योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
६ योगवाशिष्ठ ।
नमस्कार है । हे देवि ! जब इस प्रकार राजा ने मुझसे कहा तब मैं विमान और अप्सरा आदि सबको लेकर स्वर्ग को गया और सम्पूर्ण वृत्तान्त इन्द्र से कहा । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और सुन्दर वाणी से मुझसे बोला कि हे दूत ! तुम फिर जहाँ राजा है वहाँ जाओ । वह संसार से उपराम हुआ है । उसको अब आत्मपद की इच्छा हुई है इसलिए तुम उसको अपने साथ वाल्मीकिजी के पास, जिसने आत्म-तत्त्व को आत्माकार जाना है, ले जाकर मेरा यह सन्देशा देना कि हे महाऋषे ! इस राजा को तत्त्वबोध का उपदेश करना क्योंकि यह बोध का अधिकारी है । इसको स्वर्ग तथा और पदार्थों की भी इच्छा नहीं, इससे तुम इसको तत्त्वबोध का उपदेश करो और यह तत्त्वबोध को पाकर संसारदुःख से मुक्त हो । हे सुभद्रे ! जब इस प्रकार देवराज ने मुझसे कहा तब मैं वहाँ से चलकर राजा के निकट आया और उससे कहा कि हे राजन् ! तुम संसारसमुद्र से मोक्ष होने के निमित्त वाल्मीकि-जी के पास चलो; वे तुमको उपदेश करेंगे । उसको साथ लेकर मैं वाल्मीकिजी के स्थान पर आया और उस स्थान में राजा को बैठा और प्रणामकर इन्द्र का सन्देशा दिया । तब वाल्मीकिजी ने कहा, हे राजन् ! कुशल तो है ? राजा बोले, हे भगवन् ! आप परमतत्त्वज्ञ और वेदान्त जाननेवालों में श्रेष्ठ हैं, मैं आपके दर्शन करके कृतार्थ हुआ और अब मुझको कुशलता प्राप्त हुई है । मैं आपसे पूछता हूँ कृपा करके उत्तर दीजिए कि संसार बन्धन से कैसे मुक्ति हो ? इतना सुन वाल्मीकिजी बोले हे राजन् ! महारामायण औषध तुमसे कहता हूँ, उसको सुनके उसका तात्पर्य हृदय में धारने का यत्न करना । जब तात्पर्य हृदय में धारोगे तब जीवन्मुक्त होकर विचरोगे । हे राजन् ! वह वशिष्ठजी और रामचन्द्रजी का संवाद है और उसमें मोक्ष का उपाय कहा है । उसको सुन-कर जैसे रामचन्द्रजी अपने स्वभाव में स्थित हुए और जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं वैसे ही तुम भी विचरोगे । राजा बोले, हे भगवन् ! रामचन्द्रजी कौन थे कैसे थे और कैसे होकर विचरे सो कृपा करके कहो ? वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! शाप के वश से सच्चिदानन्द विष्णुजी ने
वैराग्य प्रकरण ।
জো अद्वैत ज्ञान से सम्पन्न हैं, अज्ञान को अंगीकार करके मनुष्य का शरीर धारण किया। इतना सुन राजा ने पूछा, हे भगवन् ! चिदानन्द हरि को शाप किस कारण हुआ और किसने दिया सो कहो ? वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! एक काल में सनत्कुमार, जो निष्काम हैं, ब्रह्मपुरी में बैठे थे और त्रिलोक के पति विष्णु भगवान् भी वैकुण्ठ से उतरकर ब्रह्मपुरी में आये । तब ब्रह्मसहित सर्वसभा उठकर खड़ी हुई और श्रीभगवान् का पूजन किया, पर सनत्कुमार ने पूजन नहीं किया । इस बात को देखकर विष्णु भगवान् बोले कि हे सनत्कुमार ! तुमको निष्कामता का अभिमान है इससे तुम काम से आतुर होगे और स्वामि-कार्त्तिक तुम्हारा नाम होगा । सनत्कुमार बोले, हे विष्णो ! सर्वज्ञता का अभिमान तुमको भी है, इसलिए कुछ काल के लिए तुम्हारी सर्वज्ञता निवृत्त होकर अज्ञानता प्राप्त होगी । हे राजन् ! एक तो यह शाप हुआ, दूसरा एक और भी शाप है, सुनो । एक काल में भृगु की स्त्री जाती रही थी । उसके वियोग से वह ऋषि क्रोधित हुआ था उसको देखकर विष्णुजी हँसे तब भृगु ब्राह्मण ने शाप दिया कि हे विष्णो ! मेरी तुमने हँसी की है सो मेरी नाईं तुम भी स्त्री के वियोग से आतुर होगे । और एक दिवस देवशर्मा ब्राह्मण ने नरसिंह भगवान् को शाप दिया था सो भी सुनिये । एक दिन नरसिंह भगवान् गंगा के तीर पर गये और वहाँ देवशर्मा ब्राह्मण की स्त्री को देखकर नरसिंहजी भयानक रूप दिखाकर हँसे । निदान उनको देखकर ऋषि की स्त्री ने भय पाय प्राण छोड़ दिया । तब देवशर्मा ने शाप दिया कि तुमने मेरी स्त्री का वियोग किया, इससे तुम भी स्त्री का वियोग पावोगे । हे राजन् ! सनत्कुमार, भृगु और देव-शर्मा के शाप से विष्णु भगवान् ने मनुष्य का शरीर धारण किया और राजा दशरथ के घर में प्रकटे । हे राजन् ! वह जो शरीर धारण किया और आगे जो वृत्तान्त हुआ सो सावधान होकर सुनो । अनुभवात्मक मेरा आत्मा जो त्रिलोकी अर्थात् स्वर्ग, मृत्यु और पाताल का प्रकाशकर्ता और भीतर बाहर आत्मतत्त्व से पूर्ण है उस सर्वात्मा को नमस्कार है । हे राजन् ! यह शास्त्र जो आरम्भ किया है इसका विषय, प्रयोजन और
८
योगवाशिष्ठ ।
सम्बन्ध क्या है और अधिकारी कौन है सो सुनो। यह शास्त्र सत्-चित् आनन्दरूप अचिन्त्यचिन्मात्र आत्मा को जताता है यह तो विषय है, परमानन्द आत्मा की प्राप्ति और अनात्म अभिमान दुःख की निवृत्ति प्रयोजन है और ब्रह्मविद्या और मोक्ष उपाय से आत्मपद प्रतिपादन सम्बन्ध है जिसको यह निश्चय है कि मैं अद्वैत-ब्रह्म अनात्मदेह से बाँधा हुआ हूँ सो किसी प्रकार छूटूँ वह न अति ज्ञानवान् है, न मूर्ख है, ऐसा विकृति आत्मा यहाँ अधिकारी है। यह शास्त्र मोक्ष (परमानन्द की प्राप्ति) करानेवाला है। जो पुरुष इसको विचारेगा वह ज्ञानवान् होकर फिर जन्ममृत्युरूप संसार में न आवेगा। हे राजन् ! यह महारामायण पावन है। श्रवणमात्र से ही सब शाप का नाशकर्त्ता है जिसमें रामकथा है। यह मैंने प्रथम अपने शिष्य भारद्वाज को सुनाई थी। एक समय भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास आये और मैंने उसको उपदेश किया था। वह उसको सुनकर वचनरूपी समुद्र से साररूपी रत्न निकाल और हृदय में धरकर एक समय सुमेरु पर्वत पर गया। वहाँ ब्रह्माजी बैठे थे, उसने उनको प्रणाम किया और उनके पास बैठकर यह कथा सुनाई। तब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उससे कहा, हे पुत्र ! कुछ वर माँग; मैं तुझ पर प्रसन्न हुआ हूँ। भारद्वाज ने जिसका उदार आशय था, उनसे कहा, हे भूत-भविष्य के ईश्वर ! जो तुम प्रसन्न हुए हो, तो यह वर दो कि सम्पूर्ण जीव संसार-दुःख से मुक्त हों और परमपद पावें उसी का उपाय भी कहो। ब्रह्माजी ने कहा, हे पुत्र ! तुम अपने गुरु वाल्मीकिजी के पास जाओ। उसने आत्मबोध महारामायण शास्त्र का जो परमपावन संसारसमुद्र के तरने का पुल है, आरम्भ किया है। उसको सुनकर जीव महामोहजनक संसारसमुद्र से तरेंगे। निदान परमेष्ठी ब्रह्मा जिनकी सर्वभूतों के हित में प्रीति है आप ही, भारद्वाज को साथ लेकर मेरे आश्रम में आये और मैंने भली प्रकार मे उनका पूजन किया। उन्होंने मुझसे कहा, हे मुनियों में श्रेष्ठ वाल्मीकि ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का आरम्भ किया है इम उद्यम का त्याग न करना; इसकी आदि से अन्त पर्यन्त समाप्ति करना; क्योंकि यह मोक्ष उपाय संसार-
वैराग्य प्रकरण । ६
रूपी समुद्र के पार करने को जहाज है और इससे सब जीव कृतार्थ होंगे । इतना कहकर ब्रह्माजी, जैसे समुद्र मे चक्र एक मुहूर्त पर्यन्त उठके फिर लीन हो जावे वैसे ही अन्तर्द्धान हो गये । तब मैंने भारद्वाज से कहा, हे पुत्र ! ब्रह्माजी ने क्या कहा ? भारद्वाज बोले हे भगवन् ! ब्रह्माजी ने तुमसे यह कहा कि हे मुनियों में श्रेष्ठ ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का उद्यम किया है उसका त्याग न करना; इसे अन्तपर्यन्त समाप्ति करना क्योंकि; संसारसमुद्र के पार करने को यह कथा जहाज है और इससे अनेक जीव कृतार्थ होकर संसार संकट से मुक्त होंगे । इतना कहकर फिर वाल्मीकिजी बोले हे राजन् ! जब इस प्रकार ब्रह्माजी ने मुझसे कहा तब उनकी आज्ञानुसार मैंने ग्रन्थ बनाकर भारद्वाज को सुनाया । हे पुत्र ! वशिष्ठजी के उपदेश को पाकर जिस प्रकार रामजी निश्शंक हो विचरे हैं वैसे ही तुम भी विचरो । तब उसने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! जिस प्रकार रामचन्द्रजी जीवन्मुक्त होकर बिचरे हैं वह आदि से क्रम करके मुझसे कहिये ? वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! रामचन्द्र, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता, कौशल्या, सुमित्रा और दशरथ ये आठ तो जीवन्मुक्त हुए हैं और आठ मन्त्री अष्टगण वशिष्ठ और वामदेव से आदि अष्टाविंशति जीवन्मुक्त हो बिचरे हैं उनके नाम सुनो । रामजी से लेकर दशरथपर्यन्त आठ तो ये कृतार्थ होकर परम बोधवान् हुए हैं और १ कुन्तभासी, २ शतवर्धन, ३ सुखधाम, ४ विभीषण, ५ इन्द्रजीत, ६ हनुमान्, ७ वशिष्ठ और ८ वामदेव ये अष्टमन्त्री निशङ्क हो चेष्टा करते भये और सदा अद्वैतनिष्ठ हुए हैं। इनको कदाचित् स्वरूप से द्वैतभाव नहीं फुरा है । ये अनामय पद की स्थिति में तृप्त रहकर केवल चिन्मात्र शुद्धपर परमपावनता को प्राप्त हुए हैं।
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणेकथारम्भवर्णनो नाम प्रथमस्सर्गः ॥ १ ॥
भारद्वाज ने पूछा हे भगवन् ! जीवन्मुक्त की स्थिति कैसी है और रामजी कैसे जीवन्मुक्त हुए हैं वह आदि से अन्तपर्यन्त सब कहो ? वाल्मीकिजी बोले, हे पुत्र ! यह जगत् जो भासता है सो वास्तविक कुछ नहीं उत्पन्न हुआ; अविचार करके भासता है और विचार करने से
१० । योगवाशिष्ठ ।
निवृत्त हो जाता है। जैसे आकाश में नीलता भासती है सो भ्रम से वैसे ही है यदि विचार करके देखिए तो नीलता की प्रतीति दूर हो जाती है वैसे ही अविचार से जगत् भासता है और विचार से लीन हो जाता है । हे शिष्य ! जब तक सृष्टि का अत्यन्त अभाव नहीं होता तब तक परमपद की प्राप्ति नहीं होती । जब दृश्य का अत्यन्त अभाव हो जावे तब शुद्ध चिदाकाश आत्मसत्ता भासेगी । कोई इस दृश्य का महाप्रलय में अभाव कहते हैं परन्तु मैं तुमको तीनों कालों का अभाव कहता हूँ । जब इस शास्त्र को श्रद्धासंयुक्त आदि से अन्त तक सुनकर धारण करे तब भ्रान्ति निवृत्त हो जावे और अव्याकृत पद की प्राप्ति हो । हे शिष्य ! संसार भ्रममात्र सिद्ध है । इसको भ्रममात्र जानकर विस्मरण करना यही मुक्ति है । जीव के बन्धन का कारण वासना है और वासना से ही भटकता फिरता है । जब वासना का क्षय हो जाय तब परमपद की प्राप्ति हो ! वासना का एक पुतला है उसका नाम मन है । जैसे जल सरदी की दृढ जड़ता पाकर बरफ हो जाता है और फिर सूर्य के ताप से पिघल-कर जल होता है तो केवल शुद्ध जल ही रहता है वैसे ही आत्मारूपी जल है, उसमें संसार की सत्यतारूपी जड़ता शीतलता है और उससे मन रूपी बरफ का पुतला हुआ है । जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होगा तब संसार की सत्यतारूपी जड़ता और शीतलता निवृत्त हो जावेगी । जब संसार की सत्यता और वासना निवृत्त हुई तब मन नष्ट हो जावेगा और जब मन नष्ट हुआ तो परम कल्याण हुआ । इससे इसके बन्धन का कारण वासना ही है और वासना के क्षय होने से मुक्ति है । वह वासना दो प्रकार की है—एक शुद्ध और दूसरी अशुद्ध । अशुद्धवासना से अपने वास्तविक स्वरूप के अज्ञान से अनात्मा जो देहादिक हैं उनमें अहंकार करता है और जब अनात्म में आत्म अभिमान हुआ, तब नाना प्रकार की वासना उपजती है जिससे घटीयंत्र की नाईं भ्रमता रहता है । हे साधो ! यह जो पञ्चभूत का शरीर तुम देखते हो सो सब वासनारूप है और वासना से ही खड़ा है । जैसे माला के दाने धागे के आश्रय से गुँथे होते हैं और जब धागा टूट जाता है तब न्यारे न्यारे हो जाते हैं
वैराग्य प्रकरण ।
और नहीं ठहरते वैसे ही वासना के क्षय होने पर पञ्चभूत का शरीर नहीं रहता। इससे सब अनर्थों का कारण वासना ही है। शुद्ध वासना में जगत् का अत्यन्त अभाव निश्चय होता है। हे शिष्य ! अज्ञानी की वासना जन्म का कारण होती है और ज्ञानी की वासना जन्म का कारण नहीं होती। जैसे कच्चा बीज उगता है और जो दग्ध हुआ है सो फिर नहीं उगता वैसे ही अज्ञानी का वासना रससहित है इससे जन्म का कारण है और ज्ञानी की वासना रसरहित है वह जन्म का कारण नहीं। ज्ञानी की चेष्टा स्वाभाविक होती है। वह किसी गुण से मिलकर अपने में चेष्टा नहीं देखता। वह खाता, पीता, लेता, देता, बोलता, चलता एवम् और अन्य व्यवहार करता है पर अन्तःकरण में सदा अद्वैत निश्चय को धरता है कदाचित् द्वैतभावना उसको नहीं फुरती। वह अपने स्वभाव में स्थित है इससे उसकी चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती। जैसे कुम्हार के चक्र को जब तक घुमावे तब तक फिरता है और जब घुमाना छोड़ दे तब स्थीयमान गति उतरते उतरते स्थिर रह जाता है वैसे ही जब तक अहङ्कार सहित वासना होती है तब तक जन्म पाता है और जब अहङ्कार से रहित हुआ तब फिर जन्म नहीं पाता। हे साधो ! इस अज्ञानरूपी वासना के नाश करने को एक ब्रह्मविद्या ही श्रेष्ठ उपाय है जो मोक्ष उपायक शास्त्र है। यदि इसको त्यागकर और शास्त्ररूपी गर्त्त में गिरेगा तो कल्पपर्यन्त भी अकृत्रिम पद को न पावेगा। जो ब्रह्मविद्या का आश्रय करेगा वह सुख से आत्मपद को प्राप्त होगा। हे भारद्वाज ! यह मोक्षउपाय रामजी और वशिष्ठजी का संवाद है, यह विचारने योग्य है और बोध का परम कारण है। इसे आदि से अन्तपर्यन्त सुनो और जैसे रामजी जीवन्मुक्त हो विचरे हैं सो भी सुनो। एक दिन रामजी अध्ययनशाला से विद्या पढ़के अपने गृह में आये और सम्पूर्ण दिन विचार सहित व्यतीत किया। फिर मन में तीर्थ ठाकुरद्वारे का संकल्प धरकर अपने पिता दशरथ के पास, जो अति प्रजापालक थे, आये और जैसे हंस सुंदर कमल को ग्रहण करे वैसे ही उन्होंने उनका चरण पकड़ा। जैसे कमल के फूल के नीचे कोमल तरैयाँ होती हैं और उन तरैयों सहित कमल को
१२ | योगवाशिष्ठ ।
हंस पकड़ता है वैसे ही दशरथजी की अँगुलियों को उन्होंने ग्रहण किया और बोले, हे पिता ! मेरा चित्त तीर्थ और ठाकुरद्वारों के दर्शनों को चाहता है । आप आज्ञा कीजिये तो में दर्शन कर आऊँ । में तुम्हारा पुत्र हूँ । आगे मैंने कभी नहीं कहा यह प्रार्थना अब ही की है इससे यह वचन मेरा न फेरना, क्योंकि ऐसा त्रिलोकी में कोई नहीं है कि जिसका मनोरथ इस घर से सिद्ध न हुआ हो इससे मुझको भी कृपाकर आज्ञा दीजिये । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जिस समय इस प्रकार रामजी ने कहा तब वशिष्ठजी पास बैठे थे उन्होंने भी दशरथ से कहा, हे राजन् ! इनका चित्त उठा है रामजी को आज्ञा दो तीर्थ कर आवें और इनके साथ सेना, धन, मन्त्री और ब्राह्मण भी दीजिए कि विधिपूर्वक दर्शन करें तब महाराज दशरथ ने शुभ मुहूर्त दिखाकर रामजी को आज्ञा दी । जब वे चलने लगे तो पिता और माता के चरणों में पड़े और सबको कण्ठ लगाकर रुदन करने लगे । इस प्रकार सबसे मिलकर लक्ष्मण आदि भाई, मन्त्री और वशिष्ठ आदि ब्राह्मण जो विधि जाननेवाले थे बहुत सा धन और सेना साथ ली और दान पुण्य करते हुए गृह के बाहर निकले । उस समय वहाँ के लोगों और स्त्रियों ने रामजी के ऊपर फूलों और कलियों की माला की, जैसे वरफ बरसती है वैसी ही वर्षा की और रामजी की मूर्ति हृदय में धर ली । इसी प्रकार रामजी वहाँ से ब्राह्मणों और निर्धनों को दान देते गङ्गा, यमुना, सरस्वती आदि तीर्थों में विधिपूर्वक स्नानकर पृथ्वी के चारों ओर पर्यटन करते रहे । उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में दान किया और समुद्र के चारों ओर स्नान किया । सुमेरु और हिमालय पर्वत पर भी गये और शालग्राम, बद्री, केदार आदि में स्नान और दर्शन किये । ऐसे ही सब तीर्थस्थान, दान, तप, ध्यान और विधिसंयुक्त यात्रा करते करते एक वर्ष में अपने नगर में आये ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणेतीर्थयात्रावर्णनं नाम द्वितीयस्सर्गः ॥२॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जब रामजी यात्रा करके अपनी अयोध्यापुरी में आये तो नगरवासी पुरुष और स्त्रियों ने फूल और कली की वर्षा की, जय जय शब्द मुख से उच्चारने लगे और बड़े उत्साह को
वैराग्य प्रकरण । १३
प्राप्त भये जैसे इन्द्र का पुत्र स्वर्ग में आता है वैसे ही रामचन्द्रजी अपने घर में आये । रामजी ने पहिले राजा दशरथ और फिर वशिष्ठजी को प्रणाम किया और सब सभा के लोगों से यथायोग्य मिलकर अन्तःपुर में आ कौशल्या आदि माताओं को प्रणाम किया और भाई, बन्धु आदि कुटुम्ब से मिले । हे भारद्वाज ! इस प्रकार रामजी के आने का उत्साह सात दिन पर्यन्त होता रहा । उस अन्तर में कोई मिलने आवे उनसे मिलते और जो कोई कुछ लेने आवे उनको दान पुण्य करते थे अनेक बाजे बजते थे और भाट आदि बन्दीजन स्तुति करते थे । तदनन्तर रामजी का यह आचरण हुआ कि प्रातःकाल उठके स्नान सन्ध्यादिक सत्कर्म कर भोजन करते और फिर भाई बन्धुओं से मिलकर अपने तीर्थ की कथा और देव-द्वार के दर्शन की वार्ता करते थे । निदान इसी प्रकार उत्साह से दिन-रात बिताते थे । एक दिन रामजी प्रातःकाल उठके अपने पिता राजा दशरथ के निकट गये जिनका तेज चन्द्रमा के समान था । उस समय वशिष्ठादिक की सभा बैठी थी । वहाँ वशिष्ठजी के साथ कथा वार्ता की । राजा दशरथ ने उनसे कहा कि हे रामजी ! तुम शिकार खेलने जाया करो । उस समय रामजी की अवस्था सोलह वर्ष से कई महीने कम थी । लक्ष्मण और शत्रुघ्न भाई साथ थे, पर भरतजी नाना के घर गये थे । निदान उन्हीं के साथ नित चर्चा हुलास कर और स्नान, सन्ध्यादिक नित्य कर्म और भोजन करके शिकार खेलने जाते थे । वहाँ जो जीवों को दुःख देनेवाले जानवर देखते उनको मारते और अन्य लोगों को प्रसन्न करते थे। दिनको शिकार खेलने जाते और रात्रि को बाजे निशान सहित अपने घर में आते थे । इसी प्रकार बहुत दिन बीते । एक दिन रामजी बाहर से अपने अन्तःपुर में आकर शोकसहित स्थित भये । हे भारद्वाज ! राजकुमार अपनी सब चेष्टा और इन्द्रियों के रससंयुक्त विषयों को त्याग बैठे और उनका शरीर दुर्बल होकर मुख की कान्ति घट गई । जैसे कमल सूखकर पीतवर्ण हो जाता है वैसे ही रामजी का मुख पीला हो गया जैसे सूखे कमल पर भँवरे बैठे हों वैसे ही सूखे मुखकमल पर नेत्ररूपी भँवरे भासने लगे । जैसे शरत्काल में ताल निर्मल होता है वैसे
१४ योगवाशिष्ठ ।
ही इच्छारूपी मल से रहित उनका चित्तरूपी ताल निर्मल हो गया और दिन पर दिन शरीर निर्बल होता गया । वह जहाँ बैठें वहीं चिन्तासंयुक्त बैठे रहे जावें और हाथ पर चिबुक धरके बैठें । जब टहलुवे मन्त्री बहुत कहें कि हे प्रभो ! यह स्नान सन्ध्या का समय हुआ है अब उठो तब उठकर स्नानादिक करें अर्थात् जो कुछ खाने पीने बोलने, चलने और पहिरने की क्रिया थी सो सब उन्हें विरस हो गई । तब लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी रामजी को संशययुक्त देखके विरस प्रकार हो गये और राजा दशरथ यह वार्त्ता सुनके रामजी के पास आये तो क्या देखा कि रामजी महा-कृश हो गये हैं । राजा ने इस चिन्ता से आतुर हो कि हाय हाय इनकी यह क्या दशा हुई रामजी को गोद में बैठाया और कोमल सुन्दर शब्दों से पूछने लगे कि हे पुत्र ! तुमको क्या दुःख प्राप्त हुआ है जिससे तुम शोकवान् हुए हो ? रामजी ने कहा कि हे पिता ! हमको तो कोई दुःख नहीं । ऐसा कहकर चुप हो रहे । जब इसी प्रकार कुछ दिन बीते तो राजा और सब स्त्रियाँ बड़ी शोकवान् हुई । राजा राजमन्त्रियों से मिलकर विचार करने लगे कि पुत्र का किसी ठौर विवाह करना चाहिये और यह भी विचार किया कि क्या कारण है जो मेरे पुत्र शोकवान् रहते हैं । तब उन्होंने वशिष्ठजी से पूछा कि हे मुनीश्वर ! मेरे पुत्र शोकातुर क्यों रहते हैं ? वशिष्ठजी ने कहा हे राजन् ! जैसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश महाभूत अल्पकार्य में विकारवान् नहीं होते जब जगत् उत्पन्न और प्रलय होता है तब विकारवान् होते हैं वैसे ही महापुरुष भी अल्पकार्य से विकारवान् नहीं होते । हे राजन् ! तुम शोक मत करो । रामजी किसी अर्थ के निमित्त शोकवान् हुए होंगे; पीछे इनको सुख मिलेगा । इतना कह वाल्मीकिजी बोले हे भारद्वाज ! ऐसे ही वशिष्ठजी और राजा दशरथ विचार करते थे कि उसी काल में विश्वामित्र ने अपने यज्ञ के अर्थ राजा दशरथ के गृह पर आकर द्वारपाल से कहा कि राजा दशरथ से कहा कि "गाधि के पुत्र विश्वामित्र बाहर खड़े हैं"। द्वारपाल ने आकर राजा से कहा कि हे स्वामिन् ! एक बड़े तपस्वी द्वार पर खड़े हैं और उन्होंने कहा है कि राजा दशरथ के पास जाके कहो कि
वैराग्य प्रकरण । १५
विश्वामित्र आये हैं। हे भारद्वाज ! जब इस प्रकार द्वारपाल ने आकर कहा तब राजा, जो मण्डलेश्वरों सहित बैठा था और बड़ा तेजवान् था सुवर्ण के सिंहासन से उठ खड़ा हुआ और पैदल चला। राजा के एक ओर वशिष्ठजी और दूसरी ओर वामदेवजी और सुभट की नाई मण्ड-लेश्वर स्तुति करते चले और जहाँ से विश्वामित्र दृष्टि आये वहाँ से ही प्रणाम करने लगे। पृथ्वी पर जहाँ राजा का शीश लगता था वहाँ पृथ्वी हीरे और मोती से सुन्दर हो जाती थी। इसी प्रकार शीश नवाते राजा चले। विश्वामित्रजी काँधे पर बड़ी बड़ी जटा धारण किये और अग्नि के समान प्रकाशमान परम शान्तस्वरूप हाथ में बाँस की तन्द्री लिये हुए थे। उनके चरणकमलों पर राजा इस भाँति गिरा जैसे सूर्यपदा शिवजी के चरणारविन्द में गिरे थे। और कहा हे प्रभो ! मेरे बड़े भाग्य है जो आपका दर्शन हुआ। आज मुझे ऐसा आनन्द हुआ जो आदि अन्त और मध्य से रहित अविनाशी है। हे भगवन् ! आज मेरे भाग्य उदय हुए और मैं भी धर्मात्माओं में गिना जाऊँगा, क्योंकि आप मेरे कुशल निमित्त आये हैं। हे भगवन् ! आपने बड़ी कृपा की जो दर्शन दिया। आप सबसे उत्कृष्ट दृष्टि आते हैं, क्योंकि आप में दो गुण हैं—एक तो यह कि आप क्षत्रिय हैं, पर ब्राह्मण का स्वभाव आप में है और दूसरे यह कि शुभ गुणों से परिपूर्ण हैं। हे मुनीश्वर ! ऐसी किसी की सामर्थ्य नहीं कि क्षत्रिय से ब्राह्मण हो। आपके दर्शन से मुझे अति लाभ हुआ। फिर वशिष्ठजी विश्वामित्रजी को कण्ठ लगाके मिले और मण्डलेश्वरों ने बहुत प्रणाम किये। तदनन्तर राजा दशरथ विश्वामित्रजी को भीतर ले गये और सुन्दर सिंहासन पर बैठाकर विधि-पूर्वक पूजा की और अर्घ्यपादार्चन करके प्रदक्षिणा की। फिर वशिष्ठजी ने भी विश्वामित्रजी का पूजन किया और विश्वामित्रजी ने उनका पूजन किया इसी प्रकार अन्योन्य पूजन कर यथायोग्य अपने अपने स्थानों पर बैठे तब राजा दशरथ बोले, हे भगवन् ! हमारे बड़े भाग्य हुए जो आपका दर्शन हुआ। जैसे किसी को अमृत प्राप्त हो वा किसी का मरा हुआ बान्धव विमान पर चढ़के आकाश से आवै और उसके मिलने से
| १६ | योगवाशिष्ठ। |
|---|
आनन्द हो वैसा आनन्द मुझको हुआ है मुनीश्वर ! जिस अर्थ के लिये आप आये हैं वह कृपा करके कहिये और अपना वह अर्थ पूर्ण हुआ जानिये । ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो मुझको देना कठिन है, मेरे यहाँ सब कुछ विद्यमान है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे विश्वामित्रा- गमन वर्णनं नाम तृतीयस्सर्गः ॥ ३ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जब इस प्रकार राजा ने कहा तो मुनियों में शार्दूल विश्वामित्रजी ऐसे प्रसन्न हुए जैसे चन्द्रमा को देखकर क्षीरसागर उमड़ता है । उनके रोम खड़े हो आये और कहने लगे, हे राजशार्दूल ! तुम धन्य हो ! ऐसे तुम क्यों न कहो । तुम्हारे में दो गुण हैं—एक तो यह कि तुम रघुवंशी हो और दूसरे यह कि वशिष्ठजी जैसे तुम्हारे गुरु हैं जिनकी आज्ञा में चलते हो । अब जो कुछ मेरा प्रयोजन है वह प्रकट करता हूँ । मैने दशगात्र यज्ञ का आरम्भ किया है, जब यज्ञ करने लगता हूँ तब खर और दूषण निशाचर आकर विध्वंस कर जाते हैं और मांस, हाड़ और रुधिर डाल जाते हैं जिससे वह स्थान यज्ञ करने योग्य नहीं रहता और जब में और जगह जाता हूँ तो वहाँ भी वे उसी प्रकार अपवित्र कर जाते हैं इसलिये उनके नाश करने के लिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ । कदाचित यह कहिये कि तुम भी तो समर्थ हो, तो हे राजन् ! मैंने जिस यज्ञ का आरम्भ किया है उसका अंग क्षमा है । जो में उनको शाप दूँ तो वह भस्म हो जावें पर शाप क्रोध बिना नहीं होता । जो में क्रोध करूँ तो यज्ञ निष्फल होता है और जो चुपकर रहूँ तो राक्षस अपवित्र वस्तु डाल जाते हैं । इससे अब में आपकी शरण आया हूँ। हे राजन् ! अपने पुत्र रामजी को मेरे साथ भेज दो, वह राक्षसों को मारें और मेरा यज्ञ सफल हो । यह चिन्ता तुम न करना कि मेरा पुत्र अभी बालक है । यह तो इन्द्र के समान शूरवीर है । जैसे सिंह के सम्मुख मृग का बच्चा नहीं ठहर सकता वैसे ही इसके सम्मुख राक्षस न ठहर सकेंगे । इसको मेरे साथ भेजने से तुम्हारा यश और धर्म दोनों रहेंगे और मेरा कार्य होगा इसमें सन्देह नहीं । हे राजन् ऐसा कार्य त्रिलोकी में कोई
वैराग्य प्रकरण । १७
नहीं जो रामजी न कर सके इसीलिए मैं तुम्हारे पुत्र को लिये जाता हूँ, यह मेरे हाथ से रक्षित रहेगा और कोई विघ्न न होने दूँगा । जैसे तुम्हारे पुत्र हैं सो और वशिष्ठजी जानते हैं और ज्ञानवान् भी जो त्रिकालदर्शी हैं जानेंगे और किसी की सामर्थ्य नहीं जो इनको जानें । हे राजन् ! जो समय पर कार्य होता है वह थोड़े ही परिश्रम से सिद्ध होता है और समय विना बहुत परिश्रम करने से भी नहीं होता । खर और दूषण प्रबल दैत्य हैं, मेरे यज्ञ को खण्डित करते हैं । जब रामजी जावेंगे तब वह भाग जावेंगे उनके आगे खड़े न रह सकेंगे । जैसे सूर्य के तेज से तारागण का प्रकाश क्षीण हो जाता है वैसे ही रामजी के दर्शन से वे स्थित न रहेंगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले हे भारद्वाज ! जब विश्वामित्र ने ऐसा कहा तब राजा दशरथ चुप होकर गिर पड़े और एक मुहूर्त पर्यन्त पड़े रहे ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्य प्रकरणे दशरथ विषादो नाम चतुर्थःसर्गः ॥ ४ ॥
वाल्मीकिजी बोले हे भारद्वाज ! एक मुहूर्त उपरान्त राजा उठे और अधैर्य होकर बोले हे मुनीश्वर ! आपने क्या कहा ? रामजी तो अभी कुमार हैं । अभी तो उन्होंने शस्त्र और अस्त्रविद्या, नहीं सीखी, बल्कि फूलों की शय्या पर शयन करनेवाले; अन्तःपुर में स्त्रियों के पास बैठने-वाले और बालकों के साथ खेलनेवाले हैं । उन्होंने कभी भी रणभूमि नहीं देखी और न भृकुटी चढ़ाके कभी युद्ध ही किया । वह दैत्यों से क्या युद्ध करेंगे ? कभी पत्थर और कमल का भी युद्ध हुआ है । हे मुनीश्वर ! में तो बहुत वर्षों का हुआ हूँ । इस वृद्धावस्था में मेरे घर में चार पुत्र हुए हैं; उन चारों में रामजी अभी सोलह वर्ष के हुए हैं और मेरे प्राण हैं । उनके विना में एक क्षण भी नहीं रह सकता, जो तुम उनको ले जावोगे तो मेरे प्राण निकल जावेंगे । हे मुनीश्वर ! केवल मुझे ही उनका इतना स्नेह नहीं किन्तु लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत और माताओं के भी प्राण हैं । जो तुम उनको ले जावोगे तो सब ही मर जावेंगे जो तुम हमको रामजी के वियोग से मारने आये हो तो ले जावो । हे मुनीश्वर ! मेरे चित्त में तो रामजी पूर्ण हो रहे हैं उनको मैं आपके साथ कैसे दूँ ? मैं तो उनको देखकर प्रसन्न होता
| १८ | योगवाशिष्ठ । |
|---|
हूँ । रामजी के वियोग से मेरे प्राण कैसे बचेंगे ? हे मुनीश्वर ! ऐसी प्रीति मुझे स्त्री, धन और पदार्थों की नहीं जैसी रामजी की है । मैं आपके वचन सुनकर अति शोकवान् हुआ हूँ । मेरे बड़े अभाग्य उदय हुए जो आप इस निमित्त आये । मैं रामजी को कदापि नहीं दे सकता । जो आप कहिये तो मैं एक अक्षौहिणी सेना, जो अति शूरवीर और शस्त्र अस्त्रविद्या से सम्पन्न है साथ लेकर चलूँ और उनको मारूँ पर जो कुबेर का भाई और विश्रवा का पुत्र रावण हो तो उससे में युद्ध नहीं कर सकता । पहिले में बड़ा पराक्रमी था; ऐसा कोई त्रिलोकी में न था जो मेरे सामने आता, पर अब वृद्धावस्था प्राप्त होकर देह जर्जर हो गई है । हे मुनीश्वर ! मेरे बड़े अभाग्य हैं जो आप आये । मैं तो रावण से काँपता हूँ और केवल मैं ही नहीं वरन् इन्द्र आदि देवता भी उससे काँपते और भय पाते हैं । किसकी सामर्थ्य है जो उससे युद्ध करे । इस काल में वह बड़ा शूरवीर है । जो मेरी ही उसके साथ युद्ध करने की सामर्थ्य नहीं तो राजकुमार रामजी की क्या सामर्थ्य है । जिन रामजी को तुम लेने आये हो वह तो रोगी पड़े हैं । उनको ऐसी चिन्ता लगी है जिससे महाकृश हो गये हैं और अन्तःपुर में अकेले बैठे रहते हैं । खाना-पीना इत्यादि जो राजकुमारों की चेष्टायें हैं वह भी सब उनको बिसर गई हैं और मैं नहीं जानता कि उनको क्या दुःख हुआ है । जैसे पीतवर्ण कमल होता है वैसे ही उनका मुख हो गया है । उनको युद्ध की सामर्थ्य कहाँ है ? उन्होंने तो अपने स्थान से बाहर की पृथ्वी भी नहीं देखी है हमारे प्राण वही हैं उनके वियोग से नहीं जी सकते ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे दशरथोक्तिवर्ण- नन्नाम पञ्चमस्सर्गः ॥ ५ ॥
वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार दशरथजी ने महादीन और अधैर्य होकर कहा तों विश्वामित्रजी क्रोध करके कहने लगे कि हे राजन् ! तुम अपने धर्म को स्मरण करो । तुमने कहा था कि तुम्हारा अर्थ सिद्ध करूँगा पर अब तुम अपने धर्म को त्यागते हो । जो तुम सिंहों के समान होकर मृगों की नाईं भागते हो तो भागो पर आगे
वैराग्य प्रकरण । १६
रघुवंशी कुल में ऐसा कोई नहीं हुआ कि जिसने वचन फेरा हो । जो तुम करते हो सो करो हम चले जावेंगे परन्तु यह तुमको योग्य न था क्योंकि शून्य गृह से शून्य ही होकर जाता है तुम बसते रहो और राज्य करते रहो जैसे कुछ होगा हम समझ लेंगे । इतना कहकर वाल्मीकि जी बोले कि जब इस प्रकार विश्वामित्रजी को क्रोध उत्पन्न हुआ तो पचास कोटि योजन तक पृथ्वी कांपने लगी और इन्द्रादिक देवता भयवान् हुए कि यह क्या हुआ ? तब वशिष्ठजी बोले, हे राजन् ! इक्ष्वाकुकुल में सब परमार्थी हुए हैं और तुम अपना धर्म क्यों त्यागते हो ? मेरे सामने तुमने विश्वामित्रजी से कहा है कि तुम्हारा अर्थ पूरा करूँगा पर अब क्यों भागते हो । रामजी को तुम इनके साथ कर दो, यह तुम्हारे पुत्र की रक्षा करेंगे । इस पुरुष के सामने किसी का बल नहीं चलता यह साक्षात् ही काल की मूर्ति हैं जो तपस्वी कहिये तो भी इन के समान दूसरा नहीं है और शस्त्र और अस्त्रविद्या भी इनके सदृश कोई नहीं जानता क्योंकि दक्ष प्रजापति ने अपनी दो पुत्रियाँ जिनका नाम जया और सुभगा था विश्वामित्रजी को दी थीं जिन्होंने पाँच-पाँच सौ पुत्र दैत्यों के मारने के लिये प्रकट किये । वे दोनों इनके सम्मुख मूर्ति धारण करके स्थित होती हैं इससे इनको कौन जीत सकता है ? जिसके साथी विश्वामित्रजी हों उसको किसी का भय नहीं । आप इनके साथ अपना पुत्र निस्संशय होकर दो । किसी को सामर्थ्य नहीं कि इनके होते तुम्हारे पुत्र को कुछ कह सके । जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार का अभाव हो जाता है वैसे ही इनकी दृष्टि से दुःख का अभाव हो जाता है। हे राजन् ! इनके साथ तुम्हारे पुत्र को कोई खेद न होगा । तुम इक्ष्वाकु के कुल में उत्पन्न हुए हो और दशरथ तुम्हारा नाम है, जो तुम ऐसे हो अपने धर्म में स्थित न रहे तो और जीवों से धर्म का पालन कैसे होगा ? जो कुछ श्रेष्ठ पुरुष चेष्टा करते हैं उनके अनुसार और जीव भी करते हैं। जो तुम अपने वचनों का पालन न करोगे तो और किसी से क्या होगा ? तुम्हारे कुल में अपने वचन से कोई नहीं फिरा इससे अपने धर्म का त्यागना योग्य नहीं । यदि तुम दैत्यों के भय से शोकवान् हो तो मत हो । कदाचित् मूर्तिधारी
२० योगवाशिष्ठ ।
काल आकर स्थित हो तो भी विश्वामित्र के होते तुम्हारे पुत्र को कुछ भय न होगा । तुम शोक मत करो और अपने पुत्र को इनके साथ कर दो । जो तुम अपना पुत्र न दोगे तो तुम्हारा दो प्रकार का धर्म नष्ट होगा— एक धर्म यह कि कूप, बावली और ताल जो बनवाये हैं उनका पुण्य नष्ट हो जावेगा, दूसरे यह कि तप, व्रत, यज्ञ, दान, स्नानादिक क्रिया का फल भी नष्ट होकर तुम्हारा गृह अर्थहीन हो जावेगा । इससे मोह और शोक को छोड़ और धर्म को स्मरण करके रामजी को इनके साथ कर दो तो तुम्हारे सब कार्य सफल होंगे । हे राजन् ! इस प्रकार जो तुम्हें करना था तो प्रथम ही विचारकर कहते क्योंकि विचार किये बिना काम करने का परिणाम दुःख होता है । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा तो राजा दशरथ धैर्यवान् हुए और भृत्यों में जो श्रेष्ठ भृत्य था उसको बुलाकर कहा, हे महाबाहो ! रामजी को ले आवो ! उनके साथ जो चाकर बाहर आने जानेवाला और छल से रहित था राजा की आज्ञा लेकर रामजी के निकट गया और एक मुहूर्त पीछे आकर कहने लगा हे देव ! रामजी तो बड़ी चिन्ता में बैठे हैं । जब मैंने रामजी से बारंबार कहा कि चलिये तब वे कहने लगे कि चलते हैं ! ऐसे ही कह कह चुप हो रहते हैं । दूत का यह वचन सुन राजा ने कहा कि रामजी के मन्त्री और सब नौकरों को बुलाओ और जब वे सब निकट आये तो राजा ने आदर और युक्तिपूर्वक कोमल और सुन्दर वचन मन्त्री से इस भाँति कहा कि हे रामजी के प्यारे ! रामजी की क्या दशा है और ऐसी दशा क्योंकर हुई है सो सब क्रम से कहो ? मन्त्री बोला, हे देव ! हम क्या कहें ? हम अति चिन्ता से केवल आकार और प्राणसहित दीखते हैं किन्तु मृतक के समान हैं क्योंकि हमारे स्वामी रामजी बड़ी चिन्ता में हैं । हे राजन् ! जिस दिन से रघुनाथजी तीर्थ करके आये हैं उस दिन से चिन्ता को प्राप्त हुए हैं । जब हम उत्तम भोजन और पान करने और पहिरने और देखने के पदार्थ ले जाते हैं तो उनको देखकर वे किसी प्रकार प्रसन्न नहीं होते । वे तो ऐसी चिन्ता में लीन हैं कि देखते भी नहीं और जो देखते हैं तो क्रोध करके सुख
वैराग्य प्रकरण । २१
दायी पदार्थों का निरादर करते हैं। अन्तःपुर में उनकी माता नाना प्रकार के हीरे और मणि के भूषण देती हैं तो उनको भी डाल देते हैं अथवा किसी निर्धन को दे देते हैं; प्रसन्न किसी पदार्थ में नहीं होते। सुन्दर स्त्रियाँ नाना प्रकार के भूषणों सहित महामोह करनेवाली निकट आकर उनकी प्रसन्नता के निमित्त लीला और कटाक्ष करती हैं वे उनको भी विषवत् जानते हैं। जैसे पपीहा और किसी जल को नहीं पीता वैसे ही वे जब अन्तःपुर में जाते हैं तब उन स्त्रियों को देखकर क्रोध-वान् होते हैं। हे राजन् ! उनको कुछ भला नहीं लगता वे तो किसी बड़ी चिन्ता में मग्न हैं। तृप्त होकर भोजन नहीं करते क्षुधावन्त रहते हैं उन्हें कुछ न पहिरने और खाने-पीने की इच्छा है, न राज्य की इच्छा है और न इन्द्रियों के किसी सुख की इच्छा है। वे तो उन्मत्त की नाईं बैठे रहते हैं और जब हम कोई सुखदाई पदार्थ फलादिक ले जाते हैं तब क्रोध करते हैं। हम नहीं जानते कि क्या चिन्ता उनको हुई है जो एक कोठरी में पद्मासन लगाये हाथ पर मुख धरे बैठे रहते हैं। जो कोई बड़ा मन्त्री आकर पूछता है तो उससे कहते हैं कि "तुम जिसको सम्पदा मानते हो वह आपदा है और जिसको आपदा जानते हो वह आपदा नहीं है। संसार के नाना प्रकार के पदार्थ जो रमणीय जानते हो वे सब झूठे हैं पर इसी में सब दूबे हैं। ये सब मृगतृष्णा के जलवत् हैं; इनको सत्य जान मूर्ख हिरण दौड़ते और दुःख पाते हैं"। हे राजन् ! वे कदा-चित् बोलते हैं तो ऐसे बोलते हैं और कुछ उनको सुखदायी नहीं भासता। जो हम हँसी की वार्ता करते हैं तो वे हँसते भी नहीं। जिस पदार्थ को प्रीतिसंयुक्त लेते थे उस पदार्थ को अब डाल देते हैं और दिन पर दिन दुर्बल होते जाते हैं। जैसे मेघ की बून्द से पर्वत चलायमान नहीं होते वैसे ही वे भी चलायमान नहीं होते; और जो बोलते हैं तो ऐसे कहते हैं कि न राज्य सत्य है, न भोग सत्य है, न यह जगत सत्य है, न भ्राता सत्य है और न मित्र सत्य है। मिथ्या पदार्थों के निमित्त मूर्ख यत्न करते हैं। जिनको सब सत्य और सुखदायक जानते हैं वे बन्धन के कारण हैं। जो कोई राजा अथवा पण्डित इनके पास जाता है तो उनको
२२ योगवासिष्ठ ।
देखकर कहते हैं कि ये "पशु हैं-आशारूपी फांसी में बंधे हुए हैं" । हे राजन् ! जो कुछ योग्य पदार्थ हैं उनको देखकर उनका चित्त प्रसन्न नहीं होता बल्कि देखकर क्रोधवान् होते हैं । जैसे पपीहा मारवाड़ में जावे तो मेघों की बूंदों को नहीं देखता और खेदवान् होता है वैसे ही रामजी विषयों से खेदवान् होते हैं । इससे हम जानते हैं कि उनको परमपद पाने की इच्छा है परन्तु कदाचित् उनके मुख से यह नहीं सुना । त्याग का भी अभिमान उन्हें कदाचित् नहीं है क्योंकि कभी गाते हैं और बोलते हैं तो कहते हैं, "हाय में अनाथ मारा गया ! अरे मूर्खों ! तुम संसार समुद्र में क्यों डूबते हो ? यह संसार अनर्थ का कारण है । इसमें सुख कदापि नहीं है इससे छूटने का उपाय करो"। वह किसी के साथ बोलते नहीं और न हँसते हैं; किसी अति चिन्ता में डूबे हैं । वह किसी पदार्थ से आश्चर्यवान् भी नहीं होते । जो कोई कहे कि आकाश में बाग लगा है और उसमें फूल फूले हैं । उनको मैं ले आया; तो उसको सुनकर भी आश्चर्यवान् नहीं होते, सब भ्रममात्र समझते हैं । उनको न किसी पदार्थ से हर्ष होता है, न किसी से शोक होता है; किसी बड़ी चिन्ता में मग्न हैं पर उस चिन्ता के निवारण करने की किसी में सामर्थ्य नहीं देखते । हे राजन् ! हमको यह चिन्ता लग रही है कि रामजी को खाने पहिरने, बोलने और देखने की इच्छा नहीं रही । और न किसी कर्म की उनको इच्छा है ऐसा न हो कि कहीं मृतक हो जायें । जो कोई कहता है कि तुम चक्रवर्ती राजा हो तुम्हारी बड़ी आयु हो, और बड़ा सुख पावो तो उसके वचन सुनकर कठोर बोलते हैं । हे राजन् ! केवल रामजी की ही ऐसी चिन्ता नहीं वरन् लक्ष्मण और शत्रुघ्न को भी ऐसे ही चिन्ता लग रही है । जो कोई उनकी चिन्ता दूर करनेवाला हो तो करे नहीं तो बड़ी चिन्ता में डूबे रहेंगे । राजन् ! अब क्या कहते हो ? तुम्हारे पुत्र सबसे विरक्त हो एक वस्त्र ओढ़े बैठे हैं । इससे अब तुम वही उपाय करो जिससे उनकी चिन्ता निवृत्त हो । इतना सुन विश्वामित्रजी बोले हे साधो ! यदि रामजी ऐसे हैं तो हमारे पास लावो, हम उनका दुःख निवृत्त करेंगे । हे राजन्, दशरथ ! तुम धन्य हो; जिसका पुत्र विवेक और वैराग्य को प्राप्त
वैराग्य प्रकरण । २३
हुआ है। हम तुम्हारे पुत्र को परम पद प्राप्त करावेंगे और अभी उनके सब दुःख मिट जावेंगे। हम और वशिष्ठादि एक युक्ति से उपदेश करेंगे उससे उनको आत्मपद की प्राप्ति होगी। तब वह दशा तुम्हारे पुत्र की होगी कि वह लोष्ट, पत्थर और सुवर्ण को समान जानेंगे। जो क्षत्रियों का प्राकृतिक आचार है सो वह करेंगे और हृदय में उदासीन रहेंगे इससे तुम्हारा कुल कृतार्थ होगा। तुम रामजी को शीघ्र बुलाओ। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! ऐसे मुनीन्द्र के वचन सुनकर राजा दशरथ ने मन्त्री और नौकरों से कहा कि राम, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को साथ ले आवो। जब मन्त्री और भृत्यों ने रामजी के पास जाकर कहा तो रामजी आये और राजा दशरथ, वशिष्ठजी और विश्वामित्र को देखा कि तीनों पर चमर हो रहे हैं और बड़े बड़े मण्डलेश्वर बैठे हैं। सबने रामजी को देखा कि उनका शरीर कृश हो रहा है। जैसे महादेवजी स्वामिकार्त्तिक को आते देखें वैसे ही राजा दशरथ ने रामजी को आते देखा। रामजी ने वहाँ आकर राजा दशरथजी के चरण पर मस्तक लगा प्रणाम किया और वैसे ही वशिष्ठजी, विश्वामित्र और सभा में जो बड़े बड़े ब्राह्मण बैठे थे उनको भी प्रणाम किया। जो बड़े बड़े मण्डलेश्वर बैठे थे उन्होंने उठकर रामजी को प्रणाम किया। राजा दशरथ रामजी को गोद में बैठाकर मस्तक चूमा और बहुत प्रेम में पुलकित हो रामजी से कहा हे पुत्र ! केवल विरक्तता से परमपद की प्राप्ति नहीं होती। गुरु वशिष्ठजी के उपदेश की युक्ति से परमपद की प्राप्ति होगी। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तुम धन्य हो और बड़े शूर हो कि विषयरूपी शत्रु तुमने जीते हैं। विश्वामित्र बोले, हे कमलनयन राम ! अपने अन्तःकरण की चपलता को त्यागकर जो कुछ तुम्हारा आशय हो प्रकट कर कहो कि तुमको मोह कैसे हुआ, किस कारण हुआ और कितना है ? एवं अब जो कुछ तुमको वाञ्छित हो सो भी कहो। हम तुमको उमी पद में प्राप्त करेंगे जिसमें कदाचित् दुःख न हो। जैसे आकाश को चूहा नहीं काट सकता वैसे ही तुमको कदाचित् पीड़ा न होगी। हे रामजी ! हम तुम्हारे सम्पूर्ण दुःख नाश कर देंगे। तुम संशय मत करो जो कुछ तुम्हारा वृत्तान्त
२४ | योगवाशिष्ठ ।
हो सो हमसे कहो। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है तैसे ही विश्वामित्र के वचन सुनकर रामजी प्रसन्न हुए और अपने हृदय में निश्चय किया कि अब मुझको अभीष्ट पद की प्राप्ति होगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे गमममाजवर्णनोनाम षष्ठस्सर्गः ॥ ६ ॥
श्रीरामजी बोले, हे भगवन् ! जो वृत्तान्त है सो तुम्हारे सम्मुख क्रम में कहता हूँ। मैं राजा दशरथ के घर में उत्पन्न होकर क्रम से बड़ा हुआ और आगे वेद पढ़कर ब्रह्मचर्यादिक व्रत धारण किये; तदनन्तर घर में आया तो मेरे हृदय में विचार हुआ कि तीर्थाटन करूं और देवद्वारों में जाकर देवों के दर्शन करूं। निदान में पिता की आज्ञा लेकर तीर्थों में गया और गङ्गा आदि सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान और शालग्राम और केदार आदि ठाकुरों के विधिसंयुक्त दर्शन करके यहाँ आया। फिर उत्साह हुआ तब यह विचार आया कि प्रातःकाल उठकर स्नान सन्ध्यादिक कर्म करके भोजन करना। जब इस प्रकार से कुछ दिन व्यतीत हुए तब मेरे हृदय में एक विचार उत्पन्न हुआ जो मेरे हृदय को खेंच ले गया। जैसे नदी के तट पर तृण बेल होती है उसको नदी का प्रवाह खेंच ले जाता है तैसे ही मेरे हृदय में जो कुछ जगत की आस्थाव्यापी बेल थी उसको विचाररूपी प्रवाह खेंच लेगया। तब मैंने जाना कि राज्य करने में क्या है, भोग में क्या है और जगत क्या है—सब भ्रममात्र है—इसकी वासना मूढ़ गँवार है; यह स्थावर, जङ्गम जगत सब मिथ्या है। हे मुनीश्वर ! जितने कुछ पदार्थ हैं वह सब मन में उत्पन्न होते हैं सो मन ही भ्रममात्र है अनहोता मन दुःखदायी हुआ है। मन जो पदार्थों को सत्य जानकर दौड़ता है और सुखदायक जानता है सो मृगतृष्णा के जलवत् है। जैसे मृगतृष्णा के जल को देखकर मृग दौड़ते हैं और दौड़ते दौड़ते थक कर गिर पड़ते हैं तो भी उनको जल प्राप्त नहीं होता तैसे ही मूर्ख जीव पदार्थों को सुखदायी जानकर भोगने का यत्न करते हैं और शान्ति नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों के भोग सर्पवत् हैं जिनका भोगे हुआ जन्म मरण और जन्म से जन्मान्तर पाना है। भोग और जगत सब भ्रममात्र
वैराग्य प्रकरण । २५
हैं उनमें जो आस्था करते हैं वह महामूर्ख है मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि सब आगमापायी हैं अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं। इसमें जिस पदार्थ का नाश न हो वही पदार्थ पाने योग्य है इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है। हे मुनीश्वर ! जितने सम्पदारूप पदार्थ भासते हैं वह सब आपदा हैं; इनमें रञ्चक भी सुख नहीं। जब इनका वियोग होता है तब कण्टक की नाईं मन में चुभते हैं। जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं तब जीव राग द्वेष में जलता है और जब नहीं प्राप्त होते तब तृष्णा में जलता है-इससे भोग दुःखरूप ही हैं। जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता वैसे ही भोगरूपी दुःख की शिला में सुखरूप छिद्र नहीं होता। हे मुनीश्वर ! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ। जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो तो धुवाँ हो थोड़ा थोड़ा जलता रहता है। वैसे ही भोगरूपी अग्नि से मन जलता रहता है। विषयों में कुछ भी सुख नहीं है दुःख बहुत हैं, इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है। जैसे खाड के ऊपर तृण और पात होते हैं और उससे खाई आच्छा- दित हो जाती है उसको देख हरिण कूदकर दुःख पाता है वैसे ही मूर्ख भोग को सुखरूप जानकर भोगने की इच्छा करता है और जब भोगता है तब जन्म से जन्मान्तररूपी खाईं में जा पड़ता है और दुःख पाता है। हे मुनीश्वर ! भोगरूपी चोर अज्ञानरूपी रात्रि में आत्मारूपी धन लूट ले जाता है, पर उसके वियोग से जीव महादीन रहता है। जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है वह दुःखरूप है। उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है वह शरीर क्षणभंगुर और असार है। जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है वह मूर्ख और जड़ है। उसका बोलना और चलना भी ऐसा है जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है और उसके वेग से शब्द होता है। जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता वैसे ही दुःख जानकर में भोग की इच्छा नहीं करता। लक्ष्मी भी परम अनर्थ- कारी है जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती तब तक उसके पाने का यत्न होता है और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है जब लक्ष्मी प्राप्ति हुई तब तब