योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 613, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ६२१
कौन हो और यह लोक क्या है ? इन प्रश्नों का उत्तर कृपा करके कहिये । शुक्र बोले, हे दैत्यराज ! बहुत कहने में क्या है, मैं आकाश में जाना चाहता हूँ उसमें सबका सार संक्षेप से में तुमसे कहता हूँ सो सुनो । जो चेतन तत्त्व विस्तृतरूप है वही चिन्मात्र है और चेतन ही व्यापक है । तू भी चेतनस्वरूप है, मैं भी चेतन हूँ और यह लोक भी चेतनरूप है । यही सबका सार है । इस निश्चय को हृदय में दृढ़कर धारोगे तब निर्मल निश्चयात्मकबुद्धि में अपने को आपसे देखोगे और उसमें विश्रान्तिमान् होगे । हे राजन् ! यदि तुम कल्याणमूर्ति हो तो इतने कहने में सब सिद्धान्त को प्राप्त होगे और सबका सार जो चिदात्मा है उसको पाओगे और यदि कल्याणमूर्ति नहीं हो तो फिर कहना भी निरर्थक होता है । चेतन को जो चेत्यकला का सम्बन्ध है वही बन्धन है । इससे जो मुक्त है वही मुक्त है । आत्मतत्त्व चेतन रूप चेत्यकल्पना से रहित है । यह सब सिद्धान्तों का संग्रह है । हे राजन् ! इस निश्चय को धारो और निर्मलबुद्धि से अपने आपसे आपको देखो, यही आत्म-पद की प्राप्ति है । सप्तऋषियों से देवताओं का कोई कार्य है उस निमित्त में अब आकाश जाता हूँ । जब तक यह देह है तब तक मुक्तबुद्धि को यथाप्राप्त कार्य त्यागने योग्य नहीं । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे कहकर शुक्र बड़े वेग से आकाश में चले और जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर लीन हो जावे तैसे ही शुक्रजी अन्तर्धान हो गये ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपदेशो नाम षट्त्रिंशत्सर्गः ॥ ३६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! देवता और दैत्यों के पूजने योग्य शुक्र के गये से बलवानों में श्रेष्ठ मन में विचारने लगा कि भगवान् शुक्रजी यह क्या कह गये कि त्रिलोकी चिन्मात्ररूप है, मैं भी चेतन हूँ, दिशा भी चेतनरूप है, परमार्थ में आदि जो सत्यस्वरूप है वह भी चेतन है उसमें भिन्न नहीं, यह जो सूर्य है उसमें चेतन होने से ही सूर्यत्वभाव भासता है और यह जो भूमि है उसको चेतन न चेते तो इसमें भूमित्व भाव नहीं । वह जो दशों दिशा हैं यदि इनको चेतन न चेते तो दिशा में दिशान्वभाव न रहे, पर्वत में पर्वतता भी चेतन बिना नहीं ।