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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 698, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 698

उपशम प्रकरण । ७०७

इन्द्रियाँ हैं । यह जड़ है, मैं चैतन्य हूँ । न मैं ज्ञानेन्द्रिय हूँ, न मेरी ज्ञान इन्द्रियाँ हैं । इनसे परे मन है सो भी मैं नहीं, क्योंकि यह जड़ है । मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ये सब अनात्मरूप हैं । मेरा इनके साथ अविद्या का सम्बन्ध है । भ्रान्ति से में इनको अपना स्वरूप जानता था पर यह सब भूतों का कार्य है । इनके पीछे चेतन जीव है जो चेतन दृश्य को चेतनेवाला है सो चेतन चेतना भी मैं नहीं । इन सबमें शेष अचेत चिन्मात्रसत्ता मेरा स्वरूप है । बड़ा कल्याण हुआ जो मैंने अपना आप पाया । अब मैं जागा हूँ । बड़ा आश्चर्य है कि में वृथा देहादिक को अपना जानकर शोक और मोह को प्राप्त होता था । मैं तो एक निर्विकल्प चेतन और अनन्त आत्मा सबमें व्याप रहा हूँ और ब्रह्मरूप आत्मा हूँ । इन्द्रियों से आदि जितने भूतगण हैं उन सबका में आत्मा हूँ । यह भगवान् आत्मा सबके भीतर व्यापा है । जैसे सबके भीतर पाँचतत्त्व होते हैं तैसे ही यह चेतनरूप सर्व भाव को भर रहा है और सर्व भावों में व्याप रहा है । भेदरूप और उदय अस्त भाव आदि विकारों से वह रहित है । ब्रह्मा से आदि तृण पर्यन्त सबका आत्मा यही है । सब प्रकाशों का प्रकाशनेवाला दीपक वही है और संसाररूपी मोतियों के पिरोनेवाला तागा और सबका कारण कार्य यही है । वह साकार से रहित है और शरीरादिक सब उसी की सत्ता मे उपलब्ध होते हैं । शरीररूपी रथ इसी से चलता है वास्तव में शरीरादिक कुछ वस्तु नहीं । यह जगत् चित्तरूपी नट की नृत्यलीलारूप है । चित्त में जगत् फुरता है वास्तव में और कुछ वस्तु नहीं । बड़ा कष्ट है कि में वृथा संग्रह असंग्रह की चिन्ता करता था । यह गुणों का प्रवाह है इसमें में क्यों शोकवान् होता था ? बड़ा आश्चर्य है कि असत्यभ्रम सत्य हो मुझको दीखता था । अब मैं निश्चय करके मम प्रबोध हुआ हूँ और दुर्दृष्टि मेरी दूर हुई है । दृष्टि की जो अलभ्य दृष्टि है सो अब मैंने देखी है और जो कुछ पाने योग्य था सो मैंने पाया है और अचेत्य चिन्मात्र को प्राप्त हुआ हूँ । जो कुछ दृश्य है उसको में स्वरूप से देखता हूँ और अहँ मम दुःख मेरा नष्ट हुआ है । मैं चिदानन्द पूर्ण और नित्य शुद्ध अनन्त आत्मा अपने आप में स्थित हूँ । ग्रहण क्या और त्याग