भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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६ योगवाशिष्ठ ।

नमस्कार है । हे देवि ! जब इस प्रकार राजा ने मुझसे कहा तब मैं विमान और अप्सरा आदि सबको लेकर स्वर्ग को गया और सम्पूर्ण वृत्तान्त इन्द्र से कहा । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और सुन्दर वाणी से मुझसे बोला कि हे दूत ! तुम फिर जहाँ राजा है वहाँ जाओ । वह संसार से उपराम हुआ है । उसको अब आत्मपद की इच्छा हुई है इसलिए तुम उसको अपने साथ वाल्मीकिजी के पास, जिसने आत्म-तत्त्व को आत्माकार जाना है, ले जाकर मेरा यह सन्देशा देना कि हे महाऋषे ! इस राजा को तत्त्वबोध का उपदेश करना क्योंकि यह बोध का अधिकारी है । इसको स्वर्ग तथा और पदार्थों की भी इच्छा नहीं, इससे तुम इसको तत्त्वबोध का उपदेश करो और यह तत्त्वबोध को पाकर संसारदुःख से मुक्त हो । हे सुभद्रे ! जब इस प्रकार देवराज ने मुझसे कहा तब मैं वहाँ से चलकर राजा के निकट आया और उससे कहा कि हे राजन् ! तुम संसारसमुद्र से मोक्ष होने के निमित्त वाल्मीकि-जी के पास चलो; वे तुमको उपदेश करेंगे । उसको साथ लेकर मैं वाल्मीकिजी के स्थान पर आया और उस स्थान में राजा को बैठा और प्रणामकर इन्द्र का सन्देशा दिया । तब वाल्मीकिजी ने कहा, हे राजन् ! कुशल तो है ? राजा बोले, हे भगवन् ! आप परमतत्त्वज्ञ और वेदान्त जाननेवालों में श्रेष्ठ हैं, मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ और अब मुझको कुशलता प्राप्त हुई है । मैं आपसे पूछता हूँ कृपा करके उत्तर दीजिए कि संसार बन्धन से कैसे मुक्ति हो ? इतना सुन वाल्मीकिजी बोले हे राजन् ! महारामायण औषध तुमसे कहता हूँ, उसको सुनके उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे तब जीवन्मुक्त होकर विचरोगे । हे राजन् ! वह वशिष्ठजी और रामचन्द्रजी का संवाद है और उसमें मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन-कर जैसे रामचन्द्रजी अपने स्वभाव में स्थित हुए और जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं वैसे ही तुम भी विचरोगे । राजा बोले, हे भगवन् ! रामचन्द्रजी कौन थे कैसे थे और कैसे होकर विचरे सो कृपा करके कहो ? वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! शाप के वश से सच्चिदानन्द विष्णुजी ने