योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८६ योगवाशिष्ठ ।
में परमबोध पद को देखूँगा ? वह समय कब होगा जब मेरा चित्तरूपी मेघ वासनारूपी वायु से रहित आत्मरूपी सुमेरु पर्वत में स्थित होकर शान्तिमान् होगा ? अज्ञानदशा कब जावेगी और ज्ञानदशा कब प्राप्त होगी ? अब वह समय कब होगा कि मन और काया और प्रकृति को देख- कर हँसूँगा ? वह समय कब होगा जब जगत् के कर्मों को बालक की चेष्टावत् मिथ्या जानूँगा और जगत् मुझको सुषुप्ति की नाईं हो जावेगा । वह समय कब होगा जब मुझको पत्थर की शिलावत् निर्विकल्प समाधि लगेगी और शरीररूपी वृक्ष में पक्षी आलय करेंगे और निस्सङ्ग होकर छाती पर आन बैठेंगे ? हे देव ! वह समय कब होगा जब इष्ट अनिष्ट विषय की प्राप्ति में मेरे चित्त की वृत्ति चलायमान न होगी और विराट् की नाईं सर्वात्मा होऊँगा ? वह समय कब होवेगा जब मेरा सम असम आकार शान्त हो जावेगा और सब अर्थों में निर्पिच्छतरूप में हो जाऊँगा ? कब में उपशम को प्राप्त होऊँगा—जैसे मन्दराचल से रहित क्षीरसमुद्र शान्तिमान् होता है—और कब में अपना चेतन वपु पाकर शरीर को अशरीरवत् देखूँगा ? कब मेरी पूर्ण चिन्मात्र वृत्ति होगी और कब मेरे भीतर बाहर की सब कलना शान्त हो जावेगी और सम्पूर्ण चिन्मात्र ही का मुझे भान होगा ? में ग्रहण त्याग में रहित कब सन्तोष पाऊँगा और अपने स्वप्रकाश में स्थित होकर संसाररूपी नदी के जगमगणरूपी तरङ्गों से कब रहित होऊँगा और अपने स्वभाव में कब स्थित होऊँगा ? हे रामजी ! ऐसे विचारकर उद्दालक चित्त को ध्यान में लगाने लगा, परन्तु चित्तरूपी वानर दृश्य की ओर निकल जाये पर स्थित न हो । तब वह फिर ध्यान में लगावे और फिर वह भोगों की ओर निकल जावे । जैसे वानर नहीं ठहरता तैसे ही चित्त न ठहरे । जब उसने बाहर विषयों को त्यागकर चित्त को अन्तर्मुख किया तब भीतर जो दृष्टि आई तो भी विषयों को चिन्तने लगा, निर्विकल्प न हो और जब रोक रखे तब सुषुप्ति में लीन हो जावे। सुषुप्ति और लय जो निद्रा है उसी में चित्त रहे । तब वह वहाँ से उठ- कर और स्थान को चला—जैसे सूर्य सुमेरु की प्रदक्षिणा को चलता है और गन्धमादन पर्वत की एक कन्दग में स्थित हुआ जो फूलों से संयुक्त