योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 729, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७३८ | योगवाशिष्ठ । |
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सो एक के नाश हुए से दूसरे का नाश नहीं होता तैसे ही देह और इन्द्रियों का संयोग है पर इनके नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता जैसे स्थाणु में वेताल भासता है और भयवान् होता है तैसे ही देह में अहंभाव से राग, द्वेष, सुख, दुःख पाता है । जैसे एक काष्ठ की अनेक पुतली होती हैं सो काष्ठ से इतर कुछ नहीं है तैसे ही जो कुछ शरीर है वह पञ्चभूतों का है, पञ्चभूतों से भिन्न कुछ वस्तु नहीं । जब यह पञ्चभूतौं का शरीर पञ्चभूतों में लीन होता है तब उसको मृतक हुआ कहते हैं । यह आश्चर्य है, जो प्रत्यक्ष पञ्चभूतों का शरीर है उसमें आत्मभावना श्वान करते हैं और फिर हर्ष और शोक को प्राप्त होता है इसी से मूर्ख है । हे रामजी ! न कोई पुरुष है और न कोई स्त्री है पर इनके निमित्त मूढ़ रुदन करते हैं । जैसे मृत्तिका के हाथी घोड़ा आदिक खिलौने विचित्र रचना होती है और उसकी प्राप्ति में अज्ञानी बालक तुष्टवान् और खेदवान् होता है तैसे ही अज्ञानी पाञ्चभौतिक रचना देखकर उसकी प्राप्ति में राग द्वेष करता है ज्ञानवान् को सब भूत पदार्थ भ्रान्तिमात्र भासते हैं । जैसे माटी के खिलौनों को आपस में मिलने से राग द्वेष कुछ नहीं होता तैसे ही बुद्धि, इन्द्रियाँ, मन से आत्मा की जो असंगता है इससे राग द्वेष नहीं रहता । जैसे पाषाण की पुतलियाँ मिलती हैं तो उनको स्नेह बन्धन कुछ नहीं होता तैसे ही देह, इन्द्रियाँ, प्राण और आत्मा का आपस में सङ्ग बुद्धि से रहित है । इससे तुम स्नेह से रहित हो रहो, शोक काहे को करते हो । जैसे तृण और जल के तरङ्ग का संयोग होता है तो तृण इधर उधर जाता है और जल को कुछ हर्ष शोक नहीं होता तैसे ही देह और आत्मा का योग है इनके मिलाप और बिछुरे का वास्तव में दुःख सुख कुछ नहीं होता । आत्मा और अनात्मा, देह इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि आदिक विलक्षण हैं और परस्पर इनके क्षय और उदय में हर्ष शोक कुछ नहीं परन्तु चित्त के उदय से अनात्मधर्म आत्मा में प्रतिबिम्बित भासता है । तुम तत्त्वबोध करके चित्त को त्याग करके अपने स्वरूप में स्थित हो—जैसे जल तरङ्गभाव को त्यागकर अपने स्थिर स्वभाव को प्राप्त होता है । जब तुम अपने अक्षोभभाव को प्राप्त