भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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७० | योगवाशिष्ठ ।

गढ़ा तृण से आच्छादित होता है और मृग का बालक उस तृण को रमणीय जानकर खाने जाता है तो गिर जाता है वैसे ही यह मूर्ख जीव भोगों को रमणीय जान भोगों में गिर पड़ता है, फिर महादुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! जगत् के पदार्थों में मेरी बुद्धि चञ्चल हो गई है, इससे वही उपाय कहिये जिससे मेरी बुद्धि पर्वत की नाईं निश्चल हो और परमानन्द जो निर्भय निराकार है और जिसके पाने में किसी पद की इच्छा नहीं रहती उसे पाऊँ । हे मुनीश्वर ! ऐसे पद से मेरी बुद्धि शून्य है, इससे में शान्तिमान् नहीं होता । यह संसार और संसार के कर्म मोहरूप हैं, इसमें पड़े हुए शान्ति नहीं पाते । जनकादिक शान्तिमान् संसार में रहे हुए कमल की नाईं निर्लेप रहते हैं । उनकी क्या समझ है कृपा करके कहिए और आप ऐसे सन्तजन विषय भोगते दृष्टि आते और जगत् की सब चेष्टा करते हैं पर निर्लेप कैसे रहते हैं वह युक्ति कहिये । यह बुद्धि जैसे ताल में हाथी प्रवेश करता है और पानी मलीन हो जाता है वैसे ही मोह में मलीन हो जाती है । इससे वही उपाय कहिये जिससे बुद्धि निर्मल हो । यह बुद्धि स्थिर कभी नहीं रहती । जैसे कुल्हाड़े का कटा वृक्ष मूल में स्थिर नहीं होता वैसे ही वासना में कटी बुद्धि स्थिर नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! संसाररूपी विसूचिका मुझको लगी है इसमें वही उपाय कहिये जिससे दृश्य का नाश हो—उसने मुझको बड़ा दुःख दिया है । आत्मज्ञान कब प्रकाश होगा जिसके उदय से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो ? हे मुनीश्वर ! जैसे बादल से चन्द्रमा आच्छादित हो जाता है वैसे ही बुद्धि की मलीनता से में आच्छादित हुआ हूँ । इससे वही उपाय कहिये जिससे आवरण दूर हो और आत्मानन्द जो नित्य है प्राप्त हो इसके पाने में फिर कुछ पाने की आवश्यकता नहीं रहती और इससे सम्पूर्ण दुःख नष्ट हो जाते हैं । अन्तःकरण शीतल हो जाता है । ऐसे पद की प्राप्ति का उपाय मुझसे कहिये । हे मुनीश्वर ! आत्मज्ञानरूपी चन्द्रमा की मुझको इच्छा है; जिसके प्रकाश से बुद्धिरूपी कमलिनी खिल जाती है और जिसकी अमृतरूपी किरणों से वृत्ति तृप्त होती है । हे मुनीश्वर ! अब मुझको गृह में रहने की इच्छा नहीं