योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 6, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य प्रकरण ।
জো अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं, अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया। इतना सुन राजा ने पूछा, हे भगवन् ! चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ और किसने दिया सो कहो ? वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! एक काल में सनत्कुमार, जो निष्काम हैं, ब्रह्मपुरी में बैठे थे और त्रिलोक के पति विष्णु भगवान् भी वैकुण्ठ से उतरकर ब्रह्मपुरी में आये । तब ब्रह्मसहित सर्वसभा उठकर खड़ी हुई और श्रीभगवान् का पूजन किया, पर सनत्कुमार ने पूजन नहीं किया । इस बात को देखकर विष्णु भगवान् बोले कि हे सनत्कुमार ! तुमको निष्कामता का अभिमान है इससे तुम काम से आतुर होगे और स्वामि-कार्त्तिक तुम्हारा नाम होगा । सनत्कुमार बोले, हे विष्णो ! सर्वज्ञता का अभिमान तुमको भी है, इसलिए कुछ काल के लिए तुम्हारी सर्वज्ञता निवृत्त होकर अज्ञानता प्राप्त होगी । हे राजन् ! एक तो यह शाप हुआ, दूसरा एक और भी शाप है, सुनो । एक काल में भृगु की स्त्री जाती रही थी । उसके वियोग से वह ऋषि क्रोधित हुआ था उसको देखकर विष्णुजी हँसे तब भृगु ब्राह्मण ने शाप दिया कि हे विष्णो ! मेरी तुमने हँसी की है सो मेरी नाईं तुम भी स्त्री के वियोग से आतुर होगे । और एक दिवस देवशर्मा ब्राह्मण ने नरसिंह भगवान् को शाप दिया था सो भी सुनिये । एक दिन नरसिंह भगवान् गंगा के तीर पर गये और वहाँ देवशर्मा ब्राह्मण की स्त्री को देखकर नरसिंहजी भयानक रूप दिखाकर हँसे । निदान उनको देखकर ऋषि की स्त्री ने भय पाय प्राण छोड़ दिया । तब देवशर्मा ने शाप दिया कि तुमने मेरी स्त्री का वियोग किया, इससे तुम भी स्त्री का वियोग पावोगे । हे राजन् ! सनत्कुमार, भृगु और देव-शर्मा के शाप से विष्णु भगवान् ने मनुष्य का शरीर धारण किया और राजा दशरथ के घर में प्रकटे । हे राजन् ! वह जो शरीर धारण किया और आगे जो वृत्तान्त हुआ सो सावधान होकर सुनो । अनुभवात्मक मेरा आत्मा जो त्रिलोकी अर्थात् स्वर्ग, मृत्यु और पाताल का प्रकाशकर्ता और भीतर बाहर आत्मतत्त्व से पूर्ण है उस सर्वात्मा को नमस्कार है । हे राजन् ! यह शास्त्र जो आरम्भ किया है इसका विषय, प्रयोजन और