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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 728, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 728

उपशम प्रकरण ।

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है तब दृष्टि नहीं आता परन्तु नाश नहीं होता तैसे ही शरीर के नाश हुए आत्मा और ठौर प्रकट होता है नाश नहीं होता । हे रामजी ! वासना के वश से वह जीव एक शरीर को त्यागकर और शरीर को प्राप्त होता है । इसी प्रकार वासना के अनुसार जीव फिरता है । वासना-रूपी रस्सी से बँधा जीवरूपी वानर शरीररूपी स्थानों में भटकता है और कभी ऊर्ध्वलोक और कभी मनुष्यलोक में घटीयन्त्र की नाईं भ्रमता है । हे रामजी ! जीव के हृदय के जो वासना होती है उसी से जरा मृत्यु, जन्म आदि का दुःख पाता है और कर्मरूपी भार उठाकर कभी स्वर्ग, कभी पाताल और कभी मध्यस्थान में जाता है, शान्ति कदाचित नहीं पाता । इससे हे रामजी ! अविद्यारूपी जो संसार है इसको भ्रमरूप जानकर इसकी वासना को त्याग करो और अपने स्वरूप में स्थित हो । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा तब सूर्य अस्त हुआ तो सभा स्नान के निमित्त उठी और परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये फिर रात्रि बिताके सूर्य की किरणों के निकलते ही आ बैठे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे संसारयोगोपदेशो नाम षट्षष्टितमस्सर्गः ॥६६॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मा देह के उपजे से नहीं उपजता और नाश हुए से नष्ट नहीं होता इसलिये तुम निष्कलङ्क आत्मा हो तुमको देह के साथ सम्बन्ध कदाचित् नहीं । जैसे कुञ्ज में फूल और फल और घट में घटाकाश होता है सो परस्पर भिन्नरूप होते हैं, एक के नाश हुए दूसरे का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता । जो देह के नाश में अपना नाश मानता है वह मूर्ख जड़ है, उस अर्धचेतना को धिक्कार है । हे रामजी ! जैसे रथ, रस्सी और घोड़े का स्नेह से रहित संयोग होता है तैसे ही शरीर और इन्द्रियों का संयोग है । हे रामजी ! रथ टूटे से जैसे रथवाहक की हानि नहीं होती तैसे ही देह और इन्द्रियों का नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता । जैसे पृथ्वी और पहाड़ पर जल के प्रवाह का संयोग होता है और वियोग भी होता है