योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उपशम प्रकरण । ६२१
कौन हो और यह लोक क्या है ? इन प्रश्नों का उत्तर कृपा करके कहिये । शुक्र बोले, हे दैत्यराज ! बहुत कहने में क्या है, मैं आकाश में जाना चाहता हूँ उसमें सबका सार संक्षेप से में तुमसे कहता हूँ सो सुनो । जो चेतन तत्त्व विस्तृतरूप है वही चिन्मात्र है और चेतन ही व्यापक है । तू भी चेतनस्वरूप है, मैं भी चेतन हूँ और यह लोक भी चेतनरूप है । यही सबका सार है । इस निश्चय को हृदय में दृढ़कर धारोगे तब निर्मल निश्चयात्मकबुद्धि में अपने को आपसे देखोगे और उसमें विश्रान्तिमान् होगे । हे राजन् ! यदि तुम कल्याणमूर्ति हो तो इतने कहने में सब सिद्धान्त को प्राप्त होगे और सबका सार जो चिदात्मा है उसको पाओगे और यदि कल्याणमूर्ति नहीं हो तो फिर कहना भी निरर्थक होता है । चेतन को जो चेत्यकला का सम्बन्ध है वही बन्धन है । इससे जो मुक्त है वही मुक्त है । आत्मतत्त्व चेतन रूप चेत्यकल्पना से रहित है । यह सब सिद्धान्तों का संग्रह है । हे राजन् ! इस निश्चय को धारो और निर्मलबुद्धि से अपने आपसे आपको देखो, यही आत्म-पद की प्राप्ति है । सप्तऋषियों से देवताओं का कोई कार्य है उस निमित्त में अब आकाश जाता हूँ । जब तक यह देह है तब तक मुक्तबुद्धि को यथाप्राप्त कार्य त्यागने योग्य नहीं । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे कहकर शुक्र बड़े वेग से आकाश में चले और जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर लीन हो जावे तैसे ही शुक्रजी अन्तर्धान हो गये ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपदेशो नाम षट्त्रिंशत्सर्गः ॥ ३६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! देवता और दैत्यों के पूजने योग्य शुक्र के गये से बलवानों में श्रेष्ठ मन में विचारने लगा कि भगवान् शुक्रजी यह क्या कह गये कि त्रिलोकी चिन्मात्ररूप है, मैं भी चेतन हूँ, दिशा भी चेतनरूप है, परमार्थ में आदि जो सत्यस्वरूप है वह भी चेतन है उसमें भिन्न नहीं, यह जो सूर्य है उसमें चेतन होने से ही सूर्यत्वभाव भासता है और यह जो भूमि है उसको चेतन न चेते तो इसमें भूमित्व भाव नहीं । वह जो दशों दिशा हैं यदि इनको चेतन न चेते तो दिशा में दिशान्वभाव न रहे, पर्वत में पर्वतता भी चेतन बिना नहीं ।
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इस जगत् में जगत्भाव आकाश में आकाशता, शरीर में लक्षण भी चेतन बिना न पाइयेगा, इन्द्रियाँ भी चेतन हैं, मन भी चेतन है, भीतर बाहर सब चेतन है और चिदात्मा ही अहं त्वं भावरूप होकर स्थित है। चेतन में हूँ, सब इन्द्रियों संयुक्त विषयों का स्पर्श में करता हूँ और कदा- चित् कुछ नहीं किया। काष्ठ लोष्टतुल्य शरीर में मेरा क्या है? में तो सम्पूर्ण जगत् में आत्मा चेतन हूँ, आकाश में भी एक में आत्मा हूँ। सूर्य और भूत, पिञ्जर, देवता, दैत्य और स्थावरजङ्गम सबका चेतन आत्मा एक अद्वैत चेतन है और द्वैतकल्पना नहीं। सब, यदि इस लोक में द्वैत का असम्भव है तो शत्रु कौन है और मित्र किसको कहिये? जिस शरीर का नाम बलि है उसका शिर काटा तो आत्मा का क्या काटा? सब लोगों में आत्मा पूर्ण है पर जब चित्त दुःख चेतता है तब दुखी होता है चेतने बिना दुःख नहीं पाता। इस कारण जो दुःख- दायक भाव-अभाव पदार्थ भासते हैं वे सर्व आत्मरूप हैं चेतन तत्त्व से भिन्न कुछ नहीं। सब ओर से आत्मा पूर्ण है, आत्मा से भिन्न जगत् का कुछ व्यवहार नहीं। न कोई दुःख है, न कोई रोग है, न मन है, न मन की वृत्ति है, एक शुद्ध चेतनमात्र आत्मतत्त्व है और विकल्प कल्पना कोई नहीं। सब ओर से चेतन स्वरूप, व्यापक, नित्य, आनन्द, अद्वैत सबसे अतीत और अंशाशाभाव से रहित चेतनसत्ता व्यापक है। चेतन आदिक नाम से भी में रहित हूँ, वे चेतन आदिक नाम भी व्यवहार के निमित्त कल्पे हैं। चेतन जो आत्मा की स्फुरणशक्ति है वही विस्तार में जगद्रूप होकर भासती है, द्रष्टा, दर्शन मुक्त केवल अद्वैत- रूप है और प्रकाश प्रकाशभाव से रहित निगभास द्रष्ट परमेश्वर रूप हूँ। न में कर्त्ता हूँ और न भोक्ता हूँ, में केवल द्रष्टा निगमयरूप कल्पना कलङ्क से रहित हूँ। इनसे परे हूँ और यह स्वरूप भी में हूँ। यह मेरे में आभासमात्र है और में उदित नित्य और आभास में भी रहित एक प्रकाशरूप हूँ। स्वरूप होने से मेरा चित्त दृश्य के राग से रहित मुक्तरूप है। प्रत्यक्ष चेतन जो मेरा स्वरूप है उसको नमस्कार है। चित्त दृश्य से रहित हूँ और युक्ति अयुक्ति सबका प्रकाशस्वरूप में हूँ, मुझको नम-
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स्कार है। मैं चित्त से रहित चेतन हूँ, सब ओर से शान्तरूप हूँ, फुरने से रहित हूँ और आकाश की नाईं अनन्त सूक्ष्म से सूक्ष्म, दुःख सुख से मुक्त और संवेदन से रहित असंवेदनरूप हूँ। मैं चेत्य से रहित चेतन हूँ। जगत के भाव अभाव पदार्थ मुझको नहीं छेद सकते। अथवा यह जगत् के पदार्थ छेदते हैं वह भी मुझसे भिन्न नहीं, क्योंकि छेद में हूँ और छेदनेवाला में हूँ। स्वभाव भूत वस्तु से वस्तु ग्रहण होती है अथवा नहीं होती तो भी किसमे किसका नाश हो, सर्वदा, सर्व प्रकार, सर्व शक्तिरूप हूँ, सङ्कल्प विकल्प से अब क्या है। मैं एक ही चेतन अजड़-रूप होकर प्रकाशता हूँ, जो कुछ जगत्जाल है वह सब में ही हूँ, मुझसे भिन्न कुछ नहीं। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार तत्त्व के वेत्ता राजा बलि ने विचारा तब ओंकार की अर्धमात्रा तुरीयापद की भावना मे ध्यान में स्थित हुआ और उसके सङ्कल्प भली प्रकार शांत हो गये। वह सब कल्पना और चित्त चेत्य निःसङ्ग होकर स्थित हुआ और ध्याता जो है अहंकार, ध्यान जो है मन की वृत्ति और ध्येय जिसको ध्याता था तीनों से रहित हुआ और मन से सब वासनाएँ नष्ट हो गईं। जैसे वायु से रहित अचलरूप दीपक प्रकाशता है तैसे ही बलि शान्तरूप पद को प्राप्त हुआ और रत्नों के झरोखे में बैठे दीर्घ काल बीत गया। जैसे स्तम्भ में पुतली हों तैसे ही सर्व एषणा से रहित वह समाधि में स्थित रहा और सब क्षोभ, दुःख, विघ्न से रहित निर्मल चित्त शरत्काल के आकाशवत् हो रहा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे बलिविश्रान्तिवर्णन-नाम सप्तविंशत्सर्गः ॥ २७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार दैत्यराज बहुत काल पर्यन्त समाधि में बैठा रहा तब बान्धव, मित्र, टहलुये, मन्त्री रत्नों के झरोखे में देखने चले कि राजा को क्या हुआ। ऐसा विचारकर उन्होंने किवाड़ों को खोला और ऊपर चढ़े। यक्ष, विद्याधर और नाग एक ओर खड़े रहे और रम्भा और तिलोत्तमादिक अप्सरागण हाथों में चमर ले खड़ी हुईं और नदियाँ, समुद्र, पर्वत आदिक मूर्ति धारकर और सब
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आदिक भेंट लेकर सा प्रणाम के निमित्त खड़े हुए और त्रिलोकी के उद्वर्ती जो कुछ थे वे सब आये, पर राजा बलि ध्यान में ऐसा स्थित था मानो चित्र की मूर्ति लिखी है और पर्वतवत् स्थित है। उसको देखकर सब दैत्यों ने प्रणाम किया, कोई उसे देखकर शोकवान् हुआ। कोई आश्चर्यवान्, कोई आनन्दवान् हुए और कोई भय को प्राप्त हुए। तब मन्त्री विचारने लगे कि राजा की क्या दशा हुई। इसलिए उसने शुक्रजी का ध्यान किया और भार्गवमुनि मनोमय में आये। उनको देख कर दैत्यगणों ने पूजन किया और बड़े सिंहासन पर गुरु को बैठाया। बलि को ध्यानस्थित देखकर शुक्रजी अति प्रसन्न हुए कि जो पद मैंने उप-देश किया था, उसमें इसने विश्राम पाया है इसका भ्रम अब नष्ट हुआ है और क्षीरसमुद्रवत् प्रकाश है। ऐसे देखकर शुक्रजी ने कहा बड़ा आश्चर्य है कि दैत्यराज ने विचार करके निर्मल आत्मप्रकाश पाया है। अब भगवान् सिद्ध हुआ है और अपने स्वरूप में जो सब दुःखों से रहित पद है उसमें यह स्थित हुआ है और चिन्ताश्रम इसका क्षीण हुआ है। अब इसको मत जगाओ। यह आत्मज्ञान को प्राप्त हुआ है और यत्न और क्लेश इसका दूर हो गया है जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार नष्ट हो जाता है। अब मैं इसको नहीं जगाता यह आपही दिव्य वर्षों में जागेगा, क्योंकि प्रारब्ध अंकुर इसके रहता है और उठकर अपना राजकार्य करेगा। अब तुम इसको मत जगाओ, अपने राजकार्य में जा लगो। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार शुक्रजी ने कहा तब सब सुनकर सूखे वृक्ष की मञ्जरी ऐसे हो गये और शुक्रजी अन्तर्धान हो गये। दैत्य भी अपने राजा विरोचन की सभा में जाकर अपने अपने व्यवहार में लगे और खेचर, भूचर और पातालवासी अपने अपने स्थान में गये और देवता, दिशा, पर्वत, समुद्र, नाग, किन्नर, गन्धर्व सब अपने अपने व्यवहार में जा लगे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बलिविज्ञान प्राप्ति र्नामाष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
उपशम प्रकरण । ६२५
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हुए तब दैत्यराज समाधि से उतरे, नौबत नगारे बजने लगे, देवता और दैत्य बड़े जय जय शब्द करने लगे नगरवासी देखकर बड़े प्रसन्न हुए और जैसे सूर्य उदय हुए कमल खिल आते हैं तैसे ही खिल आये । जब तक दैत्य न आये थे तब तक राजा ने विचार कि बड़ा आश्चर्य है कि परमपद जो ऐसा रमणीय, शान्तरूप और शीतल पद है उसमें स्थित होकर मैंने परम विश्राम पाया है । इसमें फिर उमी पद का आश्रय करूँ और उमी में स्थित होऊँ, राज्य विभूति से मेरा क्या प्रयोजन है । ऐसा आनन्द शीतल चन्द्रमा के मण्डल में भी नहीं होता जैसे अनुभव में स्थित होने से पाया जाता है । हे रामजी ! इस प्रकार चिन्तना कर वह फिर समाधि करने लगा कि जिससे गलित मन हो । तब दैत्यों की सेना, मन्त्री, भृत्य, बान्धवों ने आनकर उनको घेर लिया और जैसे चन्द्रमा को मेघ घेर लेता है तैसे ही घेर करके प्रणाम करने लगे । बलिराज ने मन में विचार कि मुझको त्यागने और ग्रहण करने योग्य क्या है, त्याग उसका करना चाहिये जो अनिष्ट और दुःखदायक हो और ग्रहण उसका कीजिये जो आगे न हो पर आत्मा से व्यतिरेक कुछ नहीं उसमें ग्रहण और त्याग किसका करूँ । मोक्ष की इच्छा भी मैं किस कारण करूँ क्योंकि जो बन्ध होता है तो मोक्ष की इच्छा करता है सो जब बन्ध ही नहीं तो मोक्ष की इच्छा कैसे हो ? यह बन्ध और मोक्ष बालकों की क्रीड़ा कही है वास्तव में न बन्ध है न मोक्ष है । यह कल्पना भी मूढ़ता में है सो मूढ़ता तो मेरी नष्ट हुई है अब मुझको ध्यान विलाम से क्या प्रयोजन है और ध्यान से क्या है । अब मुझको न परमतत्त्व की इच्छा है, और न कुछ ध्यान से प्रयोजन है अर्थात न विदेहमुक्त की इच्छा है, न जगत् में स्थित रहने की इच्छा है, न मैं मरता हूँ, न जीता हूँ, न सत्य हूँ, न असत्य हूँ, न सम हूँ, न विषम हूँ, न कोई मेरा है और न कोई और है अद्वैतरूप में एक आत्मा हूँ सो मुझको नमस्कार है इस राजक्रिया में मैं स्थित हूँ तो भी आत्मपद कार्य में स्थित हूँ, और सदा शीतल हूँ । ध्यान दिशा से मुझको सिद्धता नहीं और न राज-
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कार्य विभूति से कुछ सिद्ध होना है । इससे राजकार्य से मेरा कुछ प्रयो- जन नहीं, मैं आकाशवत् ही रहता हूँ । मैं न कुछ इच्छा करूँगा न राज्य करूँगा तो भी मेरा सिद्ध नहीं होता इससे जो कुछ प्रकृत आचार है उसी को मैं करूँ । बन्धन का कारण अज्ञान है सो तो नष्ट हुआ है अब कोई क्रिया मुझको बन्धनरूप नहीं । हे रामजी ! इसी प्रकार निर्णय करके बलि ने दैत्यों की ओर देखा तब देवता और दैत्यों ने शीश से प्रणाम किया और राजा ने दृष्टि करके उनकी प्रणाम वन्दना अङ्गीकार की । तब राजा बलि ने ध्येयवासना को मन से त्याग किया और राज्य के कार्य करने लगा । ब्राह्मण, देवता और गुरु का पूर्ववत् पूजन किया, जो कोई अर्थी और मित्र, बान्धव, टहलुये थे उनका अर्थ पूर्ण किया, स्त्रियों को नाना प्रकार के वस्त्र आभूषण दिये और जो दण्ड देने योग्य थे उनको दण्ड दिया । फिर उसने यज्ञ का आरम्भ करके सुरगणों का पूजन किया और शुक्रजी से आदि ले मुख्य-मुख्य देवता यज्ञ कराने के निमित्त बैठे । फिर विष्णु भगवान् ने इन्द्र के अर्थ सिद्ध करने के निमित्त छल करके बलिराज को वञ्चित कर लिया और बाँधकर पाताल में स्थित किया । वह आगे इन्द्र होगा अब जीवन्मुक्त, स्वस्थवपु, सदा ध्यानस्थित और एषणा से रहित पुरुष पाताल में है । हे रामजी ! जीवन्मुक्त पुरुष राजा बलि सम्पदा और आपदा में समचित्त विचरता है, वह सम्पदा में हर्ष नहीं करता और आपदा में शोक नहीं करता । अनेक जीवों का उपजना और लय होना बलि ने देखा है, दश करोड़ वर्ष पर्यन्त तीनों लोकों का कार्य किया और बड़े विषयभोग भोगे हैं । अन्त में भोगों को विरस जानकर उसका मन विरम हुआ विचार करने से तृष्णा नष्ट हो गई और मन उपशम हुआ । हेयोपादेय की नाना प्रकार चेष्टा बलि ने देखीं पर पदार्थों के भाव अभाव में मन शान्ति को ही प्राप्त हुआ । अब भोगों की अभिलाषा त्याग आत्मारामी हो नित्य स्वरूप में स्थित पाताल में विराजता है । हे रामजी ! इस बलि को फिर इस जगत् का इन्द्र होना और सम्पूर्ण जगत का कार्य करना है वह अनेक वर्ष आज्ञा चलावेगा परन्तु इन्द्रपद को पाकर भी तुष्टवान न होगा और अपने
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ऐश्वर्य पद के गिरने मे खेदवान् भी न होगा और सब पदार्थों और विभू- तियों के उदय और अस्त में अमर होगा। यह बलि की विज्ञान प्राप्ति का क्रम वृत्तान्त कहा है। इसी दृष्टि का आश्रय करके तुम भी स्थित हो और बलि की नाईं अपने विवेक से नित्य तृप्ति आत्मनिश्चय को धारो कि सब में ही हूँ। इस निश्चय से निद्वन्द और परमपद प्राप्त होगा। हे रामजी ! दस करोड़ वर्ष तीनों लोकों का राज्य बलि ने भोगा और अन्त में विरक्त हुआ तैसे ही तुम भी भोगों से विरक्त हो जाओ। ये भोग तुच्छ हैं, इनको त्यागकर परमपद में प्राप्त हो जाओ। यह जो दृश्य प्रपञ्च नाना प्रकार के विकार संयुक्त भासता है वह न कोई तेरा है और न तू किसी का है। जैसे पर्वत और शिला में बड़ा भेद है तैसे ही जिस पुरुष का मन संसार की ओर धावता है वह मन की वृत्ति में डूबता है। जब तुम मन को हृदय में धरोगे तब सब जगत् में तुम प्रकाशवान् होगे। तुम आत्मस्वरूप हो तो अपना क्या और पराया क्या—यह सब मिथ्या कल्पना है। तुम सबके आदि पुरुषोत्तम हो तुम ही साकाररूप पदार्थ और तुमही सब ओर पूर्ण और जगत् में चेतनरूप हो और स्थावर-जङ्गम जगत् सब तुम में पिरोया है—जैसे सूत में माला के दाने पिरोये हैं। तुम नित्य शुद्ध, उदित, बोधस्वरूप और भ्रान्ति से रहित हो। जन्म आदिक सब रोग के नाश निमित्त आत्मविचार करके बलात्कार से भोगों का त्यागकर सबके भोक्ता हो जाओ। तुम केवल स्वरूप जगत् के नाथ हो और चैतन्य सूर्य प्रकाशरूप सर्वदा स्थित हो। सब जगत् तुम्हारे प्रकाश से प्रकाशता है और सुख दुःख की कल्पना तुम्हारे में कोई नहीं। तुम तो शुद्ध, सर्वात्मा और सर्व प्रकाशक हो, इष्ट अनिष्ट को त्याग करके केवल अपने स्वरूप में स्थित हो। इष्ट अनिष्ट के त्याग से निरन्तर सत्यता उदय होती है उस सत्यता को हृदय में धार फिर जन्म मरण भी नहीं आता। जिस जिस पदार्थ में मन लगे उससे निकालकर आत्मतत्त्व में लगाओ ! जब इस प्रकार तुम दृढ़ अभ्यास करोगे तब मन जो उन्मत्त हाथी है वह बाँधा जावेगा और तभी सब सिद्धान्तों के परमसार को प्राप्त होगे। हे रामजी ! तुम मूढ़ों
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की नाईं मत हो। क्योंकि मूढ़जीव सब चेष्टा मिथ्या ही करता है। मिथ्या चेष्टा से जिनकी बुद्धि नष्ट हुई है और अविद्यारूपीधूर्त से बिके हैं उनके तुल्य न होना। यह जगत् अणुमात्र भी कुछ नहीं है। पर बड़ा विस्तार रूपी जो दृष्ट आता है सो निर्णय में देखा है कि मूढ़ता से भासित हुआ है। मूढ़ता परम दुःखरूप है, इससे अधिक दुःख कोई नहीं। आत्मा-रूपी सूर्य के आगे आवरणकर्त्ता जो अज्ञानरूपी मेघ है उसको विवेक-रूपी पवन से नाश करोगे तब आत्मा का साक्षात्कार होगा। आत्म-विचार के अभ्यास और विषयों में वैराग्य बिना आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता। वेदरूप वेदान्तशास्त्र जो दृष्टान्त और तर्कयुक्त हैं उनसे भी अपने विचार बिना साक्षात्कार नहीं होता। आत्मविचार और पुरुषार्थ से आत्मा की प्रसन्नता होती है और बुद्धि की निर्मलता बोध से प्राप्त होती है। इससे संकल्प विकल्प से रहित होकर चैतन्यतत्त्व में स्थित हो जाओ। विस्तृत और व्यापकरूप आत्मतत्त्व की स्थिति मेरे वचनों के ग्रहण करने से सब सङ्कल्प तुम्हारे लीन हो गये हैं संवेदनरूपी भ्रम शान्त हुआ है और संसाररूपी कुहिरा तुम्हारा नष्ट हुआ है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपाख्यानसमाप्तिवर्णन-नामैकोनत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब तुम विज्ञान प्राप्ति के निमित्त और क्रम सुनो जैसे दैत्य असुर प्रह्लाद को आत्मा की सिद्धता हुई तैसे तुम भी हो जाओ। पाताल में एक हिरण्यकशिपु दैत्य महाबलिष्ठ हुआ है जिसने इन्द्र आदि भगाये थे और विष्णुजी के सम उसका पराक्रम था। सम्पूर्ण भुवन उसने वशकर छोड़े थे और सब देवता और दैत्यों को वश करके जगत् का कार्य करता था। वह दैत्यों और तीनों भुवनों का ईश्वर हुआ और समय पाकर कई पुत्र उत्पन्न किये—जैसे वसन्त ऋतु अंकुर उत्पन्न करती है। उसके पुत्रों में बड़ा पुत्र प्रह्लाद सबसे अधिक प्रकाश-वान् हुआ और निज पुत्र से हिरण्यकशिपु ऐसा शोभित हुआ जैसे सब सुन्दर लताओं से वसन्तऋतु शोभता है। जैसे प्रलयकाल में सूर्य सब लोकों को तपाता है तैसे ही वह सबको तपाने लगा। जब दुष्ट कीड़ा
उपशम प्रकरण । ६२६
से देवताओं को दैत्य दुःख देने लगे तब सब देवता मिलकर विष्णु की शरण गये और विनती की कि यह हिरण्यकशिपु महादुष्ट है इसका नाश करो और हमारी रक्षा करो। बारम्बार दुःखवाने से महापुरुष भी क्रोधवान् हो जाते हैं । हे रामजी ! जब इस प्रकार देवताओं ने प्रार्थना की तब विष्णुदेव ने कहा अब तुम जाओ में इसके पुत्र के हेतु से मारूँगा । ऐसे कहकर विष्णु भगवान् अन्तर्धान हो गये और हिरण्यकशिपु अपने ऐश्वर्य की शिक्षा प्रह्लाद को देने लगा परन्तु वह ग्रहण न करे और बहुत प्रकार ताड़ना भी दे तो भी उसकी शिक्षा को प्रह्लाद अङ्गीकार न करे । वह ईश्वर विष्णुजी की आराधना में रहता था इस कारण ताड़ना का दुःख प्रह्लाद को कुछ न हो । तब दैत्य अपने हाथ में खङ्ग लेकर कहने लगा कि हे दुष्ट ! तेरा ईश्वर कहाँ है, जिसका तू आराधन करता है । मेरे सिवा ईश्वर और कौन है ? प्रह्लाद ने कहा मेरा ईश्वर सर्वव्यापक है । तब हिरण्यकशिपु ने कहा इस खम्भे में कहाँ है ? जो है तो दिखा दे और यदि न दिखावेगा तो तुझको मारूँगा । तब सर्वव्या-पक विष्णु खम्भे से भासने लगे और बड़े शब्द होने लगे। फिर उस खम्भे को फोड़कर बड़ी भुजा और तीक्ष्ण नखों से संयुक्त महाभयानक-रूप से विष्णु भगवान् ने नरसिंहरूप प्रकट करके हिरण्यकशिपु को नखों से विदारण किया और ऐसा कोपवान् रूप धरा जिसमें दैत्यों के स्थान जलने लगे और दृष्टि से मानों पर्वत चूर्ण होते थे। दैत्यों के कई समूह मारे गये, कई भागे और बहुत से दिशाविदिशा को दौड़ गये-जैसे वायु के मारे मच्छर उड़ जाते हैं और कुछ पाताल छिद्र में नाश हो गये । निदान प्रलयकालवत् स्थान शून्य हो गये मानों अकाल प्रलय आया है और दैत्यों को नाश करके फिर विष्णुदेव अन्तर्धान हो गये । कुछ दैत्य बान्धव और टहलुये जो रहे थे वे प्रह्लाद के निकट मुख कुम्हि-लाये हुए आये-जैसे जल से रहित कमल होता है और भाई, बान्धव मिलकर प्रह्लाद को समझाने लगे । प्रह्लाद ने सबसे मिलकर पिता का शोच किया और फिर उठकर सब कर्म किये । निदान संशयसंयुक्त सब दैत्य बैठे और विचार करके शोकवान् हुए और मद्य सूखकर चित्र की
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पुतलीवत् हो गये । जैसे दग्धवृक्ष सूखकर रस से रहित हो जाता है तैसे ही हिरण्यकशिपु बिना दैत्य शोकवान् और महादुःखी हुए ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे हिरण्यकशिपुवधोनाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब हिरण्यकशिपु के मारने से दैत्य बहुत दुःखी हुए तब प्रह्लाद ने मौन होकर विचारा कि पाताल में सब दैत्य मिलकर चिन्तासंयुक्त बैठे हैं । उनसे जाकर प्रह्लाद ने कहा कि अब अपनी रक्षा के निमित्त कौन उपाय कीजियेगा, हमारे दैत्यों के नाश करनेवाले विष्णु बड़े बली हैं, जिनके नख तीक्ष्ण खङ्ग की धारवत् हैं जैसे सिंह मृगों को मारता है तैसे वे हमको मारते हैं और पाताल में दैत्य शान्तिमान् कदाचित् नहीं होने पाते । जब दैत्य बढ़ते हैं तब विष्णु आ उन्हें नाश करते हैं और जैसे कमलों पर पर्वत आ पड़े तैसे उन्हें चूर्ण करते हैं । बड़े आकाश गौरव शब्द करनेवाले दैत्य उपज उपजकर नष्ट हो जाते हैं—जैसे जल में तरङ्ग उपजकर नष्ट हो जाते हैं । भीतर बाहर वह हमको बड़ा कष्ट देता है । हमारा शत्रु बड़ा दृढ़ और बड़ा अपूर्वतम् आ बढ़ा है, हमारा हृदय तम से पूर्ण हो गया है और सम्पदा नष्ट हो गई है । जो देवता हमारे पिता से चूर्ण हुए थे उनका बल अब हमसे अधिक हो गया है और वे हमारी स्त्रियों को वश कर ले गये हैं—जैसे मृग को व्याध ले जाता है वे हमारा सब धन भी ले गये हैं और हम दीन हो रहे हैं जैसे जल बिना कमल कुम्हिला जाता है तैसे ही हम भी बान्धव बिना हुए हैं । हमारे घरों में धूल उड़ती है, जो बड़े स्थान मणियों से खचित थे वे शून्य हो गये और हमारे स्थानों में जो बड़े कल्पवृक्ष लगे थे वे उखाड़कर नन्दन वन में लगाये हैं । नरसिंह की सहायता से देवताओं ने ऐसा बल पाया है । हमारे वृक्ष और स्थान नरसिंहजी ने जला दिये हैं जिन देवताओं की स्त्रियों के मुख दैत्य देखते थे, उन सब दैत्यों की स्त्रियों के मुख अब देवता देखते हैं । जिस सुमेरु पर्वत पर कल्प और मन्दारवृक्ष विराजते थे वे स्थान अब शून्य हो गये वहाँ धूल उड़ती है और शोभा से रहित हो गया है । जो दैत्यों की स्त्रियाँ अपने
उपशम प्रकरण । ६३१
स्थानों में बैठी थीं वे अब देवाङ्गनाओं के शिर पर चमर करती हैं और वे हास विलास करती हैं. यह बड़ा कष्ट है । हमको आपदा ने दीन किया है । हे दैत्यों ! हमको और उपाय कोई दृष्टि नहीं आता जब उस ही विष्णु की शरण में जावें तब सुखी होंगे वह कैसा पुरुष है, जिसके दो भुजारूपी वृक्षों की छाया में देवता विश्राम करते हैं और जैसे हिमालय पर्वत कदाचित् तपायमान नहीं होता तैसे ही जो पुरुष विष्णु की शरण जाता है वह तपायमान नहीं होता । तुम देखते हो कि जो देवाङ्गना असुरों की स्त्रियों का पूजन करती थीं वे अब अपने को पुजाने लगीं हैं और हम दैत्यों की स्त्रियों के मुख कुम्हिला गये हैं । जैसे बर्फ की वर्षा से कमल सूख जाता है तैसे ही हमारे मण्डप टूट गये हैं और नीलमणि के खम्भे गिर पड़े हैं । दैत्य सेना जो आपदा के समुद्र में डूबती थी उसके रक्षा करने को हमारे पितादि बड़े समर्थ थे और डूबने न देते थे । जैसे क्षीरसमुद्र में मन्दराचल को कच्छपरूप ने डूबने न दिया था हमारे पितादि जो बड़े बड़े बली रक्षा करनेवाले थे उनको विष्णुजी ने मारके चूर्ण किया-प्रलयकाल का पवन पर्वतों को चूर्ण करता है । ऐसे मधुसूदन की गति अति विषम है वे दैत्यों की भुजारूपी दण्ड के काटनेवाले कुठार हैं, उनकी सहायता से इन्द्रादिक देवता दैत्य सेना को जीतने और मारने लगे हैं-जैसे बालक को, वानर मारें । इस पुण्डरीकाक्ष विष्णु को जीतना कठिन है । जो वे शस्त्रों बिना हों तो भी हमारे शस्त्र इनको छेद नहीं सकते और वज्र भी छेद नहीं सकता । वे महापराक्रमी हैं उन्होंने युद्ध का बड़ा अभ्यास किया है और पर्वतों के साथ युद्ध करते रहे हैं । हमारा पिता जो बड़ा बली था और जिसने त्रिलोकी के राजा और सब देवता वश किये थे उसको भी इसने मार डाला तो हमारा मारना कौन कठिन है । यह महाबली है इसको हम नहीं जीत सकते, इसलिये एक उपाय में तुमसे कहता हूँ उससे विष्णु वश होंगे । उपाय यह है कि विष्णु जो सर्वात्मा, सबका प्रकाश और सबका कारण है उसकी हम शरण हों, और हमारी कोई गति आश्रय नहीं । हे दैत्यों ! उसमे अधिक इस त्रिलोकी में कोई नहीं, जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और
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प्रत्ययकर्ता वही देवता है। उसके ध्यान में लगो और एक निमेष भी उसके ध्यान से न उतरो। मैं भी उसके ध्यान में लगता हूँ। वह नारायण अजन्मा पुरुष है और में सदा उसके परायण हूँ और सब प्रकार नारायण में हूँ। 'ओंनमोनारायणाय' यह मन्त्र सब अर्थों को सिद्ध करता है इस मंत्र के ध्यान जाप करते हुए हमारे हृदय में स्फुरणरूप होगा। वह हरि सबका आत्मा है, पृथ्वी हरि है, यह सब जगत् भी हरि है, में भी हरि हूँ, आकाश भी हरि है और सबका आत्मा भी हरि है। अविष्णु होकर जो विष्णु का पूजन करते हैं वे पूजने का फल नहीं पाते और जो विष्णु होकर विष्णु का पूजन करते हैं वे परम उत्तम फल पाते हैं। इससे में विष्णुरूप होकर स्थित होता हूँ। में अनन्त आत्मा आकाश गरुड़ पर आरूढ़ हूँ और सुवर्ण के भूषण पहिरे हूँ मेरे हाथरूप वृक्ष पर जीवरूप सब पक्षी विश्राम पाते हैं। यह मेरी चतुर्भुजा है। जब मैंने क्षीरसमुद्र मथन किया था तब यह परस्पर घिसे हैं और यह मेरे पार्षद हैं, सुन्दर चमर जिनके हाथों में हैं इनको मैंने क्षीरसमुद्र में उपजाया है। त्रिलोकीरूप वृक्ष की यह सुन्दर मञ्जरी जो महाधवल मन के हरनेवाली है। यह मेरे पार्षदों में माया है, जिसने अनन्त जगत्जाल निरन्तर उत्पत्ति, प्रलय किया है और इन्द्रजाल की विलासिनी है। यह मेरे पार्षदों में जो शक्ति है इन्होंने लीला करके त्रिलोकीखण्ड वश किया है। जैसे कल्पवृक्ष लता फूलती है तैसे ही मेरे पार्षदों में यह फूलती है शीत उष्ण मेरे दो नेत्र हैं जो सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशते हैं और चन्द्रमा और सूर्य उनके नाम हैं। यह मेरा नीलकमल और महासुन्दर श्याम मेघवत देह महाप्रकाशरूप है। यह मेरे हाथ में पाञ्चजन्य शंख जिसकी स्फुरण-रूप ध्वनि है क्षीरसमुद्र में निकला है। यह नाभिकमल है जिसमें ब्रह्मा उत्पन्न हुए और इसमें निवास करते हैं-जैसे भ्रमर कमल में निवास करता है। यह मेरे हाथ में कौमोदकी गदा है जो सुमेरु के शिखरवत रत्नों की बनी हुई है और दैत्यदानवों के नाश करनेवाली है। यह मेरे हाथों में महाप्रकाशरूप सुदर्शनचक्र है। जिसका तेज ज्वाला के पुञ्जवत है और साधु को सुख देनेवाला है। यह मेरे हाथों में अग्नि के समूह
उपशम प्रकरण । ६३३
वाला कुठार है सो दैत्यरूपी वृक्षों को काटनेवाला है और साधुओं को आनन्ददायक है । यह मेरे हाथ में शार्ङ्गधनुष है, इसकी महाप्रकाशवत् ध्वनि है । यह मेरे पीतवर्ण वस्त्र हैं यह वैजयन्तीमाला है और कौस्तुभमणि मेरे कण्ठ में है । ऐसा मैं विष्णुदेव हूँ । अनन्त जगत् जो उत्पत्ति और लय हो गये हैं सबों का धारनेवाला हूँ । यह पृथ्वी मेरे चरण हैं, आकाश मेरा शीश है तीनों लोक मेरा वपु है, दशोदिशा मेरे वक्षःस्थल हैं और मैं साक्षात् विष्णु हूँ । नीलमेघवत् मेरी कान्ति है, गरुड़ पर आरूढ़, शंख, चक्र, गदा, पद्म का धारनेवाला हूँ । जिसका चित्त दुष्ट है वह हमको देखकर भाग जाता है । यह सुन्दर, शीतल चन्द्रमावत् मेरी कान्ति है और पीतवस्त्र श्यामवदन गदाधारी हूँ । लक्ष्मी मेरे वक्षस्थल में है और अच्युतरूपी विष्णु में हूँ । वह कौन है जो मेरे साथ विरोध कर सके ? मैं त्रिलोकी जला सकता हूँ, जो मेरे साथ युद्ध करने को सम्मुख आवे उसको मैं नाश का कारण हूँ । जैसे अग्नि में पतङ्ग जल मरते हैं तैसे ही मेरा तेज है । मेरी दृष्टि कोई सह नहीं सकता । मैं विष्णु ईश्वर हूँ, ब्रह्मा, इन्द्र और यमादिक नित्य मेरी स्तुति करते हैं और तृणकाष्ठ स्थावर जङ्गम जो कुछ जाल है सबके भीतर व्यापकरूप हूँ । त्रिलोकी में मैं प्रकाशरूप अजन्मा और भयनाशकर्त्ता हूँ । ऐसा मेरे स्वरूप को मेरा नमस्कार है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्णादविज्ञानन्नाम एकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार प्रह्णाद ने अपना नारायण-स्वरूप करके ध्यान किया । फिर पूजन के निमित्त विष्णु का चिन्तन किया और मन में विष्णुजी की दूसरी मूर्ति जो गरुड़ पर आरूढ़ और चार शक्ति—अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से सम्पन्न चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये श्याम रङ्ग है, चन्द्रमा और सूर्य की नाईं सुन्दर नेत्र हैं और हाथ में शार्ङ्गधनुष है, धारण करके परिवारसंयुक्त भली प्रकार धूप दीप और नाना प्रकार के विचित्र वस्त्र और भूषणों सहित पूजन किया और अर्घ दिया । चन्दन का लेपन, धूप, दीप, नाना प्रकार के भूषणों सहित पिस्ता, खजूर, बादाम आदिक मेवों से भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, और
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लेह्य चार प्रकार के भोजन कराये । फिर अपना आप विष्णु को अर्पण किया और परम भक्ति को प्राप्त हुआ । जिस प्रकार मन से पूजन किया उसी प्रकार अन्तःपुर में विष्णु की मूर्ति देखकर पूजा । इसी प्रकार दिन प्रति दिन विष्णु का पूजन किया और जिस प्रकार प्रह्लाद मन की चिन्तन से पूजा करे उसी प्रकार और दैत्य भी मानसी पूजा करें । उनको प्रह्लाद ने सिखाया और उस पुर में सब दैत्य कल्याण मूर्ति विष्णुभक्त हो गये । जैसा राजा होता है तैसी ही उसकी प्रजा होती है । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं । यह वार्ता देवलोक में प्रकट हुई कि दैत्यों ने विष्णु का द्वेष त्याग किया है और भक्त हुए हैं तब देवता आश्चर्य को प्राप्त हुए और इन्द्रादिक अमर गण विचारने लगे कि यह क्या हुआ जो दैत्यों ने विष्णु की भक्ति ग्रहण की और उनको यह प्राप्त कैसे हुई । ऐसे आश्चर्यवान होकर क्षीरसमुद्र में दैत्यों की वार्ता करने के निमित्त वे विष्णु के निकट गये और कहा, हे भगवन् ! यह आपने क्या माया फैलाई कि जो दैत्य सर्वदा विरोध करते थे वे अब तुम्हारे साथ तन्मयरूप हो रहे हैं, कहाँ वह दुर्वृत्ति पर्वत को चूर्ण करनेवाले दैत्य और कहाँ तुम्हारी भक्ति, जो अनेक जन्मों में भी दुर्लभ है । हे जनार्दन ! तुम्हारी भक्ति कहाँ और उनकी वृत्ति कहाँ । यह तो अपूर्व वार्ता हुई है । जैसे समय बिना पुष्पों की माला नहीं शोभती तैसे ही पात्र बिना तुम्हारी भक्ति नहीं शोभती और यह हमको सुखदायक नहीं भासता । जैसा जैसा कोई होता है तैसे ही तैसे स्थान में शोभता है । जैसे काँच में महामणि नहीं शोभती तैसे ही दैत्यों में तुम्हारी भक्ति नहीं शोभती । जैसा गुण किसी में होता है तैसी ही पंक्ति में वह शोभता है और में स्थित हुआ नहीं शोभता है । जो सुदेश नहीं होता सो दुःखदायक होता है । जैसे अङ्गों में वज्र दुःखदायक होता है । जैसा गुणवान हो तैसा पदार्थ जब प्राप्त होता है सो इह शोभा पाता है विपर्यय हो तब शोभा नहीं पाता । जैसे कमलिनी जल में शोभती है मरुस्थल में नहीं शोभती तैसे ही कहाँ वह अधर्म नीचजन भयानक कर्म करनेवाले और कहाँ तुम्हारी आश्चर्य भक्ति । जैसे कमलिनी पृथ्वी पर नहीं शोभती तैसे ही तुम्हारी भक्ति दैत्यों में नहीं
उपशम प्रकरण । ६३५
शोभती और तैसे ही भक्ति हमको उनमें सुखदायक नहीं भासती ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपाख्याने विविध- व्यतिरेको नाम द्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार बड़े शब्द से देवता कहने लगे तब माधव आकर बोले, हे देवगण ! तुम शोक मत करो । प्रह्लाद मेरा भक्त है, इसका यह अन्त का जन्म है, और अब मोक्ष को प्राप्त होकर फिर जन्म न पावेगा । हे देवगण ! गुणवान् के गुणों को त्यागकर द्वेष ग्रहण करना अनर्थरूप होता है और जो प्रथम गुणों से रहित निर्गुण हो और उनको त्यागकर गुण ग्रहण करे और शास्त्र मार्ग में विचरे तो यह सुखदायक होता है । प्रह्लाद की विचित्र चेष्टा तुमको सुखदायक होगी । अब तुम अपने स्थानों में जाओ, प्रह्लाद मेरा भक्त है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर भगवान् क्षीरसमुद्र में अन्तर्धान हो गये देवता नमस्कार करके अपने अपने स्थानों में गये और प्रह्लाद से द्वेष भावना त्याग की । प्रह्लाद दिन प्रतिदिन अपने घर में जनार्दन की मनसा वाचा और कर्मणा से भक्ति करने लगा और समय पाकर दैत्यों में बड़ी भक्ति हो गई । तब उन्हें परम विवेक प्राप्त हुआ और विषय भोग से वैराग्यवान् हुए । वे विषयों से प्रीति न करें, सुन्दर स्त्रियों से न रमें, दृश्य में उनकी प्रीति न उपजे और यह भोग जो रोगरूप है उनमें उनका चित्त विश्राम न पावे और राग भी न करें परन्तु मुक्तकर्त्ता जो आत्मबोध है सो उन्हें प्राप्त न हुआ वे मुक्तफल के निकट आ स्थित हुए और भोगों की अभिलाषा त्यागकर निर्मल हो गये पर परम समाधि को न प्राप्त हुए चित्त अवस्था में डोला-यमान हो रहे । तब श्याममूर्ति विष्णुदेव प्रह्लाद की वृत्ति विचारकर पाताल में उसके गृह पूजा के स्थान में महाप्रकाश सुन्दररूप से प्रकटे और उनको देखकर प्रह्लाद ने विशेष पूजा की और प्रेम से गद्गद हो कहा, हे ईश्वर ! त्रिलोकी में सुन्दरमूर्ति, सबके धारनेवाले, सब कलङ्कों के हरनेवाले, प्रकाशस्वरूप, अशरणों के शरण, अजन्म और अच्युत ! मैं तुम्हारी शरण हूँ । हे नीलोत्पल और कमलों के पर्वत, श्यामरूप, अनेक चरित्रों को धरनेवाले ! मैं तुम्हारी शरण हूँ । हे निर्मलरूप कलेवत्
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कोमल अङ्ग और श्वेत कमल की नाईं श्वेत शंख हाथ में धारण किये ! तुम्हारे नाभिकमल में भँवरेरूप ब्रह्मा स्थित हो वेद का उच्चारणरूपी ओऽम् शब्द करते हैं और हृदयकमल में बिराजनेवाले जल के ईश्वररूप ! मैं तुम्हारी शरण हूँ। जिसके श्वेतनख तारागणवत् प्रकाशरूप, हँसता मुख चन्द्रमा के मण्डलवत्, हृदयमणि सबका प्रकाशक और शरत्काल के आकाशवत् निर्मल विस्तृतरूप ! मैं तेरी शरण हूँ । हे त्रिभुवनरूपी कम-लिनियों के प्रकाशनेवाले चन्द्रमा ! मोहरूपी अन्धकार के नाशकर्त्ता, सूर्य, अजड़, चिदात्मा, सम्पूर्ण जगत् के कष्ट हरनेवाले ! मैं तुम्हारी शरण हूँ। हे नूतनविकसितरूप कमलपुष्पों से भूषित अङ्ग और स्वर्णवत् पीताम्बरधारी महासुन्दरस्वरूप ! मैं तेरी शरण हूँ। हे ईश्वर ! लीला करके सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले और परमशक्ति शङ्खवत् दृढ़ देह ! मैं तेरी शरण हूँ। हे दामिनीवत् प्रकाशरूप, सबको संहारकर जल में बालकरूप धर वट के नीचे शयन करनेवाले ! मैं तेरी शरण हूँ। हे देवतारूप कमलों के प्रकाश करनेवाले सूर्यमण्डल, दैत्य पुत्ररूपी कम-लिनियों के तुषाररूपी बर्फ को जलानेवाले और हृदयरूपी कमलों के आश्रयभूत ! मैं तेरी शरण हूँ। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब अनेक गुणों से आठ श्लोक प्रह्लाद ने कहे तब विष्णुजी ने प्रह्लाद से कहा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादाष्टकानन्तरनारायणागमन-नाम त्रयस्त्रिंशतितमस्सर्गः ॥ ३३ ॥
श्रीभगवान्जी बोले, हे गुणनिधि, दैत्यकुल के शिरोमणि ! जो तुमको वाञ्छित फल है सो माँगो और जन्मदुःख के शान्ति निमित्त वर माँगो । प्रह्लाद बोले, हे सर्व मङ्गल के फलदायक और सर्वलोकों में व्यापकरूप ! जो वस्तु दुर्लभतर है वह शीघ्र ही मुझसे कहिये और दीजिये। श्रीभगवान्जी बोले, हे पुत्र ! सब भ्रम के नाश करनेवाले और परम फलरूप ब्रह्म से विश्रान्ति होती है और वह जिस आत्मविवेक की समता से प्राप्त होती है वही आत्मविवेक तुमको होगा । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार दैत्येन्द्र से कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गये । फिर प्रह्लाद ने पुष्पाञ्जली दी और पूजा करके श्रेष्ठ आसन बिछा उन पर आप पद्मासन धरके बैठा और
उपशम प्रकरण । ६३७
विधिसंयुक्त उत्तम शास्त्रों का पाठ करने लगा । जब पाठ करके निश्चिन्त हुआ तब विचारने लगा कि विष्णु ने मुझसे क्या कहा था, उन्होंने कहा था कि तुझको विवेक होगा । इसलिए संसारसमुद्र तरने के निमित्त शीघ्र ही विचार करूँ । इस संसार आडम्बर में में कौन हूँ जो बोलता हूँ, देह और यह जगत् तो में नहीं, यह तो असत्य उपजा है और जड़रूप पवन से स्फुरणरूप होता है सो में कैसे होऊँ ? यह देह भी में नहीं क्योंकि यह तो क्षण-क्षण में काल से लीन होता है और जड़रूप है । श्रवणरूपी नड़ भी में नहीं, क्योंकि जो शब्द सुनते हैं वह शून्य में उपजा है । त्वचा इन्द्रिय भी में नहीं इसका क्षण-क्षण विनाश स्वभाव है । प्राप्त हुआ अथवा न हुआ, यह इष्ट है, यह अनिष्ट है, इन्द्रियाँ आप जड़ हैं पर इनके जानने-वाला चैतन्यतत्त्व है और चैतन्य के प्रमाद से ये विषय उपलब्ध होते हैं । इस-मे न में त्वचा इन्द्रिय हूँ, और न स्पर्श विषय हूँ, यह जड़ात्मक है यह जो चञ्चलरूपी तुच्छ जिह्वा इन्द्रिय है और जिसके अग्र में अल्प जल अणु स्थित है वही रस ग्रहण करता है, वह रस भी आत्मसत्ता करके लब्धरूप होता है आप जड़ है, इससे यह जड़रूप जिह्वा और रस में नहीं ये जो विनाशरूप नेत्र दृश्य के दर्शन में लीन हैं सो में नहीं और न में इनका विषयरूप हूँ, ये जड़ हैं । यह जो नासिका पृथ्वी का अंश है सो केवल आत्मा के आधार है यह आप जड़ है पर इसका जाननेवाला चैतन्य है, सो न में नासिका हूँ, न गन्ध हूँ, में अहं मम से और मन के मनन से रहित शान्तरूप हूँ और ये पञ्च इन्द्रियाँ मेरे में नहीं में शुद्ध चैतन्यरूप कलना कलंक से और चित्त से रहित चिन्मात्र और सबका प्रकाशक सबके भीतर बाहर व्यापक और निःसंकल्प निर्मल शान्तरूप हूँ । आश्चर्य है अब मुझको अपना स्वरूप स्मरण आता है । प्रकाशरूप चैतन्यअनुभव अद्वैत मेरे अनुभव में स्थित है । सूर्य घट, पटादिक मत्र पदार्थ में प्रकाशता हूँ । जैसे दीपक से उत्तम तेज भासे तैसे ही चैतन्य अनुभव से इन्द्रियों की वृत्ति स्फुरणरूप होती है । जैसे तेज में चिनगारे स्फुरणरूप होते हैं तैसे ही सर्वज्ञ अनुभव सत्ता में मन का मननरूप शक्ति फुरती है । जैसे सूर्य के तेज से मरुस्थल में मृगतृष्णा की नदी फुरती है तैसे ही अनुभव सत्ता
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से पदार्थ भासते हैं जैसे दीपक में शुक्लादि रङ्ग भासते हैं तैसे ही इन पदार्थों में अहं आदिक पदार्थ भासने हैं वह जाग्रद्वत् सब पदार्थों का प्रकाशक है, सबको अनुभव से भासता है और सबके भीतर आत्मभाव से स्थित है। जैसे बीज में अंकुर स्थित होता है तैसे ही चैतन्यरूप दीपक के प्रकाश से विकल्परूपी पदार्थों की शक्ति भासता है। उष्णरूपी सूर्य, शीतलरूपी चन्द्रमा, घनरूपी पर्वत, द्रवरूपी जल है और इसी प्रकार अनुभवसत्ता से सकल पदार्थ प्रकट होते हैं जैसे सूर्य के प्रकाश से घटपटादिक होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र ये सबके कारणरूप जगत में स्थित हैं और इनका कारण अनुभव तत्त्व आदि अन्त से रहित और सब कारणों का कारण है। जैसे बरफ से शीतलता उपजती है तैसे ही अनुभव से जगत् उदय होता है। चित्त, चैत्य, दृश्य, दर्शन कल्पना से रहित प्रकाशरूप सत्ता मेरा आत्मा मुझको नमस्कार है। इसी से सर्वभूत उत्पन्न और स्थित होकर फिर लय होते हैं सो निर्विकल्प चैतन्य सबका आश्रयभूत आत्मा है। जो इस चित्त में अन्तःकरण में कल्पता है वही होता है। आत्मा से रहित सत्य भी असत्य हो जाता है। जो चैतन्य संचित में कल्पितरूप होता है सो ही उलटकर अपने स्वरूप को पाता है और जो चित्तसंवित् में कल्पितरूप नहीं होता वह नहीं भासता है। ये जो घट, पटादि पदार्थों के समूह भासते हैं वे विस्तृतरूप चिदाकाश दर्पण में प्रतिबिम्बित हैं और अनुभवसत्ता सब भूतों का आदर्शरूप है। जिनका चित्त नष्ट हो जाता है उन सन्त पुरुषों को दृढभाव प्राप्त है और वे परम आकाशरूप आत्मा में अभ्यास से तन्मय हो जाते हैं अनुभवसत्ता पदार्थों के वृद्ध होने से वृद्ध नहीं होती और नष्ट होने से नष्ट नहीं होती। पदार्थों के भाव अभाव में सत्ता सामान्य ज्यों का त्यों है जैसे सूर्य के प्रतिबिम्ब में घट सत्य हो अथवा असत्य हो सूर्य ज्यों का त्यों है। संसार रूप नाना प्रकार की विचित्र रचना ऐसे आत्मा में स्थित है जैसे विचित्र गुच्छों के संयुक्त वृक्षों की पंक्ति की विचित्र रचना पर्वत पर स्थित होती है तैसे ही संसाररूप दृश्य नाना प्रकार की मञ्जरी को धरनेवाला आत्म सत्ता का वृक्ष है जितने भूतगण त्रिलोकी उदर में वर्तते हैं वे सब आत्मा
उपशम प्रकरण । ६३६
में अभिन्नरूप है, ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सबका प्रकाशक आत्मा है । वह अनुभवसत्ता आदि अन्त से रहित है, जिसके सब आकार हैं और स्थावर जङ्गम सब जगत भूत जाति अन्तर अनुभवरूप स्थित है वह एक अनुभव आत्मा में हूँ, द्रष्टा दर्शन दृश्य सर्वरूप आत्मा में हूँ और सहस्रनेत्र सहस्रहस्त मेरे हैं । में ही चिदाकाशरूप हूँ, सूर्य देह से आकाश में विचरता हूँ और पवन देह से बहता वायु वाहन पर आरूढ़ हूँ । में विष्णुरूप शंख, चक्र, गदा, पद्म के धरनेवाला हूँ, सब सौभाग्य देखनेवाला हूँ और सब दैत्यों को भगाता और नाशकर्त्ता में ही हूँ। में नाभिकमल में उत्पन्न हुआ हूँ, पद्मासन से निर्विकल्प समाधि में स्थित-रूप ब्रह्मा हूँ और मनवृत्तिरूप को प्राप्त हुआ हूँ मैंने ही त्रिनेत्र आकार लिया है, गौरी मेरी अर्द्धाङ्गिनी है और सृष्टि के अन्त में सबको में ही संहार करता हूँ जैसे कोई अपने अंगों को संकोच ले तैसे ही मैं संहार करता हूँ । त्रिलोकीरूपी मढ़ी की इन्द्ररूप होकर में पालना करता हूँ और कर्मों के अनुसार जैसा कोई भाव करे तैसा फल देता हूँ । तृणबेलि और गुच्छों में रस होकर में स्थित हूँ में ही उत्पत्तिकर्त्ता और चेतनरूप हूँ और लीला के निमित्त जगत् आडम्बर विस्ताररूप मैंने ही किया है, जैसे मृत्तिका के खिलौने बालक रच लेता है । मेरे में सब कर्म अर्पण करने से सब शान्ति प्राप्त होती है और मुझसे रहित कुछ वस्तु नहीं, मैं सत्तास्वरूप आदर्श हूँ, सब पदार्थ मेरे में प्रतिबिम्बित होते हैं, तब यह असत्यरूप भी सत्यता को प्राप्त होता है-इससे मुझसे भिन्न कुछ नहीं पुष्पों में सुगन्ध, पत्रों में सुन्दरता, पुरुषों में अनुभव और स्थावर जङ्गमरूप जो जगत् दृष्ट आता है वह सब में हूँ । में सब संकल्प से रहित परम चैतन्य हूँ और अहं त्वं आदिक से परे हूँ, जल में रसशक्ति, अग्नि में उष्णता और बरफ में शीतलता में ही हूँ । जैसे काष्ठ में अग्नि है तैसे ही सबमें स्थित हूँ, सब पदार्थों में में परमात्मा व्यापक हूँ और सबको अपनी इच्छा से उप-जाता हूँ । जैसे दूध में घृतशक्ति, जल में रसशक्ति और सूर्य में प्रकाश-शक्ति है तैसे ही में चैतन्यस्वरूप सब पदार्थों में स्थित हूँ । त्रिकाल का जगत सब मेरे में स्थित है और में चित्त के उपचार, फुरने से रहित शुद्ध-
६४० योगवाशिष्ठ ।
स्वरूप और सबका भरण और पोषण करनेवाला और वैराट्राज होकर स्थित भया हूँ । त्रिलोकी का राज्य मुझको अपूर्व प्राप्त हुआ है जो शास्त्रो और देवों के दल बिना निर्जित विस्तृत है । बड़ा आश्चर्य है कि में इतना बड़ा विस्तृतरूप हूँ और अपने आपमें नहीं समाता, जैसे कल्पान्तर के वायु से उछला समुद्र आपमें नहीं समाता । में अनन्तरूप आत्मा अपनी इच्छा से आप प्रकाशता हूँ । जैसे क्षीरसमुद्र अपनी उज्ज्वलता से शोभता है तैसे ही में भी अपने आपसे शोभता हूँ । यह जगतरूपी मटकी महाअल्परूप है—जैसे बिल में हाथी नहीं समाता तैसे ही में अपने आपमें विस्तृतरूप से जगत् में नहीं समाता । में कोटि ब्रह्माण्ड में व्यापक हूँ और ब्रह्मलोक से परे जो तत्त्वों का अन्त आता है उसके भी परे में अनन्तरूप हूँ । यह में हूँ, यह में नहीं, यह निर्बलता मेरे तुच्छ रूप है । में तो आदि अन्त से रहित चैतन्य आकाश हूँ और परे से परिच्छिन्नता मिथ्या भासती थी में, तू, यह, वह आदिक मिथ्या भ्रम है । देह क्या, पर क्या और अपर क्या, में तो सर्वव्यापक चैतन्यतत्त्व हूँ । मेरे पितामह बड़े नीचबुद्धि थे जो ऐसे ऐश्वर्य को त्यागकर तुच्छ ऐश्वर्य में स्वेचित हुए थे । कहाँ यह महादृष्टि सर्व का कर्ता ब्रह्मवपु और कहाँ वह संसारश्रम का राजा अनित्यरूप सुख भोग दुःखदायक । अनन्त सुख, परम उपशम स्वभाव, शुद्ध चैतन्य दृष्टि अब मेरे में हुई है । सब भाव पदार्थों में चेत्य से रहित में चैतन्य आत्मा स्थित हूँ । अब मुझको नमस्कार है, क्योंकि मेरी जय हुई है और जीर्णरूप संसारश्रम से निकला हूँ । इसमें मेरी जीत हुई है पाने योग्य आत्मपद पाया है और जीवन सार्थक हुआ है । ऐसा उत्तम समराज चक्रवर्ती में भी नहीं मिलना । ये जीव निरन्तर बोध को त्यागकर दुःखरूपी कार्यों में रमते हैं । काष्ठ जल और मृत्तिका से संयुक्त जो पृथ्वी है उसको पाकर जो भुलायमान हुए हैं उनको धिक्कार है, वे कीट हैं । यह द्रव्य ऐश्वर्य अविद्यारूप है, अविद्या से उपजते हैं और अविद्यारूप इनका बढ़ना है । इनमें क्या गुण है जिस निमित्त यत्न करते हैं । इस जगतरूपी मट्टी में कई वर्ष हिरण्यकशिपु ने राजसुख भोगा परन्तु उपशम जो शान्तिरूप है उसको न प्राप्त हुआ । उसने एक जगत