साधक उसे आश्रय करके सेवते हैं । वह जयन्ती है, अर्थात् उसकी जय है । वह चण्डिका है अर्थात् उसके क्रोध से जगत् का प्रलय होता है और संसार डरता है । वह वीर्य है, अर्थात् उसका वीर्य अनन्त है । वह दुर्गा है, अर्थात् उसका रूप जानना कठिन है वह गायत्री है, अर्थात् उसके पाठ से संसार समुद्र से रक्षा होती है । वह सावित्री है, अर्थात् जगत् का पालन करती है । वह कुमारी अर्थात् कोमलस्वभाव है । वह गौरी अर्थात् गौर अङ्गवाली है । वह शिवा अर्थात्