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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 679, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 679

उपशम प्रकरण । ६८७

सुन्दर और पशुपक्षी मृगों से रहित एकान्त स्थान था और जो देवता को भी देखना कठिन था । वहाँ अत्यन्त प्रकाश भी न था और अत्यन्त तम भी न था, न अत्यन्त उष्ण था और न शीत जैसे मधुर कार्तिक मास होता है तैसे ही वह निर्भय एकान्त स्थान था । जैसे मोक्षपदवी निर्भय एकान्तरूप होती है तैसे ही उस पर्वत में कुटी बना और उस कुटी में तमाल पर और कमलों का आसनकर और ऊपर मृगछाला बिछाकर वह बैठा और सब कामना का त्याग किया । जैसे ब्रह्माजी जगत् को उपजाकर छोड़ बैठे तैसे ही वह सब कलना को त्याग बैठा और विचार करने लगा कि अरे मूर्ख मन ! तू कहाँ जाता है, यह संसार मायामात्र है और इतने काल तू जगत् में भटकता रहा, पर कहीं तुझको शान्ति न हुई, वृथा धावता रहा। हे मूर्ख मन ! उपशम को त्यागकर भोगों की ओर धावता है सो अमृत को त्यागकर विष का बीज बोता है, यह सब तेरी चेष्टा दुःखों के निमित्त है। जैसे कुशवारी अपना घर बनाकर आप ही को बन्धन करती है तैसे ही तू भी आपकी आप संकल्प उठाकर बन्धन करता है। अब तू संकल्प के संसरने को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो कि तुझको शान्ति हो । हे मन ! जिह्वा के साथ मिलकर जो तू शब्द करता है वह दर्दुर के शब्दवत् व्यर्थ है। कानों के साथ मिलकर सुनता है तब शुभ अशुभ वाक्य ग्रहण करके मृग की नाईं नष्ट होता, त्वचा के साथ मिलकर जो तू स्पर्श की इच्छा करता है सो हाथी की नाईं नष्ट होता है, रसना के स्वाद की इच्छा से मछली की नाईं नष्ट होता है और गन्ध लेने की इच्छा से भँवरे की नाईं नष्ट हो जावेगा। जैसे भँवरा सुगन्ध के निमित्त फूल में फँस मरता है तैसे तू फँस मरेगा और सुन्दर स्त्रियों की वाञ्छा से पतङ्ग की नाईं जल मरेगा। हे मूर्ख मन ! जो एक इन्द्रिय का भी स्वाद लेते हैं सो नष्ट होते हैं तू तो पञ्चविषय का सेवनेवाला है, क्या तेरा नाश न होगा । इससे तू इनकी इच्छा त्याग कि तुझको शान्ति हो। जो इन भोगों की इच्छा न त्यागेगा तो में ही तुझको त्यागूँगा ! तू तो मिथ्या असत्यरूप है तुझको मेरा क्या प्रयोजन है विचार कर में तेरा त्याग करता हूँ। हे मूर्ख मन ! जो तू देह में अहं अहं करता है सो तेरा अहं किस अर्थ