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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 640, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 640

६४= योगवाशिष्ट ।

शरत्काल के आकाशवत स्वच्छ चित्त रहता है। निरहंकाररूपी जल में प्रसन्नतारूपी कमलों से शोभता है। हे आत्मा ! तुझको नमस्कार है। इन्द्रियाँरूपी तेंदुए और चित्तरूपी बड़वाग्नि, दोनों जिससे नष्ट भये हैं ऐसे आत्मारूपी समुद्रआत्मा को नमस्कार है, जिसमे अहंकार मेघ दूर हुआ है और दावाग्नि शान्त हुई है। ऐसे जो आत्मानन्दरूपी पर्वत है उस आनन्द के आश्रय मैंने विश्राम पाया है। हे देव ! तुझको नमस्कार है। जिसमें आनन्दरूपी कमल प्रफुल्लित है और जिसमे चित्तरूपी तरङ्ग शान्त हुआ है ऐसा जो मानसरोवर में आत्मा हूँ उसको नमस्कार है। आत्मारूपी हंस संवित्रूपी पंख हैं और हृदयरूपी कमलों से पूर्ण मानसरोवर, पर विश्राम करनेवाले को नमस्कार है। कालरूपी कल्पना से रहित निष्कलङ्क, सदा उदितरूप, सब ओर से पूर्ण और शान्त आत्मा तुझको नमस्कार है। मैं सदा उदित, शीतल हृदय कर तम दूर करता, और सर्वव्यापक हूँ, परन्तु अज्ञान से अदृष्ट हुआ था सो उस चैतन्य सूर्य को नमस्कार है। मन के मन से जो उपजे थे वह अब शान्त हुए हैं और मन को मन से और अहं को अहं से छेद के जो शेष रहे सो ही मेरी सत्ता है। भावरूप जो दृश्य पदार्थ हैं उनको आत्मभाव में तृष्णा को तृष्णा के छेद से, अनात्मा को आत्मविचार द्वारा नष्ट किये से और ज्ञान से ज्ञेय को जाने से मैं निरहंकारपद को प्राप्त हुआ हूँ और भाव अभाव क्रिया नष्ट हो गई है। मैं अब केवल स्वस्थित हूँ और निर्भय, निरहंकार, निर्मन, निष्पन्द, शुद्धात्मा हूँ। मेरा शरीर शव की नाईं स्थित है, लीला करके मैंने अहंकार को जीता है, परम उपशम को प्राप्त हुआ हूँ और परम शान्ति मुझको प्राप्त हुई है मोहरूपी बेताल और अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हुए हैं, वासनारूपी कुत्सित भूमिका से मुक्त और विगतज्वर हुआ हूँ और तृष्णारूपी रस्मी में जो बँधा हुआ देहपिंजर था और उसमें अहंकाररूपी पक्षी फँसा था सो तृष्णारूपी रस्मी विवेक-रूपी करतनी से काटी है। अब जाना नहीं जाता कि शरीररूपी पिंजरे से अहंकाररूपी पक्षी कहाँ निकल गया। अज्ञानरूपी वृक्ष में अहंकार-रूपी पक्षी रहता था आत्मा के जानने से जाना नहीं जाता कि कहाँ