योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 629, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ६३७
विधिसंयुक्त उत्तम शास्त्रों का पाठ करने लगा । जब पाठ करके निश्चिन्त हुआ तब विचारने लगा कि विष्णु ने मुझसे क्या कहा था, उन्होंने कहा था कि तुझको विवेक होगा । इसलिए संसारसमुद्र तरने के निमित्त शीघ्र ही विचार करूँ । इस संसार आडम्बर में में कौन हूँ जो बोलता हूँ, देह और यह जगत् तो में नहीं, यह तो असत्य उपजा है और जड़रूप पवन से स्फुरणरूप होता है सो में कैसे होऊँ ? यह देह भी में नहीं क्योंकि यह तो क्षण-क्षण में काल से लीन होता है और जड़रूप है । श्रवणरूपी नड़ भी में नहीं, क्योंकि जो शब्द सुनते हैं वह शून्य में उपजा है । त्वचा इन्द्रिय भी में नहीं इसका क्षण-क्षण विनाश स्वभाव है । प्राप्त हुआ अथवा न हुआ, यह इष्ट है, यह अनिष्ट है, इन्द्रियाँ आप जड़ हैं पर इनके जानने-वाला चैतन्यतत्त्व है और चैतन्य के प्रमाद से ये विषय उपलब्ध होते हैं । इस-मे न में त्वचा इन्द्रिय हूँ, और न स्पर्श विषय हूँ, यह जड़ात्मक है यह जो चञ्चलरूपी तुच्छ जिह्वा इन्द्रिय है और जिसके अग्र में अल्प जल अणु स्थित है वही रस ग्रहण करता है, वह रस भी आत्मसत्ता करके लब्धरूप होता है आप जड़ है, इससे यह जड़रूप जिह्वा और रस में नहीं ये जो विनाशरूप नेत्र दृश्य के दर्शन में लीन हैं सो में नहीं और न में इनका विषयरूप हूँ, ये जड़ हैं । यह जो नासिका पृथ्वी का अंश है सो केवल आत्मा के आधार है यह आप जड़ है पर इसका जाननेवाला चैतन्य है, सो न में नासिका हूँ, न गन्ध हूँ, में अहं मम से और मन के मनन से रहित शान्तरूप हूँ और ये पञ्च इन्द्रियाँ मेरे में नहीं में शुद्ध चैतन्यरूप कलना कलंक से और चित्त से रहित चिन्मात्र और सबका प्रकाशक सबके भीतर बाहर व्यापक और निःसंकल्प निर्मल शान्तरूप हूँ । आश्चर्य है अब मुझको अपना स्वरूप स्मरण आता है । प्रकाशरूप चैतन्यअनुभव अद्वैत मेरे अनुभव में स्थित है । सूर्य घट, पटादिक मत्र पदार्थ में प्रकाशता हूँ । जैसे दीपक से उत्तम तेज भासे तैसे ही चैतन्य अनुभव से इन्द्रियों की वृत्ति स्फुरणरूप होती है । जैसे तेज में चिनगारे स्फुरणरूप होते हैं तैसे ही सर्वज्ञ अनुभव सत्ता में मन का मननरूप शक्ति फुरती है । जैसे सूर्य के तेज से मरुस्थल में मृगतृष्णा की नदी फुरती है तैसे ही अनुभव सत्ता