योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७०८ | योगवाशिष्ठ ।
क्या ? यह क्लेश कोई नहीं और न कोई दुःख है, न सुख है, सर्व ब्रह्म है और दूसरी वस्तु कुछ नहीं। में राग किसका करूँ और द्वेष किसका हो ? मैं मिथ्या मूढ़ता को प्राप्त होकर दुःखी होता था, अब कल्याण हुआ कि में अमूढ़ होकर अपने आप स्वभाव में स्थित हुआ हूँ। ऐसे आत्मा के साक्षात्कार बिना में दुःखी था। इसके देखे से अब किसका शोक करूँ और मोह को कैसे प्राप्त होऊँ। अब में क्या देखूँ, क्या करूँ और कहाँ स्थित होऊँ ? यह सब जगत् आत्मा के प्रकाश से है और सब आत्मरूप है। हे अतत्त्वरूप ! अर्थात् जिसमें तत्त्वों की उपाधि कुछ नहीं तेरी दृष्टि निष्कलङ्क है। में अब सम्यक् ज्ञानवान् हुआ हूँ। मेरा तुझको नमस्कार है। में अनन्त आत्मा, अनुभवरूप, निष्कलङ्क, सर्व इच्छा भ्रमरहित, सुषुप्ति की नाईं शान्तरूप, अचैत्य, चिन्मात्र सदा अपने आपमें स्थित हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सुरघवृत्तान्तवर्णन-नाम चतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! क्रान्त जो सुवर्णरूप देश है उसका राजा परमानन्द को प्राप्त हुआ। वह इस प्रकार विचार अभ्यास से ब्रह्मरूप हुआ जैसे गाधि का पुत्र विश्वामित्र तपस्या करके उसी शरीर में क्षत्रिय से ब्राह्मण हुआ था तैसे ही राजा सुरघ अभ्यास करके ब्रह्मरूप ब्रह्मबोध हुआ और जैसे सूर्य इष्ट अनिष्ट में सम है और विगतज्वर होकर दिनों को व्यतीत करता है तैसे ही राग द्वेष से रहित वह राज्य का कार्य करता रहा। जैसे जल ऊँची नीची ठौर में जाता है और अपना जलभाव नहीं त्यागता सम रहता है, तैसे ही राजा हर्षशोक से रहित होकर राज्य कार्य करता रहा और स्वभाव को न त्यागा। आत्मविचार का धार सुषुप्ति की नाईं उसकी वृत्ति हो गई और संसार भाव का स्फुरना रुक गया। जैसे वायु से रहित दीपक प्रकाशता है तैसे ही वह शुद्ध प्रकाश धारता भया। हे रामजी ! वह दया करता भी दृष्टि आवे परन्तु उसकी दृष्टि में कुछ दया नहीं और दया से रहित भी औरों को दीखे परन्तु उसकी दृष्टि में निर्दयता नहीं। न कुछ सुख, न दुःख, न अर्थ, न अनर्थ सब पदार्थों में एक समभाव आत्मा देखे और हृदय से पूर्णमासी के चन्द्रमावत् शीतल