योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य प्रकरण । ६६
मार डालता है, पर विषयरूपी सर्प जिसको काटता है वह अनेक जन्म-पर्यन्त भागता ही चला जाता है। इसमें परम दुःख का कारण विषय भोग ही है और परम विष है। हे मुनीश्वर! आरे से अङ्ग का काटना और वज्र में शरीर का चूर्ण होना में सहूँगा परन्तु विषय का भोगना मुझसे किसी प्रकार सहा नहीं जाता। यह तो मुझको दुःखदायक ही दृष्टि आता है। इसमें वही मुझसे कहिये जिससे मेरे हृदय से अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश हो और जो न कहोगे तो में अपनी छाती पर धैर्यरूपी शिला धर के बैठा रहूँगा, परन्तु भोग की इच्छा न करूँगा। हे मुनीश्वर! जितने पदार्थ हैं वे सब नाशरूप हैं। जैसे बिजली का चमत्कार होके छिप जाता है और अञ्जलि में जल नहीं ठहरता वैसे ही विषयभोग और आयु नष्ट हो जाते हैं—ठहरते नहीं। जैसे काँटे से मछली दुःख पाती है वैसे ही भोग की तृष्णा मे जीव दुःख पाते हैं। इससे मुझे किसी पदार्थ की इच्छा नहीं। जैसे कोई मृगमरीचिका के जल को सत्य जान जलपान की इच्छा करे और दौड़े पर जल नहीं पाता है। इससे में किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्य प्रकरणे सर्वान्तप्रतिपादननाम चतुर्विंशतितमस्सर्गः ॥ २४ ॥
श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़े और मोहरूपी कीच में मूर्ख का मन गिर जाता है। उससे वह दुःख ही पाता है शान्तिवान् कभी नहीं होता। जब जरावस्था आती है तब जैसे पुरातन वृक्ष के पत्र पवन में हिलते हैं वैसे ही अङ्ग हिलते हैं और तृष्णा बढ़ जाती है। जैसे नीम का वृक्ष ज्यों-ज्यों वृद्ध होता है त्यों-त्यों कटुता बढ़ती है वैसे ही तृष्णा बढ़ती है। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने देह इन्द्रियादिकों का आश्रय अपने सुख निमित्त लिया है वह मूर्ख संसाररूपी अन्धकूप में गिरता है और निकल नहीं सकता। अज्ञानी का चित्त भोग का त्याग कदाचित् नहीं करता, हे मुनीश्वर ! जगत् के पदार्थों में मेरी बुद्धि मलीन हो गई है। जैसे वर्षाकाल में नदी मलीन होती है और जैसे मार्गशीर्ष मास में मञ्जरी सूख जाती है वैसे ही जगत् की शोभा देखते-देखते मेरी बुद्धि विरस हो गई है। जैसे जगत् का पदार्थ मूर्ख को रमणीय भासता है और जैसे पानी का