योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 641, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ६४६
गया ? दुराशारूपी दुर्मति ने धूसर किया था, भोगरूपी भस्म ने शुद्ध दृष्टि दूर की थी और वासना मे हम मृतक हो गये थे । इतने काल मे में चित्त की भूमिका में मिथ्या अहंकार को प्राप्त हुआ था । अब में आनन्दित हुआ हूँ आज ही मेरी बड़ी शोभा बढ़ी है, अहंकाररूपी महामेघ नष्ट हुआ है और उसमें तृष्णारूपी श्यामता थी वह नष्ट हुई है । अब में निर्मल आकाशवत् शोभता हूँ, अब मैंने आत्म भगवान् देखा है और अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और अनुभवरूप सदा प्राप्त है । प्रभुता के समूह के आगे अज्ञान अल्परूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे आत्मलाभचिन्तन नाम पञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३५ ॥
प्रह्लाद बोले, हे महात्मा पुरुष ! तुझको नमस्कार है । तू सर्वपद से अतीत आत्मा चिरकाल में मुझको स्मरण आया है और तेरे मिलने से मेरा कल्याण हुआ है । हे भगवन् ! तुझको देखकर सब ओर से नमस्कार करता हूँ और हृदय से तुझको आलिंगन करूँगा । त्रिलोकी में तुझसे अन्य बान्धव कोई नहीं । तू सबसे सुखदायक है और सबका तू ही संहार करता और रक्षा करता है और देने और लेनेवाला भी तू ही है । अब तू क्या करेगा और कहाँ जावेगा ? तूने अपनी सत्ता से विश्व को पूर्ण किया है और विश्वरूप भी तू ही है । अब सब ओर से में तुझको देखता हूँ और तू ही नित्यरूप सर्वत्र है । तेरे और मेरे से अनेक जन्म का अन्तर पड़ा था पर अब कल्याण हुआ जो तुझको देखा । तू अत्यन्त निकट है और परम बान्धवरूप है—तुझको नमस्कार है । तू सबका कृत कृत्यस्वरूप कर्त्ता हर्त्ता और संसार तेरा नृत्य है । हे नित्य, निर्मल स्वरूप ! तुझको नमस्कार है । शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारनेवाले विष्णु और अर्ध चन्द्रमा के धारनेवाले सदाशिवरूप तुझको नमस्कार है । हे सहस्रनेत्र, इन्द्र ! तुझको नमस्कार है । पद्मज ब्रह्मा सब देवविद्या का सम्बन्ध तू ही है । तेरे में कुछ भेद नहीं तो तुम्हारे हमारे में भेद कैसे हो ? जैसे समुद्र और तरंगों का संयोग अभेद है तैसे ही तेरा और मेरा संयोग अभेद है । तू ही अनन्त और विचित्ररूप है और भाव अभावरूप जगत के धरनेवाली नीति है—जो जगत की मर्यादा करती है । हे द्रष्टा-