भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 628

६३६ योगवाशिष्ठ ।

कोमल अङ्ग और श्वेत कमल की नाईं श्वेत शंख हाथ में धारण किये ! तुम्हारे नाभिकमल में भँवरेरूप ब्रह्मा स्थित हो वेद का उच्चारणरूपी ओऽम् शब्द करते हैं और हृदयकमल में बिराजनेवाले जल के ईश्वररूप ! मैं तुम्हारी शरण हूँ। जिसके श्वेतनख तारागणवत् प्रकाशरूप, हँसता मुख चन्द्रमा के मण्डलवत्, हृदयमणि सबका प्रकाशक और शरत्काल के आकाशवत् निर्मल विस्तृतरूप ! मैं तेरी शरण हूँ । हे त्रिभुवनरूपी कम-लिनियों के प्रकाशनेवाले चन्द्रमा ! मोहरूपी अन्धकार के नाशकर्त्ता, सूर्य, अजड़, चिदात्मा, सम्पूर्ण जगत् के कष्ट हरनेवाले ! मैं तुम्हारी शरण हूँ। हे नूतनविकसितरूप कमलपुष्पों से भूषित अङ्ग और स्वर्णवत् पीताम्बरधारी महासुन्दरस्वरूप ! मैं तेरी शरण हूँ। हे ईश्वर ! लीला करके सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले और परमशक्ति शङ्खवत् दृढ़ देह ! मैं तेरी शरण हूँ। हे दामिनीवत् प्रकाशरूप, सबको संहारकर जल में बालकरूप धर वट के नीचे शयन करनेवाले ! मैं तेरी शरण हूँ। हे देवतारूप कमलों के प्रकाश करनेवाले सूर्यमण्डल, दैत्य पुत्ररूपी कम-लिनियों के तुषाररूपी बर्फ को जलानेवाले और हृदयरूपी कमलों के आश्रयभूत ! मैं तेरी शरण हूँ। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब अनेक गुणों से आठ श्लोक प्रह्लाद ने कहे तब विष्णुजी ने प्रह्लाद से कहा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादाष्टकानन्तरनारायणागमन-नाम त्रयस्त्रिंशतितमस्सर्गः ॥ ३३ ॥

श्रीभगवान्‌जी बोले, हे गुणनिधि, दैत्यकुल के शिरोमणि ! जो तुमको वाञ्छित फल है सो माँगो और जन्मदुःख के शान्ति निमित्त वर माँगो । प्रह्लाद बोले, हे सर्व मङ्गल के फलदायक और सर्वलोकों में व्यापकरूप ! जो वस्तु दुर्लभतर है वह शीघ्र ही मुझसे कहिये और दीजिये। श्रीभगवान्‌जी बोले, हे पुत्र ! सब भ्रम के नाश करनेवाले और परम फलरूप ब्रह्म से विश्रान्ति होती है और वह जिस आत्मविवेक की समता से प्राप्त होती है वही आत्मविवेक तुमको होगा । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार दैत्येन्द्र से कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गये । फिर प्रह्लाद ने पुष्पाञ्जली दी और पूजा करके श्रेष्ठ आसन बिछा उन पर आप पद्मासन धरके बैठा और