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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 731, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 731
७४०योगवाशिष्ठ ।

भासता है वह सब असतरूप है और जो सत्य है वह सदा ज्यों का त्यों है। असतरूप दृश्य के निमित्त तुम क्यों वृथा मोह को प्राप्त होते हो असम्यक् दर्शन को त्यागकर सम्यकदर्शी हो । हे सुलोचन, रामजी ! जो सम्यकदर्शी हैं वे मोह को नहीं प्राप्त होते दृश्य और दर्शन इन्द्रियों के साहचर्यसम्बन्ध में अर्थात् विषयेन्द्रिय के साक्षिरूप आनन्द का जिसे सुख है वह परब्रह्म कहलाता है और अनुत्तम सुख से जो उस संवित् में स्थित है वह ज्ञानवान् है उसको मोक्ष प्राप्त है। जो दृश्य-दर्शन के मिलने में स्थित होता है उस अज्ञानी को वह संवित् संसारभ्रम दिखाती है। दृश्य दर्शन में जो अनुभवसत्ता है वह सुख आत्मरूप है, जो दृश्य के साथ लगा है वह बन्ध है और जो दृश्य से मुक्त हो चैतन्य संवित् में स्थित है वह मुक्त कहलाता है । हे रामजी ! दृश्य दर्शन के मध्य जो संवित् है वह अनुभवरूप है, उस संवित् का आश्रय करके जो दृश्य-दर्शन से मुक्त है वह संसारसमुद्र से तरेगा । वह सुषुप्तिवत् अवस्था है इसको प्राप्त हुआ परम प्रकाश को प्राप्त होता है और इसी को मुक्त कहते हैं। जो दृश्य-दर्शन से मुक्त है वह मुक्त कहलाता है और जो दृश्य-दर्शन के साथ बाँधा है वह बन्ध है। अन्य सबों का अनुभव करनेवाला आत्मा है, वह न स्थूल है, न अणु है, न प्रत्यक्ष है, न अप्रत्यक्ष है, न चेतन है, न जड़ है, न सत्य है, न असत्य है, न अहं है, न त्वं है, न एक है, न अनेक है, न निकट है, न दूर है, न अस्ति है, न नास्ति है, न प्राप्ति है, न अप्राप्ति है, न सर्व है, न असर्व है, न पदार्थ है, न अपदार्थ है, न पाञ्च-भौतिक है, न अपाञ्चभौतिक है, जो कुछ दृश्य जाति हैं, सो मन सहित षट् इन्द्रियों से सिद्ध होती है । जो इनसे अतीत है वह इनका विषय नहीं क्योंकि निष्किञ्चनरूप है। यह भी सब वही रूप है और ज्यों का त्यों जाने से सब आत्मरूप है । जगत् अनात्मरूप कुछ नहीं असम्यक्ज्ञान से ऐसे भासता है। यह जो कठिनरूप पृथ्वी, द्रवतारूप जल, स्पन्दरूप वायु उष्णतारूप अग्नि और अवकाशरूप आकाश भासते हैं वे सब आत्म-रूप हैं । जो कुछ वस्तु-अवस्तुरूप जगत् भासता है सो आत्मसत्ता से भिन्न नहीं आत्मा से भिन्न जगत् को मानना उन्मत्त चेष्टा है और मूर्ख

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