योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ६०५
हे महाभाग ! जो प्रपञ्च तुमको दृष्ट आता है वह जगद्भ्रम है, परमार्थ में न कोई जगत् है, न कोई मित्र है और न कोई बान्धव है जैसे मरु-स्थल में बड़ी नदी भासती है परन्तु उसमें जल का एक बूंद भी नहीं होता तैसे ही वास्तव में जगत् कुछ नहीं। बड़े बड़े लक्ष्मीवान् जो छत्र चामरों से सम्पन्न शोभते हैं वे विपर्यय होंगे क्योंकि यह लक्ष्मी तो चञ्चलस्वरूप है कोई दिनों में अभाव हो जाती है। हे भाई ! तू परमार्थ दृष्टि से विचार देख, न तू है और न जगत् है, यह दृश्य भ्रान्तिरूप है इसको हृदय से त्याग। इसी माया दृष्टि से बार बार उपजता है और विन-शता है। यह जगत् अपने संकल्प से उपजा है, इसमें सत्य पदार्थ कोई नहीं। अज्ञानरूपी मरुस्थल में जगतरूपी नदी है और उसमें शुभ-अशुभ-रूपी तरङ्ग उपजते और फिर नष्ट हो जाते हैं।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे पावनबोधवर्द्धन- न्नामैकोनविंशतितमसर्गः ॥ १९ ॥
पुण्यक बोले, हे भाई ! तेरे कई माता और कई पिता हो होकर मिट गये हैं। जैसे वायु में धूल के कणके उड़ते हैं तैसे बान्धव हैं, न कोई मित्र है, और न कोई शत्रु है सम्पूर्ण जगत् भ्रान्तिरूप है और उसमें जैसी भावना स्फुरती है, तैसे ही हो भासती है। बान्धव, मित्र, पुत्र आदिकों में जो स्नेह होता है सो मोह में कल्पित है और अपने मन से माता पितादिक संज्ञा कल्पी है। जगत् प्रपञ्च में जैसे संज्ञा कल्पता है तैसे ही हो भासती है, जहाँ बान्धव की भावना होती है वहाँ बान्धव भासता है और जहाँ और की भावना होती है वहाँ और ही हो भासता है। जो अमृत में विष की भावना होती है तो अमृत भी विष हो जाता है सो कुछ अमृत में विष नहीं भावना रूप भासता है, तैसे ही न कोई बान्धव है और न कोई शत्रु है, सर्वदाकाल विद्यमान एक सर्वगत सर्वात्मा पुरुषस्थित है उसमें अपने और और की कल्पना कोई नहीं और जो कुछ देहादि हैं वे रक्त मांसादि के समूह से रचे हैं उनमें अहंसत्ता कौन है और अहंकार, चित्त, बुद्धि और मन कौन है ? परमार्थदृष्टि से यह तो कुछ नहीं है, विचार किये से न तू है, न मैं हूँ, यह सब मिथ्या ज्ञान से भासते हैं। एक अनन्त चिदाकाश आत्मसत्ता सर्वदा है उसमें